अदालत के सवाल और याचिकाकर्ताओं के तर्क
- वैकल्पिक कानूनी उपचार (Alternate Efficacious Remedy) का सवाल: सुनवाई की शुरुआत में ही हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से पूछा कि जब कानून के तहत (जैसे मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत दर्ज कराना) वैकल्पिक कानूनी उपचार उपलब्ध हैं, तो सीधे हाईकोर्ट में आपराधिक रिट याचिका कितनी पोषणीय (Maintainable) है। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि मांगी गई कुछ राहतें प्रथम दृष्टया आपराधिक अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर प्रतीत होती हैं।
- स्वतंत्र एजेंसी (CBI) जांच की मांग क्यों? याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने तर्क दिया:
- दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के अधीन आती है।
- BCI के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा सत्तारूढ़ दल के सांसद (MP) हैं।
- इन परिस्थितियों में दिल्ली पुलिस से निष्पक्ष जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती और पूर्वाग्रह का अंदेशा है।
- मजिस्ट्रेट की शक्तियों की सीमाएं: याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यदि वे निचली अदालत/मजिस्ट्रेट के पास जाते हैं, तो मजिस्ट्रेट BCI से सीसीटीवी फुटेज जब्त करने जैसे कड़े निर्देश नहीं दे सकते और न ही उनके पास सीबीआई (CBI) जांच का आदेश देने का वैधानिक अधिकार है।
- 20 अगस्त के प्रतिवेदन (Representation) पर निर्णय की मांग: वकीलों ने BCI को निर्देश देने की मांग की कि वह 20 अगस्त के उनके अभ्यावेदन पर विचार करे और एक तर्कसंगत (Reasoned Order) आदेश पारित करे। उनका तर्क था कि यह राहत मुख्य आपराधिक जांच की प्रार्थना से जुड़ी हुई है, इसलिए हाईकोर्ट संविधान के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए इस पर विचार कर सकता है।
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) परिसर के भीतर और बाहर अगस्त माह के अंत में अधिवक्ताओं पर हुए कथित हिंसक हमले, प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने, घटना के सीसीटीवी फुटेज के संरक्षण और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) या किसी अन्य स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग वाली याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।
न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया की एकल पीठ कई पीड़ित वकीलों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई की शुरुआत में ही अदालत ने याचिकाकर्ताओं से सवाल किया कि जब आपराधिक प्रक्रिया के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष जाने का वैधानिक विकल्प मौजूद है, तो सीधे अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका कैसे पोषणीय है। इसके अतिरिक्त, अदालत ने प्रथम दृष्टया यह भी टिप्पणी की कि याचिका में मांगी गई कुछ राहतें आपराधिक अदालत के अधिकार क्षेत्र (Domain of Criminal Court) से बाहर प्रतीत होती हैं। अदालत ने विशेष रूप से इस बिंदु पर आदेश सुरक्षित रखा है कि वैकल्पिक प्रभावी उपचार (Alternate Efficacious Remedy) उपलब्ध होने के बावजूद क्या यह आपराधिक रिट याचिका सीधे उच्च न्यायालय के समक्ष विचारणीय (Maintainable) है।
सुनवाई के दौरान वकीलों की ओर से प्रमुख दलीलें (अधिवक्ता प्रशांत भूषण)
1. सत्ताधारी दल के सांसद हैं BCI चेयरमैन, निष्पक्ष जांच पर गंभीर आशंका
- याचिकाकर्ता वकीलों की ओर से पेश वरिष्ठ मानवाधिकार अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि मामले की जांच दिल्ली पुलिस से नहीं कराई जा सकती क्योंकि दिल्ली पुलिस सीधे केंद्र सरकार के अधीन काम करती है।
- उन्होंने रेखांकित किया कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा सत्तारूढ़ दल से संसद सदस्य (Rajya Sabha MP) हैं। ऐसे में पुलिस द्वारा निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी जांच किए जाने की कोई गुंजाइश नहीं बचती, जिससे याचिकाकर्ताओं के मन में पूर्वाग्रह और लीपापोती की वास्तविक आशंका है।
2. मजिस्ट्रेट के अधिकार क्षेत्र की सीमाएं (सीबीआई जांच व सीसीटीवी जब्ती)
- वैकल्पिक उपचार (जैसे BNSS की धारा 175(3) / पूर्ववर्ती CrPC 156(3) के तहत मजिस्ट्रेट का रुख करना) के सवाल पर प्रशांत भूषण ने दलील दी:
- एक न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास कानूनन सीबीआई (CBI) या किसी विशेष स्वतंत्र एजेंसी को जांच सौंपने का अधिकार नहीं होता। यह शक्ति केवल संवैधानिक अदालतों (हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट) में ही निहित है।
- घटना के समय के महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य (CCTV Footage) नष्ट होने की कगार पर हैं। मजिस्ट्रेट प्रारंभिक स्तर पर BCI को फुटेज संरक्षित कर सौंपने का त्वरित आदेश देने में सक्षम नहीं हैं।
3. BCI को अभ्यावेदन पर निर्णय लेने का निर्देश देने की मांग
- याचिकाकर्ताओं ने बताया कि उन्होंने 20 अगस्त को ही बार काउंसिल ऑफ इंडिया को इस संबंध में औपचारिक अभ्यावेदन (Representation) दिया था, जिस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
- उन्होंने मांग की कि हाईकोर्ट BCI को उनके 20 अगस्त के अभ्यावेदन पर एक तर्कसंगत और स्पष्ट आदेश (Reasoned and Speaking Order) पारित करने का निर्देश दे।
- यह दलील दी गई कि यह राहत आपराधिक घटना की जांच और साक्ष्यों के संरक्षण से सीधे जुड़ी हुई है, इसलिए उच्च न्यायालय इस आपराधिक रिट याचिका में इन सभी पहलुओं पर एक साथ विचार करने के लिए पूर्णतः सशक्त है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (BCI परिसर में वकीलों पर हमला)
- घटना: अगस्त 2026 के अंतिम सप्ताह में नई दिल्ली स्थित बार काउंसिल ऑफ इंडिया के मुख्यालय परिसर के भीतर और बाहर कुछ वकीलों पर कथित रूप से हमला और मारपीट की गई।
- पुलिस की निष्क्रियता का आरोप: याचिकाकर्ताओं का कहना है कि गंभीर चोटें आने और औपचारिक लिखित शिकायत देने के बावजूद दिल्ली पुलिस ने मामले में अब तक कोई प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं की और न ही आरोपियों के खिलाफ कोई दंडात्मक कदम उठाया।
- साक्ष्य नष्ट होने का खतरा: वकीलों ने अदालत से गुहार लगाई है कि घटना की सत्यता साबित करने के लिए बीसीआई मुख्यालय के संबंधित दिनों के संपूर्ण सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग को तत्काल सुरक्षित (Preserve) कर जांच एजेंसी को सौंपा जाए।
उच्च न्यायालय का रुख
न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया ने दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद याचिका की पोषणीयता (Maintainability) के विधिक बिंदु पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया। अदालत यह तय करेगी कि क्या मामले के असाधारण राजनीतिक व प्रशासनिक पहलुओं को देखते हुए सीधे रिट याचिका के माध्यम से स्वतंत्र एजेंसी से जांच और रिकॉर्ड संरक्षण का आदेश दिया जा सकता है, या याचिकाकर्ताओं को नियमित प्रक्रिया के तहत संबंधित मजिस्ट्रेट अदालत का दरवाजा खटखटाना होगा।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: अधिवक्तागण (याचिकाकर्ता) बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली), बार काउंसिल ऑफ इंडिया एवं अन्य [आपराधिक रिट याचिका – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक कानून: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 173 (एफआईआर दर्ज करना) एवं धारा 175(3) (मजिस्ट्रेट द्वारा जांच के आदेश / पूर्ववर्ती CrPC धारा 156(3)); दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 (DPSE Act – सीबीआई जांच); भारत का संविधान – अनुच्छेद 226 (संवैधानिक अदालतों का असाधारण रिट क्षेत्राधिकार)
- संबद्ध न्यायिक नजीरें:
- सकीरी वासु बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2008, सुप्रीम कोर्ट) एवं सुधीर भास्करराव तांबड़े बनाम हेमंत यशवंत धगे (2016, सुप्रीम कोर्ट) — ‘प्राथमिकी दर्ज न होने या उचित जांच न होने की स्थिति में पीड़ित पक्ष को सीधे उच्च न्यायालय में धारा 482 या अनुच्छेद 226 के तहत आने के बजाय मजिस्ट्रेट की अदालत में उपलब्ध वैधानिक वैकल्पिक उपचार का उपयोग करना चाहिए।’
- पश्चिम बंगाल राज्य बनाम समिति फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स (2010, सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ) — ‘यद्यपि उच्च न्यायालयों को सीबीआई जांच का आदेश देने का असाधारण अधिकार है, लेकिन इसका प्रयोग अत्यंत दुर्लभ, असाधारण और गंभीर मामलों में ही किया जाना चाहिए जहां राज्य पुलिस के पूर्वाग्रह से ग्रस्त होने की स्पष्ट संभावना हो।’
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता वकीलों की ओर से: अधिवक्ता प्रशांत भूषण
- पीठ: न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया (दिल्ली उच्च न्यायालय)
Criminal Court: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया (Justice Girish Kathpalia) |
| याचिकाकर्ता | पीड़ित एवं प्रभावित अधिवक्ता (अधिवक्ता प्रशांत भूषण के माध्यम से) |
| मुख्य मांग | घटना की CBI / स्वतंत्र एजेंसी जांच, FIR दर्ज करना और BCI के CCTV फुटेज सुरक्षित रखना |
| अदालत का रुख | याचिका की ‘रखरखाव योग्यता/स्वीकार्यता’ (Maintainability) पर फैसला सुरक्षित |

