केस मैट्रिक्स एवं विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | मद्रास उच्च न्यायालय का निर्णय |
| मामले का नाम | अब्दुल मलिक बनाम जिला कलेक्टर |
| माननीय पीठ | जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन एवं जस्टिस बी. पुगलेंथी |
| मुख्य विधिक सिद्धांत | अधिकारियों द्वारा सरकारी वकील को गलत तथ्य देना अदालत को गुमराह करना है और Contempt of Court Act के तहत दंडनीय है। |
| प्रशासनिक निर्देश | 4 महीने के भीतर अतिक्रमण हटाने का आदेश एवं तहसीलदार से जवाब तलब। |
False Information To Govt. Lawyers: मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि सरकारी अधिकारियों द्वारा सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों को गलत या भ्रामक जानकारी देना सीधे तौर पर न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप है और यह अदालत की अवमानना (Contempt of Court) का मामला बन सकता है।
जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस बी. पुगलेंथी की पीठ ने यह टिप्पणी तब की जब उन्होंने पाया कि सरकारी वकील को सौंपी गई एक राजस्व रिकॉर्ड (Revenue Record) की फोटोकॉपी में से यह प्रविष्टि जानबूझकर छिपा दी गई थी कि पट्टा (निजी स्वामित्व वाली) भूमि एक जल प्रसार क्षेत्र (Water Spread Area) भी थी।
अदालत को गुमराह करना न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप है: हाई कोर्ट
न्यायालय ने रेखांकित किया कि अदालतें अक्सर सरकारी वकीलों द्वारा दिए गए बयानों पर भरोसा करती हैं, जो स्वयं संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों से प्राप्त निर्देशों पर निर्भर होते हैं।
मद्रास उच्च न्यायालय की टिप्पणी: सरकारी वकील को दी गई कोई भी गलत जानकारी सीधे तौर पर न्याय के प्रशासन में हस्तक्षेप करती है। यह अदालत की अवमानना के दायरे में आएगा।
अदालत ने फोटोकॉपी में प्रविष्टि गायब होने पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा, फोटोकॉपी लेते समय इस प्रविष्टि (Remark) को छिपाया गया प्रतीत होता है। यह अदालत को गुमराह करने से कम कुछ नहीं है।
मामला क्या था? (Background)
- याचिका: तिरुचिरापल्ली जिले के थुवरंकुरिची गांव के निवासी जे. अब्दुल मलिक और जे. सिद्दीक अली ने याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि सक्किलियनकुलम नहर (सर्वे नं. 33/1) और करंतापडीकुलम (सर्वे नं. 68 और 69/2) के जल चैनलों पर अतिक्रमण किया गया है।
- सरकारी पक्ष का दावा: सरकारी वकील ने स्वीकार किया कि सर्वे नं. 68 और 69/2 जल निकाय हैं। हालांकि, मारुंगापुरी तालुक के तहसीलदार से प्राप्त लिखित निर्देशों के आधार पर जमा की गई रिपोर्ट में सर्वे नं. 33/1 को केवल “पट्टा भूमि” बताया गया।
- सच्चाई आई सामने: याचिकाकर्ताओं ने अदालत का ध्यान प्रासंगिक ‘A-रजिस्टर’ उद्धरण की ओर आकर्षित किया, जिससे स्पष्ट हुआ कि सर्वे नं. 33/1 को जल प्रसार क्षेत्र (Neerpidipu) के रूप में वर्गीकृत किया गया था।
- रिकॉर्ड में हेरफेर: हाई कोर्ट ने पाया कि मूल A-रजिस्टर में यह टिप्पणी मौजूद थी, लेकिन सरकारी वकील को दी गई फोटोकॉपी का रिमार्क्स कॉलम पूरी तरह से खाली था।
हाई कोर्ट का आदेश और कार्रवाई
- जल निकाय की स्थिति बनाए रखने का निर्देश: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि एक जल प्रसार क्षेत्र पट्टा भूमि भी हो सकता है, लेकिन उस पर पट्टा धारक के अधिकार सीमित होते हैं। अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वे इस भूमि के ‘जल प्रसार क्षेत्र’ वाले चरित्र को बनाए रखें।
- अतिक्रमण हटाने का आदेश: कथित अतिक्रमणकारियों को नोटिस और सुनवाई का अवसर देने के बाद जल निकायों से सभी अतिक्रमणों को 4 महीने के भीतर हटाने का आदेश दिया गया।
- तहसीलदार से जवाब तलब (Suo Motu Contempt): अदालत ने रजिस्ट्रार (न्यायिक) को निर्देश दिया कि वे मारुंगापुरी के तहसीलदार से इस हेरफेर पर स्पष्टीकरण मांगें।
- कोर्ट ने रिपोर्ट को 6 अगस्त को पेश करने का निर्देश दिया है, जिसके बाद पीठ यह तय करेगी कि अधिकारी के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेते हुए अवमानना (Suo Motu Contempt) की कार्यवाही शुरू की जाए या नहीं।

