Wednesday, November 4, 2026
HomeSupreme CourtInterim Maintenance: व्यभिचार प्रथम दृष्टया सिद्ध होने पर पत्नी अंतरिम भरण-पोषण की...

Interim Maintenance: व्यभिचार प्रथम दृष्टया सिद्ध होने पर पत्नी अंतरिम भरण-पोषण की हकदार नहीं…साक्ष्यों से साबित करना केस में अनिवार्य, केस समझें

केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक श्रेणियां / बिंदुउच्चतम न्यायालय का विधिक निर्णय
संबंधित अदालतउच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली
केस टाइटलहिमांशु चोरड़िया बनाम राजस्थान राज्य व अन्य (Himanshu Chordia v. State of Rajasthan & Anr)
प्रासंगिक कानूनदंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125(4)
मूल विधिक प्रश्नक्या व्यभिचार के आरोप के आधार पर पत्नी को ‘अंतरिम भरण-पोषण’ (Interim Maintenance) देने से मना किया जा सकता है?
अदालत का विधिक निर्णयहाँ। यदि पति पहली ही नज़र (Ex-facie) में स्पष्ट साक्ष्यों द्वारा व्यभिचार का आरोप सिद्ध कर देता है, तो अंतरिम भरण-पोषण की मनाही वाली रोक लागू होगी।
अतिरिक्त विधिक निर्देशभारत में प्राइवेट डिटेक्टिव्स को विनियमित (Regulate) करने के लिए विधि आयोग और कानून मंत्रालय को विचार करने का निर्देश।

Interim Maintenance: वैवाहिक विवादों और भरण-पोषण से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत स्पष्ट किया है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने ‘हिमांशु चोरड़िया बनाम राजस्थान राज्य व अन्य’ मामले की सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि व्यभिचार का आरोप केवल मौखिक नहीं होना चाहिए, बल्कि प्रथम दृष्टया (Ex-facie) साक्ष्यों के आधार पर स्पष्ट रूप से सिद्ध होना अनिवार्य है। शीर्ष अदालत ने निर्णय दिया है कि यदि पति यह साबित करने में सफल रहता है कि उसकी पत्नी व्यभिचार (Adultery/अवैध संबंध) में जी रही है, तो दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125(4) के तहत पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण देने से इनकार किया जा सकता है।

विधिक पृष्ठभूमि: उदयपुर ट्रायल कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक का मामला

यह कानूनी विवाद एक शादीशुदा जोड़े के बीच उपजे मतभेदों से शुरू हुआ।

  • विवाह और अलगाव: दोनों का विवाह जुलाई 2014 में हुआ था। वैवाहिक संबंधों में खटास आने के बाद पत्नी मई 2020 में अपने बच्चे के साथ अलग रहने लगी।
  • भरण-पोषण का दावा: पत्नी ने नवंबर 2020 में उदयपुर की पारिवारिक अदालत में CrPC की धारा 125 के तहत अपने और अपने बच्चे के लिए मासिक भरण-पोषण तथा अंतरिम राहत की अर्जी लगाई।
  • पति की विधिक आपत्ति: पति ने CrPC की धारा 125(4) के तहत आवेदन दाखिल कर दावा किया कि उसकी पत्नी व्यभिचार में रह रही है, इसलिए वह किसी भी प्रकार के भरण-पोषण की पात्र नहीं है। साक्ष्य के रूप में पति ने 92 वीडियो और 237 तस्वीरें प्रस्तुत कीं।
  • निचली अदालतों का रुख: ट्रायल कोर्ट और राजस्थान हाई कोर्ट दोनों ने पति की इस अर्जी को यह कहते हुए टाल दिया कि व्यभिचार के सबूतों की प्रामाणिकता की जांच मुख्य मुकदमे की सुनवाई (Final Adjudication) के दौरान ही हो सकती है। ट्रायल कोर्ट ने पत्नी और बेटे दोनों के लिए ₹25,000-₹25,000 प्रति माह का अंतरिम गुजारा भत्ता तय कर दिया। इसके बाद पति ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

सुप्रीम कोर्ट का विधिक विश्लेषण: “अंतिम फैसले का इंतजार करना गलत”

उच्चतम न्यायालय ने निचली अदालतों के इस रुख को विधिक रूप से त्रुटिपूर्ण माना और निम्नलिखित प्रमुख सिद्धांत तय किए।

धारा 125(4) का विधिक दायरा

अदालत ने CrPC की धारा 125(4) का हवाला देते हुए कहा कि यह धारा स्पष्ट रूप से व्यभिचार में रहने वाली पत्नी को न केवल अंतिम भरण-पोषण, बल्कि अंतरिम भरण-पोषण से भी वंचित करती है। कोर्ट ने टिप्पणी की, चूंकि धारा 125(4) में यह शर्त निहित है कि यदि व्यभिचार सिद्ध हो जाता है तो पत्नी अंतरिम या अंतिम किसी भी भरण-पोषण की हकदार नहीं होगी, हमारा मानना है कि यदि पति धारा 125(4) के तहत आवेदन दायर करता है और प्रथम दृष्टया साक्ष्यों के माध्यम से आरोप को स्थापित करने में सक्षम होता है, तो केवल उसी स्थिति में अंतरिम भरण-पोषण पर विधिक रोक लागू होगी।

मामले को पुनर्विचार हेतु भेजा (Remand)

शीर्ष अदालत ने माना कि ट्रायल कोर्ट को पति के धारा 125(4) के आवेदन को अंतिम फैसले तक टालने के बजाय शुरुआत में ही साक्ष्यों की प्रथम दृष्टया जांच करके तय करना चाहिए था। इसलिए, सुप्रीम कोर्ट ने मामले को वापस ट्रायल कोर्ट भेजते हुए निर्देश दिया कि वह पति के आवेदन पर गुण-दोष के आधार पर विचार करे।

निजी जासूसों (Private Investigators) के नियमन पर शीर्ष अदालत की चिंताएं

इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भारत में निजी जासूसी एजेंसियों और डिटेक्टिव्स के नियमन (Regulation) के अभाव पर गंभीर सवाल उठाए।

  • डिजिटल साक्ष्यों की विश्वसनीयता: पति द्वारा पेश किए गए 92 वीडियो और 237 तस्वीरों के तरीके पर कोर्ट ने संदेह जताया। कोर्ट ने पूछा कि ये तस्वीरें किसने खींचीं, क्या उनके पास इसका अधिकार था, और इन इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स की सुरक्षा की क्या गारंटी है?
  • निजता का अधिकार (Right to Privacy): पीठ ने चिंता व्यक्त की कि तकनीक के इस युग में तस्वीरों और वीडियो को मॉर्फ या डॉक्टर (Doctored) करना बहुत आसान है। बिना किसी नियमन के जासूसी करना किसी व्यक्ति के निजता के मौलिक अधिकार और व्यक्तिगत डेटा सुरक्षा का सीधा उल्लंघन है।
  • संसद और लॉ कमीशन को निर्देश: अदालत ने टिप्पणी की कि साक्ष्य जुटाने के बदलते तरीकों के लिए एक कानूनी ढांचा होना जरूरी है। कोर्ट ने याद दिलाया कि 2007 में संसद में निजी जासूसी एजेंसियों को विनियमित करने वाला एक विधेयक लाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले की प्रति कानून एवं न्याय मंत्रालय के सचिव तथा भारतीय विधि आयोग (Law Commission of India) के अध्यक्ष को भेजने का निर्देश दिया ताकि वे इस दिशा में कानून बनाने पर विचार कर सकें।

RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
broken clouds
22.9 ° C
22.9 °
22.9 °
85 %
3kmh
80 %
Tue
22 °
Wed
30 °
Thu
29 °
Fri
29 °
Sat
29 °

Recent Comments