Sunday, September 20, 2026
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Secrecy of Ballot: मात्र 1 वोट की जीत का बेहद संकीर्ण अंतर और 84 खारिज मतपत्र; 4 साल लंबी कानूनी जंग, धार जिले के सरपंच चुनाव का केस पढ़ें

दोनों पक्षों के तर्क और अदालत के निष्कर्ष

  • याचिकाकर्ता (संजय मालीवाल) का तर्क:
    • केवल कम अंतर से जीत होना पुनः मतगणना का आधार नहीं हो सकता।
    • गुप्त मतदान प्रणाली (Secrecy of Ballot) का सम्मान होना चाहिए और जब तक गंभीर अनियमितता साबित न हो, री-काउंटिंग नहीं कराई जानी चाहिए।
    • री-काउंटिंग का आदेश देना याचिकाकर्ता की अंतिम राहत स्वीकार करने जैसा है।
  • प्रतिद्वंद्वी (कविता ठाकुर) का तर्क:
    • 84 वोटों का खारिज होना और 1 वोट का अंतर साफ तौर पर मतगणना की गड़बड़ी की ओर इशारा करता है।
    • क्रॉस-एग्जामिनेशन (जिरह) के दौरान मालीवाल ने स्वीकार किया कि वह मतगणना के दौरान मतदान केंद्र के बाहर खड़े थे और उन्हें अंदर की कार्यवाही का व्यक्तिगत ज्ञान नहीं था।
  • हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियां:“जब चुनाव विवाद एक एकल वोट के सूक्ष्म अंतर और 84 खारिज वोटों से जुड़ा हो, तो ऐसी स्थिति में भौतिक पुनर्गणना (Physical Recount) ही यह निर्धारित करने की एकमात्र विश्वसनीय और कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त व्यवस्था है कि अनियमितताओं के आरोप गणितीय रूप से सही हैं या नहीं।”

इंदौर/जबलपुर: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पंचायत चुनाव विवादों, गुप्त मतदान के सिद्धांत (Secrecy of Ballot) बनाम चुनावी पारदर्शिता, अत्यंत संकीर्ण जीत के अंतर (Razor-thin margin) और चुनाव याचिका (Election Petition) में मतपत्रों की पुनर्गणना (Recounting of Votes) के विधिक सिद्धांतों पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट की एकल पीठ ने धार जिले की ग्राम पंचायत सोदपुर के निर्वाचित सरपंच संजय मालीवाल द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए सक्षम चुनाव प्राधिकारी (निर्वाचन अधिकारी/SDO) द्वारा दिए गए पुनर्गणना के आदेश को बरकरार रखा। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्राधिकारी ने अपने अधिकार क्षेत्र का सही प्रयोग किया है और इसमें संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता। अदालत ने व्यवस्था दी है कि जब किसी चुनाव में जीत-हार का अंतर मात्र 1 वोट का हो और 84 मतपत्र खारिज किए गए हों, तो मतगणना में हुई अनियमितताओं के आरोपों की गणितीय सत्यता जांचने के लिए मतपत्रों का भौतिक निरीक्षण व पुनर्गणना ही एकमात्र विश्वसनीय और कानून सम्मत विधिक तंत्र है।

उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं सिद्धांत

1. ‘1 वोट का अंतर और 84 खारिज बैलेट: पुनर्गणना ही एकमात्र रास्ता’: न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट

अदालत ने अपने 17 सितंबर के फैसले में मतों की भौतिक पुनर्गणना के औचित्य को समझाते हुए कहा: “जब किसी चुनावी विवाद में जीत-हार का अंतर महज 1 वोट का हो और साथ ही 84 मतपत्र खारिज किए गए हों, तो ऐसी परिस्थितियों में मतों का भौतिक निरीक्षण और पुनर्गणना ही एकमात्र विश्वसनीय और कानून द्वारा मान्यता प्राप्त तंत्र है, जिससे यह निर्धारित किया जा सके कि मतपत्रों की अनुचित अस्वीकृति या स्वीकृति के सिद्ध आरोप गणितीय रूप से सही हैं या नहीं। सक्षम प्राधिकारी ने पुनर्गणना का आदेश देकर कोई विधिक त्रुटि नहीं की है।”

2. गुप्त मतदान का सिद्धांत बनाम प्रक्रियात्मक अनियमितता (Prima Facie Case)

  • याचिकाकर्ता संजय मालीवाल के वकील ने तर्क दिया था कि गुप्त मतदान (Secrecy of Ballot) एक पवित्र सिद्धांत है और केवल जीत का अंतर कम होने मात्र से पुनर्गणना का आदेश नहीं दिया जा सकता। उन्होंने दलील दी कि चुनाव याचिकाकर्ता को ठोस अनियमितताएं साबित करनी चाहिए और किसी “रोविंग या फिशिंग इन्क्वायरी” (Roving/Fishing Inquiry) के लिए मतपेटियां नहीं खोली जा सकतीं।
  • अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए पाया कि प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार (कविता ठाकुर) ने साक्ष्यों के जरिए मतगणना में अनियमितताओं को प्रथम दृष्टया सिद्ध किया था।
  • इसके अलावा, याचिकाकर्ता की जिरह (Cross-examination) में यह तथ्य सामने आया कि मतगणना के समय वह मतदान केंद्र के बाहर मौजूद था और उसे मतगणना कक्ष के भीतर की वास्तविक कार्यवाही की व्यक्तिगत जानकारी ही नहीं थी।

3. पुनर्गणना का आदेश कोई अंतिम राहत नहीं

  • याचिकाकर्ता ने यह भी आपत्ति उठाई थी कि चुनाव याचिका के लंबित रहते पुनर्गणना का आदेश देना मूलतः अंतिम राहत (Final Relief) प्रदान करने जैसा है।
  • अदालत ने इसे अमान्य करार देते हुए कहा कि चुनाव प्राधिकारी ने पहले मुद्दों पर विचार कर यह पाया कि मतगणना प्रक्रिया में अनियमितताएं थीं; पुनर्गणना का निर्देश केवल उन निष्कर्षों का परिणामी कदम (Consequential Direction) था ताकि वास्तविक परिणाम कानून सम्मत तरीके से सामने आ सके। आदेश स्वयं चुनाव का अंतिम परिणाम घोषित नहीं करता।

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4 साल लंबी कानूनी जंग की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (सोदपुर, धार विवाद)

  • जुलाई 2022 का चुनाव: धार जिले की सोदपुर ग्राम पंचायत के तीन मतदान केंद्रों पर चुनाव हुआ। 14 जुलाई 2022 को संजय मालीवाल को 758 वोट और कविता ठाकुर को 757 वोट मिलने पर मालीवाल को मात्र 1 वोट से विजयी घोषित किया गया। चुनाव में 84 मतपत्र खारिज किए गए थे।
  • मुकदमों के दौर (Litigation Rounds):
    • जुलाई-अगस्त 2022: कविता ठाकुर ने सीधे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसे हाईकोर्ट ने उचित विधिक मंच (चुनाव याचिका) पर जाने की छूट के साथ खारिज किया।
    • अप्रैल 2023: सक्षम चुनाव प्राधिकारी ने पुनर्गणना का आदेश दिया, जिसे मालीवाल ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने 21 सितंबर 2023 को सुनवाई का अवसर न मिलने के आधार पर आदेश रद्द कर मामला वापस रिमांड कर दिया।
    • 2024-2025: प्राधिकारी के समक्ष साक्ष्य दर्ज करने के कई अवसरों के बाद मालीवाल के साक्ष्य का अधिकार बंद हुआ। हाईकोर्ट ने पुनः हस्तक्षेप कर समयबद्ध निर्देश दिए। अंततः 18 सितंबर 2025 को प्राधिकारी ने नए सिरे से पुनर्गणना का आदेश दिया।
  • सीलबंद लिफाफे में पुनर्गणना परिणाम: हाईकोर्ट ने मौजूदा याचिका की सुनवाई के दौरान पुनर्गणना प्रक्रिया पूरी करने की अनुमति दी थी, लेकिन निर्देश दिया था कि परिणाम घोषित न कर सीलबंद लिफाफे (Sealed Cover) में अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। पुनर्गणना की कार्यवाही पूरी हो चुकी है।
  • 4 वर्ष का कार्यकाल पूरा: अदालत ने यह भी संज्ञान में लिया कि इस लंबी मुकदमेबाजी के दौरान संजय मालीवाल ने सरपंच के रूप में अपने 5 वर्षीय कार्यकाल के 4 वर्ष से अधिक का समय पूरा कर लिया है।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: संजय मालीवाल बनाम कविता ठाकुर एवं अन्य [रिट याचिका – मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय]
  • प्रासंगिक कानून: मध्य प्रदेश पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम, 1993 की धारा 122 (चुनाव याचिका); मध्य प्रदेश पंचायत निर्वाचन नियम, 1995 (मतगणना व पुनर्गणना के नियम); भारत का संविधान – अनुच्छेद 226 (रिट क्षेत्राधिकार)
  • संबद्ध न्यायिक नजीरें:
    • सोहन लाल बनाम बाबू राम एवं अन्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘यदि जीत-हार का अंतर अत्यंत कम हो और खारिज मतों की संख्या जीत के अंतर से कहीं अधिक हो, तो प्रथम दृष्टया अनियमितता स्थापित होने पर मतों की पुनर्गणना न्यायोचित है।’
    • कटिकरेड्डी लक्ष्मन्ना बनाम कट्टामंची रामेश्वर राव (सुप्रीम कोर्ट) — ‘गुप्त मतदान की शुचिता लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार है, लेकिन जहां स्पष्ट त्रुटियां परिलक्षित हों, वहां निष्पक्ष परिणाम जानने के लिए सीमित पुनर्गणना की अनुमति दी जा सकती है।’
  • पीठ: न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट (मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय)

Secrecy of Ballot: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतमध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (Madhya Pradesh High Court)
पीठ (Judge)न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट (Justice Sandeep N. Bhatt)
ग्राम पंचायत / जिलासोडपुर (Sodpur), जिला धार (मध्य प्रदेश)
मुख्य पक्षकारसंजय मालीवाल (घोषित विजेता: 758 वोट) बनाम कविता ठाकुर (निकटतम प्रतिद्वंद्वी: 757 वोट)
विवाद का मुख्य बिंदुकेवल 1 वोट की जीत का अंतर और 84 खारिज (Rejected) मत पत्र
अदालत का निर्णयसंविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप से इनकार; री-काउंटिंग के आदेश को वैध माना
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