केस मैट्रिक्स: Allahabad High Court Order on Adult Marriage & Police Interference
| पहलू | विवरण |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| माननीय पीठ | जस्टिस जे. जे. मुनीर एवं जस्टिस तरुण सक्सेना |
| याचिकाकर्ता | सौभागिनी शुक्ला एवं अन्य |
| मूल धारा | BNS की धारा 87 (अपहरण का झूठा मामला) |
| संवैधानिक अधिकार | अनुच्छेद 21 (स्वतंत्रता एवं जीवनसाथी चुनने का अधिकार) |
| कार्रवाई | FIR रद्द; SP भदोही व SHO पर जुर्माना, पिता पर ₹5,000 का हर्जाना। |
Adult Marriage: दो बालिग नागरिकों द्वारा अपनी मर्जी से किए गए विवाह पर पुलिसिया जांच और उत्पीड़न को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है।
जस्टिस जे. जे. मुनीर (Justice JJ Munir) और जस्टिस तरुण सक्सेना (Justice Tarun Saxena) की पीठ ने 27 जुलाई को सौभागिनी शुक्ला व अन्य बनाम यू.पी. राज्य मामले में सुनवाई करते हुए एफआईआर (FIR) को रद्द कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि वयस्कों द्वारा अपने साथी का चयन करना उनका मौलिक अधिकार है और विवाह की जांच करना पुलिस का काम नहीं है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
पुलिस की कार्यप्रणाली पर क्षोभ व्यक्त करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट की तीखी टिप्पणी, पुलिस को इस मामले में ताक-झांक करने वाले व्यक्ति (Nosy Parkers) बनने का कोई हक नहीं है। हमने बार-बार पुलिस को याद दिलाया है कि शादियों की जांच करना उनका काम नहीं है। उन्हें अपराधों की जांच करनी चाहिए। यह कोई ऐसा अपराध नहीं है जहां किसी जांच की आवश्यकता हो। दो वयस्क नागरिकों द्वारा अपनी स्वतंत्र इच्छा से जीवनसाथी चुनने और विवाह करने की जांच करना न केवल आपराधिक कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का गंभीर उल्लंघन भी है।
मामला क्या था?: भदोही का हिन्दू विवाह और अपहरण की झूठी FIR
- शादी और परिवार का विरोध: 28 वर्षीय पुरुष और 26 वर्षीय महिला (दोनों शिक्षित और आत्मनिर्भर) ने फरवरी 2026 में हिंदू रीति-रिवाज से विवाह किया था। महिला के परिवार वाले इस शादी के खिलाफ थे और उन्होंने कथित तौर पर दंपति को जान से मारने की धमकियां दीं।
- अपहरण की एफआईआर: अप्रैल 2026 में महिला के पिता की शिकायत पर भदोही जिले के सुरियावां थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 87 (विवाह के लिए मजबूर करने हेतु महिला का अपहरण) के तहत एफआईआर दर्ज कराई गई।
- हाई कोर्ट की शरण: दंपति ने एफआईआर रद्द करने और सुरक्षा की मांग को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने 29 अप्रैल को ही जांच पर रोक लगाते हुए पुलिस को सुरक्षा देने का आदेश दिया था।
एसपी भदोही के रवैये पर कोर्ट की नाराजगी और जुर्माना
हाई कोर्ट ने पाया कि महिला द्वारा कोर्ट में स्पष्ट रूप से शादी की सहमति जताने के बावजूद पुलिस अधीक्षक (SP), भदोही जांच जारी रखने और BNSS की धारा 180 व 183 (मैजिस्ट्रेट के सामने बयान) के तहत बयान दर्ज कराने पर अड़े हुए थे।
अदालत ने इसे “अवमाननापूर्ण” (Contumacious) मानते हुए माना कि पुलिस लड़की के परिवार का पक्ष ले रही थी।
- FIR रद्द: कोर्ट ने अपहरण की पूरी एफआईआर को पूरी तरह से रद्द (Quash) कर दिया।
- पुलिस पर जुर्माना: अदालत ने SP भदोही और थाना प्रभारी (SHO) सुरियावां पर ₹1,000 का जुर्माना लगाया।
- लड़की के पिता पर जुर्माना: महिला के पिता पर ₹5,000 का जुर्माना लगाया गया, जो उन्हें अपनी बेटी को देना होगा।

