केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक श्रेणियां / बिंदु | मद्रास उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (2026) |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय, चेन्नई (एकल पीठ) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस एम. निर्मल कुमार |
| केस टाइटल | मंबई उर्फ मणोगरन बनाम राज्य (Mandai @ Manogaran v. State) |
| प्रासंगिक कानून | पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act), 2012 की धारा 8 एवं धारा 11 |
| मुख्य कानूनी प्रश्न | क्या केवल हाथ खींचना और सीटी बजाना पॉक्सो एक्ट की धारा 8 के तहत ‘यौन हमला’ माना जाएगा? |
| अदालत का विधिक स्टैंड | नहीं। बिना स्पष्ट यौन मंशा के यह कृत्य यौन हमला नहीं, बल्कि उत्पीड़न हो सकता है। |
| अंतिम न्यायिक परिणाम | सजा निलंबित (Sentence Suspended) एवं जमानत स्वीकृत; निचली अदालत के फैसले पर पुनर्विचार की अपील विचारार्थ स्वीकार। |
Pulling Minor’s Hand: नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों में अपराध की विधिक प्रकृति और ‘यौन मंशा’ (Sexual Intent) को तय करते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी की है।
जस्टिस एम. निर्मल कुमार की एकल पीठ ने ‘मंबई उर्फ मणोगरन बनाम राज्य’ मामले की सुनवाई करते हुए पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) की धारा 8 (यौन हमला) के तहत दोषी ठहराए गए व्यक्ति की 3 साल की जेल की सजा को निलंबित (Sentence Suspended) कर दिया और उसे जमानत प्रदान की। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति किसी नाबालिग लड़की द्वारा सीटी का जवाब न देने पर उसका हाथ खींचता है, तो इस कृत्य को सीधे तौर पर यौन मंशा से किया गया ‘यौन हमला’ (Sexual Assault) नहीं माना जा सकता। यह अधिकतम उत्पीड़न (Harassment) की श्रेणी में आ सकता है।
विधिक पृष्ठभूमि: पड़ोस का विवाद और पॉक्सो कोर्ट की सजा
यह मामला मार्च 2020 में चेन्नई के एक आवासीय परिसर में घटी घटना से जुड़ा है।
- घटना का विवरण: अभियोजन पक्ष के अनुसार, एक नाबालिग लड़की अपने रिश्तेदार के घर जा रही थी। उसी परिसर में रहने वाले आरोपी (मणोगरन) ने बालकनी से सीटी बजाकर उसे बुलाया। लड़की द्वारा अनदेखा करने पर आरोपी नीचे आया, उसका हाथ खींचा और मुस्कुराया। लड़की ने खुद को छुड़ाया और अपनी मां को बताया, जिसके बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई।
- विशेष अदालत का फैसला: चेन्नई की विशेष पॉक्सो अदालत ने 6 जून को आरोपी को पॉक्सो एक्ट की धारा 8 के तहत दोषी मानते हुए 3 साल के सश्रम कारावास और ₹1,000 जुर्माने की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती देकर सजा पर रोक और जमानत की मांग की।
- पक्षों के विधिक तर्क: याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि पीड़िता के पिता और आरोपी के बीच पुरानी रंजिश थी। उन्होंने कहा कि पीड़िता के बयान के अनुसार आरोपी ने केवल हाथ खींचा था और कोई अन्य अभद्र हरकत नहीं की थी। यह कृत्य धारा 8 (यौन हमला) के तहत नहीं आता; यदि कोई अपराध बनता भी है तो वह धारा 11 (यौन उत्पीड़न) का हो सकता है। दूसरी ओर, राज्य सरकार ने लड़की के बयानों की निरंतरता का हवाला देते हुए सजा का समर्थन किया।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: यौन मंशा (Sexual Intent) का निर्धारण
मद्रास उच्च न्यायालय ने साक्ष्यों और आरोपों का विधिक मूल्यांकन करते हुए निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातें कहीं:
सीधे तौर पर यौन मंशा नहीं मानी जा सकती
हाई कोर्ट ने कहा कि आरोपी पर मुख्य आरोप सीटी बजाने, बुलाने और बात न सुनने पर हाथ खींचने के हैं। अदालत ने टिप्पणी की, इस तरह के कृत्य को सीधे तौर पर ‘यौन मंशा’ नहीं कहा जा सकता। अधिक से अधिक इसे उत्पीड़न (Harassment) कहा जा सकता है, यौन हमला (Sexual Assault) नहीं। इसलिए, निचली अदालत के निर्णय पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।
सजा का निलंबन और जमानत
अदालत ने पाया कि मुख्य अपील में कानूनी रूप से विचारणीय प्रश्न (Arguable Issues) मौजूद हैं और अपील के अंतिम निस्तारण में समय लगेगा। चूंकि 3 साल की सजा में आमतौर पर जमानत मिल जाती है और आरोपी पहले से जेल में था, इसलिए हाई कोर्ट ने उसकी सजा को निलंबित करते हुए उसे जमानत दे दी।

