कोर्ट रूम ड्रामे के प्रमुख मोड़ और बयान
- “वकील की जगह कोर्ट में है”: कीर्ति उप्पल की दलीलवरिष्ठ अधिवक्ता कीर्ति उप्पल ने वकीलों के एक समूह की ओर से पक्ष रखते हुए हस्तक्षेप याचिका (Intervention Application) दायर की। उन्होंने कहा:“दोनों पक्षों की भावनाएं उफान पर हैं। जिस तरह से चीजें हो रही हैं, उससे हमारा कानूनी पेशा प्रभावित हो रहा है… जैसा कि एक दिवंगत वरिष्ठ वकील ने कहा था—‘एक वकील का काम अदालत में है, सड़क पर नहीं।’ यदि आप सड़कों पर उतरेंगे तो यही सब होगा, जो सही नहीं है।”
- अदालत कक्ष में वकीलों का हंगामा और “Shame” के नारे:उप्पल के बयान का विरोध कर रहे याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने तुरंत अदालत परिसर के भीतर “Shame! Shame!” के नारे लगाए। पीठ की नाराजगी को देखते हुए याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने तुरंत इस नारेबाजी से खुद को अलग किया। SCAORA (सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन) के अध्यक्ष देवव्रत ने सभी वकीलों से शांत रहने और अदालती शिष्टाचार बनाए रखने की अपील की।
- पीठ की प्रतिक्रिया: “हमें हर विचार को सुनने का धैर्य रखना होगा”हंगामे को नियंत्रित करते हुए न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा:“कुछ बहुत अरुचिकर बातें हुई हैं। हो सकता है कि जो श्री गोपाल ने कहा वह अदालत के लिए सुखद न हो, फिर भी हमने उन्हें अपनी बात रखने की अनुमति दी। विरोधी विचार रखने वालों को भी अपनी बात कहने का समान अवसर (Space) मिलना चाहिए।”न्यायमूर्ति वी. मोहना ने जोड़ा:“प्रतिनिधित्व की प्रणाली लागू है, आप सभी का प्रतिनिधित्व किया जा रहा है और हम यहाँ आप सभी में विश्वास जगाने के लिए बैठे हैं।”
- सीनियर एडवोकेट शादान फरासात और हिरासत में लिए गए कार्यकर्ताओं की रिहाई:
- शनिवार के प्रदर्शन के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासात (Senior Advocate Shadan Farasat) को दिल्ली पुलिस द्वारा बसों में खींचे जाने का वीडियो सामने आया था, जिसे लेकर कानूनी बिरादरी में गहरा आक्रोश था।
- कोर्ट को यह भी सूचित किया गया कि हिरासत में लिए गए CJP कार्यकर्ताओं (अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका) को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा रिहा कर दिया गया है।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के खिलाफ 10 अक्टूबर को हुए विरोध-प्रदर्शनों, दिल्ली पुलिस द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत को घसीटकर हिरासत में लिए जाने के वायरल वीडियो, वकीलों द्वारा सीधे सड़कों पर उतरकर सार्वजनिक प्रदर्शन करने के औचित्य, तथा विधिक पेशे की आचार संहिता (Decorum of Legal Profession) पर सुप्रीम कोर्ट की विशेष रविवार सिटिंग के दौरान तीखा ड्रामा देखने को मिला।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की विशेष अवकाशकालीन पीठ ने अदालत कक्ष में हुए इस हंगामे पर कड़ा ऐतराज जताया। हालांकि वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, गोपाल शंकरनारायणन और ‘सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन’ (SCAORA) के अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता देवरत ने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए हंगामे से खुद को अलग किया और वकीलों से अदालत की गरिमा बनाए रखने की अपील की। वकीलों के एक समूह की ओर से हस्तक्षेप अर्जी (Impleadment Application) दाखिल करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कीर्ति उप्पल ने वकीलों के सड़क पर उतरने का कड़ा विरोध किया, जिस पर याचिकाकर्ताओं के समर्थक वकीलों ने कोर्ट रूम के भीतर ही “Shame! Shame!” (शर्म करो) के नारे लगाने शुरू कर दिए।
कोर्ट रूम में तीखी नोकझोंक: क्या हुआ विशेष सुनवाई में?
1. ‘वकील का काम अदालत में है, सड़क पर नहीं’ — कीर्ति उप्पल की दलील
वरिष्ठ अधिवक्ता कीर्ति उप्पल ने वकीलों के एक समूह की ओर से पक्षकार बनने की अर्जी पेश करते हुए कहा: “हमने एक अंतरिम आवेदन (IA) दायर किया है क्योंकि भावनाएं दोनों तरफ से भड़की हुई हैं। हम वकील हैं, यह वकीलों का मंच है, और जिस तरह से चीजें घटित हो रही हैं, यह हमारे पेशे को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। एक दिवंगत वरिष्ठ वकील ने बहुत सुंदर बात कही थी—भगवान उनकी आत्मा को शांति दे—उन्होंने कहा था: ‘वकील का काम अदालत में है, सड़क पर नहीं’ (A lawyer’s job is in the court, not in the street)। यदि आप सड़कों पर उतरेंगे… तो क्या अब आप यही करेंगे? यह किसी भी सूरत में उचित नहीं है।”
2. कोर्ट रूम में “Shame” के नारे और जजों का सख्त हस्तक्षेप:
- जैसे ही वरिष्ठ अधिवक्ता उप्पल ने यह टिप्पणी की, याचिकाकर्ताओं के समर्थन में खड़े कई अधिवक्ताओं ने कोर्ट रूम में तीखा विरोध जताया और “Shame! Shame!” के नारे लगाए।
- वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और गोपाल शंकरनारायणन ने तुरंत मामले में दखल दिया और साथी वकीलों के इस अनियंत्रित आचरण से खुद को पूरी तरह अलग करते हुए मर्यादा बहाल करने का प्रयास किया।
- SCAORA अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता देवरत ने अदालत में उपस्थित सभी वकीलों से शांत रहने और शीर्ष अदालत की गरिमा बनाए रखने का औपचारिक आह्वान किया।
3. जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना का रुख:
हंगामे पर असंतोष व्यक्त करते हुए न्यायमूर्ति बागची ने कहा: “बहुत अप्रिय घटनाएं घटी हैं। जो बात मिस्टर गोपाल (शंकरनारायणन) ने कही, हो सकता है वह अदालत को बहुत रास न आई हो, फिर भी हमने उन्हें बोलने का पूरा अवसर दिया। विपक्ष और हर पक्षकार को अपनी बात रखने का समान अवसर और स्थान (Same space) मिलना चाहिए।”
न्यायमूर्ति वी. मोहना ने जोड़ते हुए कहा: “यहाँ एक प्रतिनिधि व्यवस्था (Representative System) है। आप सभी का विधिवत प्रतिनिधित्व हो रहा है और हम यहाँ आप सभी के भीतर न्यायपालिका के प्रति विश्वास जगाने के लिए बैठे हैं।”
4. सोशल मीडिया पर सुप्रीम कोर्ट पर आक्षेप लगाने पर उप्पल का पलटवार:
उप्पल ने अपनी दलील जारी रखते हुए कहा:
- “मैं ठीक यही बात कहना चाहता था। जब आप पूरी दुनिया के सामने ट्वीट करते हैं और सुप्रीम कोर्ट पर आक्षेप लगाते हैं कि ‘सुप्रीम कोर्ट जो कुछ कर रहा है वह निंदनीय है’, तो मैं अपनी बारी आने पर यह सब दिखाऊंगा। मेरी प्रार्थना है कि हमें पक्षकार बनाया जाए क्योंकि इस संस्था (न्यायपालिका) की रक्षा करना हमारा भी प्राथमिक दायित्व है।”
सुनवाई के अन्य महत्वपूर्ण बिंदु एवं निर्देश
- धारा 163 BNSS के नोटिस बोर्ड तुरंत हटाने का आदेश: सुप्रीम कोर्ट परिसर और आसपास न्याय तक पहुंच (Access to Justice) में बाधा बन रहे धारा 163 BNSS के बोर्ड्स को तत्काल हटाने का निर्देश दिया गया।
- कानून से परे कोई अवैध हिरासत नहीं: अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त किसी को भी हिरासत में नहीं रखा जाएगा और धारा 163 के क्षेत्र से बाहर शांतिपूर्ण सभा की कानून सम्मत अनुमति होगी।
- 45 मेट्रो स्टेशनों के बंद होने पर हलफनामा: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा मेट्रो सामान्य चलने के दावों के विपरीत, अदालत ने 45 मेट्रो स्टेशनों के बंद रहने पर अधिकारियों से कारण बताओ हलफनामा मांगा है।
- विमान से हिरासत में लिए गए तीन कार्यकर्ताओं की रिहाई: CJP की लीगल हेड रत्ना सिंह ने पीठ को सूचित किया कि 10 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस द्वारा उड़ान (Flight) से हिरासत में लिए गए तीन कार्यकर्ताओं—अभिजीत दिपके, सौरव दास और आशुतोष रांका—को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) अदालत द्वारा रिहा कर दिया गया है।
- अगली सुनवाई: सभी लंबित और गैर-सूचीबद्ध आवेदनों को मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 को मुख्य मामले के साथ सूचीबद्ध किया गया है।
विरोध का मूल कारण: चुनाव आयोग में 14 बार लिखित असहमति
यह पूरा मामला तब भड़का जब द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में सामने आया कि चुनाव आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी ने 10 महीने में 14 मौकों पर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के निर्णयों के खिलाफ लिखित असहमति (Written Dissents) दर्ज कराई थी, जिसमें प्रशासनिक फैसले पूर्ण आयोग की सहमति के बिना लिए गए थे। इसी के विरोध में जंतर-मंतर पर विपक्षी दलों द्वारा किए जा रहे प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ था।
विधिक एवं आचार संहिता विश्लेषण
- अधिवक्ता का कर्तव्य एवं विधिक शिष्टाचार (BCI Rules, Section I – Duty to the Court):
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के तहत अधिवक्ताओं का सर्वोच्च कर्तव्य अदालत की गरिमा और मर्यादा को अक्षुण्ण रखना है। अदालत कक्ष के भीतर नारेबाजी करना (Shouting inside courtroom) प्रत्यक्ष अवमानना और व्यावसायिक कदाचार (Professional Misconduct) के दायरे में आता है।
- संवैधानिक अभिव्यक्ति बनाम संस्थागत गरिमा:
- यद्यपि अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत वकीलों को भी एक नागरिक के रूप में शांतिपूर्ण प्रदर्शन और असहमति का अधिकार है, परंतु ‘अदालत के अधिकारी’ (Officers of the Court) होने के नाते न्यायपालिका की साख और संस्थागत सम्मान को बनाए रखने का दोहरा दायित्व उन पर होता है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: शैलेंद्र मणि त्रिपाठी / डॉ. मेनका गुरुस्वामी बनाम गोविंद मोहन व अन्य [अवमानना एवं रिट याचिकाएं – सर्वोच्च न्यायालय]
- विशेष पीठ: न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (विशेष रविवार सिटिंग)
- तारीख: 11 अक्टूबर 2026
- हस्तक्षेपकर्ता (वकीलों का समूह): वरिष्ठ अधिवक्ता कीर्ति उप्पल
- याचिकाकर्ताओं की ओर से प्रमुख वकील: वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, गोपाल शंकरनारायणन, डॉ. मेनका गुरुस्वामी एवं अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी
- बार संस्था का प्रतिनिधित्व: वरिष्ठ अधिवक्ता देवरत (अध्यक्ष, SCAORA)
- अगली सुनवाई: मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026
Advocate Detention:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| विशेष पीठ | न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| मध्यस्थता याचिका (IA) | सीनियर एडवोकेट कीर्ति उप्पल (अधिवक्ताओं के समूह की ओर से) |
| विवादित बिंदु | क्या वकीलों को सार्वजनिक प्रदर्शनों में भाग लेना चाहिए और क्या इससे विधिक पेशे की गरिमा गिरती है? |
| हाई-प्रोफाइल घटना | सीनियर एडवोकेट शादान फरासात को शनिवार को पुलिस द्वारा घसीटे जाने की वीडियो क्लिप |

