Monday, November 2, 2026
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Ghaziabad’s Lawyer: गाजियाबाद के चार अधिवक्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की अनुच्छेद 32 याचिका; वकीलों पर जानलेवा हमले में हत्या के प्रयास और पुलिसिया पक्षपात

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मामले की पृष्ठभूमि और याचिकाकर्ताओं के मुख्य आरोप

  1. 22 अक्टूबर की घटना और हमला:याचिका के अनुसार, 22 अक्टूबर की रात लगभग 9:00 बजे अमित वर्मा और उसका बेटा राहुल वर्मा अज्ञात लोगों के समूह को आवासीय परिसर के भीतर ले आए। उन्होंने याचिकाकर्ता ए. दीपा (महिला अधिवक्ता), उनके पति ए. देव कुमार, विपिन शर्मा और अनूप गोयल पर बेरहमी से हमला किया। बीच-बचाव करने आए अन्य निवासियों को भी पीटा गया।
  2. हल्की धाराओं में प्राथमिकी (FIR) और SCBA का पत्र:घटना के बाद इंदिरापुरम पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई गई और मेडिकल परीक्षण व सीसीटीवी फुटेज के आधार पर एफआईआर (No. 880/2026) दर्ज की गई। हालांकि, पुलिस ने केवल मामूली और ज़मानतीय धाराएं (Sections 115(2), 131, 191(2), 352 BNS) लगाईं। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) ने भी उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) और पुलिस आयुक्त को पत्र लिखकर गंभीर धाराएं न जोड़े जाने पर गहरी चिंता जताई थी।
  3. क्रास-एफआईआर और जांच अधिकारी (IO) का बदलना:याचिकाकर्ताओं ने उजागर किया कि 25 अक्टूबर को पुलिस ने वकीलों के खिलाफ ही एक क्रास-एफआईआर (Cross FIR) दर्ज कर ली। इसके तुरंत बाद जांच अधिकारी (Investigating Officer) को बदल दिया गया और याचिकाकर्ताओं के बयान दोबारा दर्ज कराए गए, जिससे जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं।

याचिकाकर्ताओं द्वारा सुप्रीम कोर्ट से मांगी गई राहतें

1. कठोर धाराओं का समावेश:

याचिका में अदालत से इंदिरापुरम थाना पुलिस को बीएनएस (BNS 2023) की धारा 109 (हत्या का प्रयास), धारा 74 (महिला की लज्जा भंग करने के इरादे से हमला/अपराधिक बल) और धारा 117(3) (गंभीर चोट जिससे स्थायी विकलांगता या कोमा हो) को तत्काल जोड़ने का निर्देश देने की मांग की गई है।

2. निष्पक्ष जांच और सुरक्षा:

घटना के 7 दिन से अधिक बीत जाने के बाद भी किसी मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी न होने के कारण पीड़ितों ने अपनी और अपने परिवार की जान-माल की सुरक्षा, सीसीटीवी (CCTV) फुटेज को वैज्ञानिक रूप से संरक्षित करने और मामले को यूपी पुलिस से हटाकर दिल्ली के किसी पुलिस स्टेशन में स्थानांतरित (Transfer) करने का आग्रह किया है।

नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार—मौलिक अधिकारों व जीवन की सुरक्षा की गारंटी), भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 109 (हत्या का प्रयास / Attempt to Murder—पूर्व IPC धारा 307), धारा 74 (महिला की लज्जा भंग करने के आशय से हमला या आपराधिक बल प्रयोग—पूर्व IPC धारा 354), धारा 117(3) (स्थायी अपंगता या कोमा कारित करने वाली गंभीर उपहति), धारा 115(2) (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), धारा 191(2) (दंगा/बलवा), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 173 (प्राथमिकी दर्ज करने व सही धाराओं के समावेश का विधिक दायित्व), तथा अधिवक्ताओं की शारीरिक सुरक्षा (Security and Protection of Advocates) के विधिक सिद्धांतों पर गाजियाबाद पुलिस की कार्यप्रणाली के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक अत्यंत महत्वपूर्ण रिट याचिका दाखिल की गई है।

गाजियाबाद के इंदिरापुरम क्षेत्र में एक महिला अधिवक्ता सहित चार अधिवक्ताओं पर हुए कथित बर्बर हमले के मामले में स्थानीय पुलिस द्वारा गंभीर धाराएं न लगाने और उल्टे पीड़ितों पर ही क्रॉस-एफआईआर दर्ज करने के विरोध में चारों अधिवक्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

यह याचिका 30 अक्टूबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष विशेष उल्लेख (Mentioning) किए जाने के बाद उनके निर्देशानुसार औपचारिक रूप से दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय से गुहार लगाई है कि इंदिरापुरम पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR संख्या 880/2026 में हत्या के प्रयास और महिला के शीलभंग की कठोर धाराएं जोड़ी जाएं, उत्तर प्रदेश पुलिस के पक्षपातपूर्ण रवैये को देखते हुए पूरी जांच दिल्ली के किसी पुलिस स्टेशन को स्थानांतरित (Transfer of Investigation to Delhi Police) की जाए, अधिवक्ताओं के खिलाफ दर्ज की गई प्रतिशोधात्मक क्रॉस-एफआईआर को रद्द किया जाए, और पीड़ितों व उनके परिवारों को तत्काल पुलिस सुरक्षा प्रदान की जाए।

याचिका में उठाए गए मुख्य विधिक आक्षेप एवं पुलिस की निष्क्रियता

1. जानलेवा हमले के बावजूद केवल मामूली धाराओं में केस दर्ज करना:

  • याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि 22 अक्टूबर की रात हुए भीषण हमले में उन्हें गंभीर और प्राणघातक चोटें आईं, मेडिकल जांच कराई गई और सीसीटीवी फुटेज से भी बर्बरता की पुष्टि हुई।
  • इसके बावजूद इंदिरापुरम पुलिस ने जानबूझकर केवल गैर-गंभीर व जमानती/हल्की धाराओं—धारा 115(2) (साधारण चोट), धारा 131 (हमला या आपराधिक बल प्रयोग), धारा 191(2) (दंगा), और धारा 352/352(2) (शांति भंग करने के इरादे से अपमान) के तहत ही एफआईआर दर्ज की।
  • पुलिस ने स्पष्ट रूप से BNS की धारा 109 (हत्या का प्रयास), धारा 74 (महिला अधिवक्ता के शील पर हमला), और धारा 117(3) (गंभीर चोट जिससे स्थायी अक्षमता हो) को शामिल करने से परहेज किया, जिससे मुख्य हमलावरों को सीधा विधिक संरक्षण मिला।

2. सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) का हस्तक्षेप और पुलिस का ढुलमुल रवैया:

  • इस बर्बर घटना पर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) ने कड़ा संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) और गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर को आधिकारिक पत्र प्रेषित किया था।
  • SCBA ने रेखांकित किया था कि महिला अधिवक्ता (याचिकाकर्ता संख्या 1) के विस्तृत बयानों और चिकित्सकीय साक्ष्यों के बावजूद कठोर धाराएं नहीं जोड़ी गईं।
  • घटना के एक सप्ताह से अधिक समय बीत जाने के बाद भी स्थानीय पुलिस मुख्य नामजद आरोपियों को गिरफ्तार करने में पूरी तरह विफल रही है, जिससे पीड़ित अधिवक्ता और उनके परिवार लगातार जानलेवा धमकियों के साए में जी रहे हैं।

3. क्रॉस-एफआईआर और जांच अधिकारी (IO) का संदेहास्पद बदलाव:

  • याचिका में पुलिस की दुर्भावना को उजागर करते हुए बताया गया है कि 25 अक्टूबर 2026 को पुलिस ने आरोपियों के प्रभाव में आकर पीड़ित अधिवक्ताओं के ही खिलाफ एक मनगढ़ंत क्रॉस-एफआईआर दर्ज कर ली।
  • इसके तुरंत बाद मामले के जांच अधिकारी (IO) को बदल दिया गया और नए आईओ द्वारा शिकायतकर्ता के बयानों को दोबारा दर्ज करने के नाम पर मामले को हल्का करने का प्रयास किया गया।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (अक्टूबर 2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयभारत का सर्वोच्च न्यायालय (संवैधानिक मूल रिट क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 32)
याचिकाकर्तागण (चार अधिवक्ता)1. ए. दीपा (A Deepa) — महिला अधिवक्ता (पीड़िता)।
2. ए. देब कुमार (A Deb Kumar) — अधिवक्ता (दीपा के पति)।
3. विपिन शर्मा (Vipin Sharma) — अधिवक्ता।
4. अनुप गोयल (Anup Goyal) — अधिवक्ता।
प्रतिवादी पक्षउत्तर प्रदेश राज्य (गृह विभाग), पुलिस महानिदेशक (DGP), पुलिस कमिश्नर गाजियाबाद, एसएचओ इंदिरापुरम एवं अन्य।
याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताअधिवक्ता प्रणय कुमार महापात्रा (Advocate Pranaya Kumar Mohapatra)।
घटना की तिथि व समय22 अक्टूबर 2026 (रात्रि लगभग 9:00 बजे)।
घटनास्थलएक आवासीय परिसर, इंदिरापुरम, गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश)।
विवाद का मूल कारणआवासीय परिसर के भीतर चल रहे एक अवैध निर्माण (Illegal Construction Dispute) को लेकर विवाद।
हमले का स्वरूपयाचिका के अनुसार, अमित वर्मा और उसके पुत्र राहुल वर्मा ने अज्ञात असामाजिक तत्वों के एक बड़े समूह को सोसाइटी परिसर के भीतर बुलाया। उन्होंने चारों अधिवक्ताओं पर जानलेवा हमला किया और बीच-बचाव करने आए अन्य स्थानीय निवासियों के साथ भी गंभीर मारपीट की।
दर्ज प्राथमिकियां• मूल FIR सं. 880/2026 (थाना इंदिरापुरम): BNS की धारा 115(2), 131, 191(2), 352, और 352(2) के तहत।
• प्रतिशोधात्मक क्रॉस-FIR (25 अक्टूबर 2026): पीड़ित वकीलों के ही विरुद्ध दर्ज कराई गई।

याचिकाकर्ताओं द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष की गई प्रमुख प्रार्थनाएं (Prayers)

याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय से निम्नलिखित विशिष्ट अनुतोष (Reliefs) मांगे हैं:

  1. कठोर धाराओं का अनिवार्य समावेश: थाना इंदिरापुरम को निर्देश दिया जाए कि वह FIR संख्या 880/2026 में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 109 (हत्या का प्रयास), धारा 74 (महिला की लज्जा भंग करने हेतु हमला/बल प्रयोग), और धारा 117(3) (गंभीर चोट/स्थायी विकलांगता) को तुरंत जोड़े।
  2. जांच का अंतर-राज्यीय स्थानांतरण (Transfer to Delhi Police): चूंकि गाजियाबाद पुलिस का आचरण प्रथम दृष्टया पक्षपातपूर्ण रहा है और उसने आरोपियों के दबाव में क्रॉस-केस दर्ज किया है, अतः निष्पक्षता सुनिश्चित करने हेतु पूरी आपराधिक जांच को उत्तर प्रदेश पुलिस से वापस लेकर दिल्ली के किसी पुलिस स्टेशन को स्थानांतरित किया जाए।
  3. क्रॉस-एफआईआर को रद्द करना: 25 अक्टूबर 2026 को अधिवक्ताओं के खिलाफ दर्ज की गई कथित झूठी और प्रतिशोधात्मक क्रॉस-एफआईआर को रद्द (Quashed) किया जाए।
  4. पीड़ितों और उनके परिजनों को सुरक्षा: याचिकाकर्ताओं और उनके परिवारों को संभावित हमलों और धमकियों से बचाने के लिए पर्याप्त और चौबीसों घंटे पुलिस सुरक्षा (Adequate Police Protection) मुहैया कराई जाए।
  5. साक्ष्यों का संरक्षण और स्थिति रिपोर्ट: सोसाइटी के सभी सीसीटीवी कैमरों के मूल डिजिटल फुटेज, डीवीआर (DVR) और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सील कर संरक्षित किया जाए, और अदालत के समक्ष अद्यतन जांच स्थिति रिपोर्ट (Status Report) पेश की जाए।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘अनुच्छेद 32 के तहत जांच का स्थानांतरण और कानूनी संरक्षण’

  • निष्पक्ष जांच मौलिक अधिकार का अंग (Fair Investigation under Article 21):
    • सर्वोच्च न्यायालय ने बाबूभाई बनाम गुजरात राज्य [(2010) 15 SCC 269] और निर्मल सिंह काहलों बनाम पंजाब राज्य में यह सुस्थापित किया है कि न केवल पीड़ित बल्कि अभियुक्त को भी निष्पक्ष, पारदर्शी और त्वरित जांच का संवैधानिक अधिकार है।
    • यदि पुलिस जानलेवा चोटों और वीडियो साक्ष्यों के बावजूद जानबूझकर हत्या के प्रयास जैसी गैर-जमानती धाराओं को छोड़कर केवल साधारण चोट की धाराएं दर्ज करती है, तो यह ‘ललिता कुमारी’ सिद्धांत और आपराधिक न्याय प्रणाली के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन है।
  • जांच को दूसरे राज्य की पुलिस को सौंपने की सर्वोच्च न्यायालय की असाधारण शक्ति:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने पूजा पाल बनाम भारत संघ [(2016) 4 SCC 160] और के.वी. राजेंद्रन बनाम अधीक्षक [(2013) 12 SCC 480] में स्पष्ट किया है कि यद्यपि अंतर-राज्यीय जांच का स्थानांतरण एक असाधारण शक्ति है, किंतु जहाँ स्थानीय पुलिस पर राजनीतिक या स्थानीय प्रभाव के कारण पीड़ितों पर ही दबाव बनाने और क्रॉस-केस दर्ज करने के ठोस आरोप हों, वहाँ जनता का न्यायपालिका में विश्वास बनाए रखने के लिए अदालत जांच को पड़ोसी राज्य (जैसे दिल्ली पुलिस) या केंद्रीय एजेंसी को स्थानांतरित करने में तनिक भी संकोच नहीं करेगी।
  • विधिक बिरादरी के प्रति संवेदनशीलता:
    • अधिवक्ताओं पर होने वाले हमलों को अदालतों ने हमेशा अत्यंत गंभीरता से लिया है। वकील न्यायालय के अधिकारी (Officers of the Court) होते हैं।
    • यदि गैर-कानूनी निर्माणों या नागरिक अधिकारों की रक्षा करने वाले अधिवक्ताओं को स्थानीय स्तर पर गुंडों द्वारा पीटा जाए और पुलिस मूकदर्शक बनकर पीड़ितों को ही प्रताड़ित करे, तो इससे पूरी कानूनी बिरादरी का मनोबल गिरता है। सीजेआई सूर्यकांत द्वारा मामले का तुरंत संज्ञान लेना इस विषय की संवैधानिक गंभीरता को दर्शाता है।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक मूल रिट क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: ए. दीपा व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य [Writ Petition (Criminal) under Article 32 of the Constitution of India]
  • याचिका दाखिल करने की तिथि: 2 नवंबर 2026 (30 अक्टूबर को CJI सूर्यकांत के समक्ष मेंशनिंग के पश्चात)
  • कार्यवाही का स्वरूप: जांच में कठोर धाराएं जोड़ने, दिल्ली पुलिस को ट्रांसफर करने, क्रॉस-एफआईआर रद्द करने और सुरक्षा हेतु परमादेश याचिका

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ताओं की ओर से: अधिवक्ता प्रणय कुमार महापात्रा (Advocate Pranaya Kumar Mohapatra)।
  • समर्थन: सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) की कार्यकारी समिति।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार) एवं अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा)
    • भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS):
      • धारा 109 — हत्या का प्रयास (Attempt to Murder)
      • धारा 74 — महिला की लज्जा भंग करने के आशय से उस पर हमला या आपराधिक बल प्रयोग
      • धारा 117(3) — गंभीर चोट जिससे स्थायी अपंगता कारित हो
      • धारा 115(2) — साधारण स्वेच्छा से चोट पहुंचाना
      • धारा 191(2) — बलवा/दंगा करना
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) — धारा 173 (संज्ञेय अपराधों में प्राथमिकी और उचित धाराओं का निर्धारण)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • आपराधिक मामलों में जांच की निष्पक्षता और स्थानांतरण का विधिक मानक: ‘पुलिस का यह वैधानिक कर्तव्य है कि वह पीड़ित द्वारा दी गई लिखित तहरीर, एमएलसी मेडिकल रिपोर्ट और सीसीटीवी फुटेज के आधार पर अपराध की वास्तविक गंभीरता के अनुरूप सही और कठोर धाराओं में प्राथमिकी दर्ज करे; जब स्थानीय पुलिस द्वारा मुख्य हमलावरों को बचाने के लिए गंभीर धाराओं को छोड़ दिया जाए और पीड़ितों पर ही क्रॉस-केस दर्ज कर दिया जाए, तो यह निष्पक्ष जांच के संवैधानिक अधिकार का खुला उल्लंघन है; ऐसी असाधारण परिस्थितियों में सर्वोच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत जांच को किसी अन्य निष्पक्ष एजेंसी या दूसरे राज्य की पुलिस को सौंपने और पीड़ितों को तत्काल सुरक्षा प्रदान करने का पूर्ण अधिकार रखता है।’
  • वर्तमान स्थिति व आगामी कार्यवाही: याचिका सर्वोच्च न्यायालय की रजिस्ट्री में सफलतापूर्वक दायर हो चुकी है; भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा दिए गए निर्देशों के आलोक में इस मामले को अत्यंत शीघ्र (आगामी कुछ ही दिनों में) एक उपयुक्त खंडपीठ के समक्ष तत्काल अंतरिम सुरक्षा और उत्तर प्रदेश सरकार से स्थिति रिपोर्ट तलब करने हेतु सूचीबद्ध किए जाने की प्रबल संभावना है।

Ghaziabad’s Lawyer: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
याचिका का प्रकारसंविधान के अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका
याचिकाकर्ता1. ए. दीपा, 2. ए. देव कुमार, 3. विपिन शर्मा, 4. अनूप गोयल (चारों अधिवक्ता)
प्रतिवादी/पुलिस स्टेशनइंदिरापुरम पुलिस स्टेशन, गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश पुलिस)
घटना की तिथि व समय22 अक्टूबर 2026, रात्रि लगभग 9:00 बजे (आवासीय परिसर में)
आरोपीअमित वर्मा, राहुल वर्मा एवं अज्ञात हमलावरों का समूह
दर्ज एफआईआर की धाराएं (BNS)धारा 115(2) [स्वेच्छा से चोट पहुंचाना], 131 [हमला/अपराधिक बल], 191(2) [बलवा/दंगा], 352 एवं 352(2) [शांति भंग करने के इरादे से अपमान]।
जोड़ने की मांग (BNS)धारा 109 [हत्या का प्रयास – Attempt to Murder], धारा 74 [महिला की शील भंग करने के इरादे से हमला], धारा 117(3) [स्थायी विकलांगता/गंभीर चोट पहुंचाना]।
प्रमुख प्रार्थना (Prayers)जांच को दिल्ली पुलिस स्थानांतरित करना, अधिवक्ताओं के खिलाफ दर्ज क्रास-एफआईआर रद्द करना, निष्पक्ष जांच और सुरक्षा प्रदान करना।
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