अदालत कक्ष में हुई बहस और प्रमुख बिंदु
- “अदालत के लिए पीड़ित की पहचान मायने नहीं रखती”:जब पुलिस अधिकारियों के वकील ने प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों के साथ हुई हिंसा का दृश्य और विवरण रखा, तो जस्टिस बागची ने कहा:“न्यायालय उस व्यक्ति के प्रति निरपेक्ष/उदासीन (Agnostic) हैं जो पीड़ित है—चाहे वह पुलिस अधिकारी हो, वकील हो या कोई साधारण नागरिक। जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अदालत की प्रतिक्रिया और चिंता समान रूप से संवेदनशील है। इसलिए आप चिंता न करें।”अदालत ने आगे स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के संदर्भ में पुलिस अधिकारियों के पास राज्य की ओर से प्रस्तुत दलीलों से अलग कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं है, इसलिए वे सॉलिसिटर जनरल की सहायता करें।
- सुप्रीम कोर्ट परिसर के बाहर BNSS धारा 163 का बोर्ड हटाने का आदेश:पीठ को जब सूचित किया गया कि सुप्रीम कोर्ट परिसर और आसपास भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 (पूर्व में IPC की धारा 144) लागू होने का नोटिस बोर्ड लगाया गया है, तो अदालत ने उसे तुरंत हटाने का कड़ा आदेश दिया: “हम अधिकारियों को उस बोर्ड को तुरंत हटाने का निर्देश देते हैं ताकि सुप्रीम कोर्ट और अन्य अदालतों तक पहुँचने (Access to Justice) या आवाजाही (Ingress & Egress) में किसी भी प्रकार की शंका या बाधा न रहे।”
- अवैध हिरासत (Illegal Detention) और मेट्रो प्रतिबंधों पर रोक:
- गैर-कानूनी हिरासत: अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया कि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना किसी को भी अवैध रूप से हिरासत में न लिया जाए, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ धारा 163 लागू नहीं है।
- मेट्रो व इंटरनेट सेवाएँ: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा 45 मेट्रो स्टेशनों के गेट बंद होने और इंटरनेट/परिवहन प्रतिबंधों पर स्थिति स्पष्ट करने के बाद, कोर्ट ने दिल्ली मेट्रो, रेलवे और इंटरनेट सेवाओं को सामान्य रूप से चालू रखने के निर्देश दिए।
- अवमानना नोटिस: 9 अक्टूबर के आदेश के बावजूद 10 अक्टूबर को मेट्रो बंद रखने पर केंद्रीय गृह सचिव, दिल्ली पुलिस कमिश्नर और DMRC चेयरमैन को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।
- वकीलों के विरोध प्रदर्शन पर बार का विभाजन:सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कीर्ति उप्पल ने वकीलों द्वारा सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करने का विरोध किया और कहा कि इससे कानूनी पेशे की गरिमा को ठेस पहुँचती है। वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासात को शनिवार को पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने और खींचे जाने का मामला भी अदालत के सामने रखा गया, जिसे लेकर गहरी चिंता व्यक्त की गई।
विरोध प्रदर्शन का मूल कारण
यह पूरा विवाद और 10 अक्टूबर का विरोध प्रदर्शन द इंडियन एक्सप्रेस की एक खोजी रिपोर्ट के बाद शुरू हुआ, जिसमें खुलासा किया गया था कि चुनाव आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी ने 10 महीने की अवधि के दौरान चुनाव आयोग के मुख्य निर्णयों पर कम से कम 14 अलग-अलग अवसरों पर अपनी लिखित असहमति (Written Dissents) दर्ज कराई थी। ये आपत्तियाँ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा बिना पूर्ण आयोग की सहमति के लिए गए निर्णयों से संबंधित थीं।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 10 अक्टूबर को हुए व्यापक विरोध-प्रदर्शनों, विपक्षी नेताओं व वकीलों की बड़े पैमाने पर हिरासत (Mass Detentions), दिल्ली मेट्रो के 45 स्टेशनों को बंद रखने और इंटरनेट निलंबन पर सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर 2026 के आदेशों की कथित जानबूझकर अवहेलना (Wilful Contempt), तथा प्रदर्शनों के दौरान पुलिसकर्मियों व वकीलों द्वारा एक-दूसरे पर लगाए गए बर्बरता (Brutality) के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक और संतुलित व्यवस्था दी है।
रविवार विशेष सुनवाई लाइव
रविवार, 11 अक्टूबर 2026 को आयोजित विशेष अवकाशकालीन सुनवाई (Special Sunday Sitting) में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की खंडपीठ ने केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और DMRC चेयरपर्सन डी. थारा के खिलाफ अवमानना याचिका पर कारण बताओ नोटिस जारी किया। इसके साथ ही अदालत ने न्याय तक नागरिकों और वकीलों की निर्बाध पहुंच (Unhindered Access to Justice) सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट परिसर और आसपास लगाए गए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 163 (निषेधाज्ञा) के सभी नोटिस बोर्डों को तत्काल प्रभाव से हटाने (Take Down) का आदेश दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Right to Life and Personal Liberty) के संरक्षण की बात आती है, तो अदालत के लिए पीड़ित का पद या पहचान कोई मायने नहीं रखती—न्यायालय सभी के लिए समान रूप से संवेदनशील है।
शीर्ष अदालत के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं मौखिक टिप्पणियां
1. ‘अदालतें पीड़ित की पहचान के प्रति पूरी तरह निरपेक्ष (Agnostic) हैं’
सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारियों की ओर से पेश वकील ने जब प्रदर्शनों के दौरान पुलिसकर्मियों के खिलाफ “भारी बर्बरता” (Massive Brutality) का आरोप लगाते हुए आवेदन का उल्लेख किया, तो न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने दो-टूक व्यवस्था दी:
“अदालतें इस बात के प्रति पूरी तरह निरपेक्ष/तटस्थ (Courts are agnostic) हैं कि विषय या पीड़ित कौन है—चाहे वह कोई पुलिस अधिकारी हो, कोई वकील हो या कोई साधारण नागरिक। जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए न्यायालय की प्रतिक्रिया और चिंता समान रूप से संवेदनशील (Equally Sensitive) है। इसलिए आप बिल्कुल चिंता न करें।”
2. ‘कानून-व्यवस्था में पुलिस अधिकारियों का राज्य से अलग कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं’
जब वकील ने पुलिस अधिकारियों की सुरक्षा का हवाला देते हुए प्रदर्शनकारियों के आचरण पर सवाल उठाया, तो जस्टिस बागची ने प्रशासनिक पदानुक्रम स्पष्ट करते हुए कहा:
- “कानून एवं व्यवस्था बनाए रखने के मामले में पुलिस अधिकारियों का राज्य सरकार (State Submission) की दलीलों से इतर कोई स्वतंत्र विधिक अधिकार नहीं है। इसलिए आप कृपया सॉलिसिटर जनरल और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल की सहायता करें।”
3. सुप्रीम कोर्ट के आसपास से BNSS धारा 163 के बोर्ड हटाने का आदेश:
अदालत को जब यह अवगत कराया गया कि सुप्रीम कोर्ट परिसर और आसपास के रास्तों पर धारा 163 BNSS (पूर्ववर्ती CrPC धारा 144) लागू होने के नोटिस बोर्ड लगा दिए गए हैं, तो खंडपीठ ने इसे न्याय के अधिकार पर सीधा अवरोध मानते हुए कड़ा आदेश पारित किया: “हम अधिकारियों को निर्देश देते हैं कि वे उस बोर्ड को तुरंत हटाएं, ताकि सुप्रीम कोर्ट और कानून की किसी भी अन्य अदालत में प्रवेश और निकास (Ingress and egress) तथा न्याय तक पहुंच (Access to Justice) को लेकर किसी के मन में कोई आशंका न रहे। विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया (Procedure established by law) के अतिरिक्त किसी भी नागरिक को अवैध रूप से हिरासत में नहीं रखा जाएगा, विशेष रूप से उन क्षेत्रों से परे जहां धारा 163 प्रभावी है।”
अवमानना याचिका पर केंद्र व डीएमआरसी को नोटिस
अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने वरिष्ठ अधिकारियों से जवाब तलब किया:
- सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का तर्क: एसजी मेहता ने अवमानना के आरोपों का खंडन करते हुए दावा किया कि दिल्ली मेट्रो सामान्य रूप से चल रही थी और केवल कुछ प्रवेश द्वारों को नियंत्रित किया गया था।
- अदालत का संज्ञान: पीठ ने नोट किया कि 303 मेट्रो स्टेशनों में से 45 प्रमुख स्टेशनों पर प्रवेश और निकास पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया था।
- संक्षिप्त हलफनामे का निर्देश: अदालत ने अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए एक संक्षिप्त हलफनामा (Short Affidavit) दाखिल करने का निर्देश दिया कि 9 अक्टूबर के न्यायिक आदेश के बावजूद 45 मेट्रो स्टेशनों को बंद क्यों किया गया और उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों न चलाई जाए।
वकीलों के सड़क पर उतरने और हिरासत पर तीखी बहस
सुनवाई के दौरान प्रदर्शनों में वकीलों की भूमिका को लेकर भी तीखी बहस हुई:
- सीनियर एडवोकेट कीर्ति उप्पल की आपत्ति: वरिष्ठ अधिवक्ता कीर्ति उप्पल ने संस्था की गरिमा और विधिक पेशे की शुचिता की रक्षा के लिए हस्तक्षेप अर्जी पेश करते हुए वकीलों के सड़कों पर उतरकर विरोध करने का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि दोनों पक्षों की ओर से भावनाएं भड़की हुई हैं और वकीलों का सड़कों पर प्रदर्शन करना स्वयं विधिक पेशे की गरिमा को नुकसान पहुंचा रहा है।
- वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत की हिरासत का वीडियो: शनिवार को वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत को दिल्ली पुलिस द्वारा सड़क से घसीटकर हिरासत में लिए जाने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसे लेकर वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं में भारी रोष देखा गया।
विरोध-प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि: चुनाव आयोग में मतभेद का खुलासा
दिल्ली में यह व्यापक विरोध प्रदर्शन 10 अक्टूबर 2026 को उस समय भड़क उठा, जब ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक खोजी रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि:
- निर्वाचन आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी ने 10 महीने की अवधि के दौरान कम से कम 14 अलग-अलग अवसरों पर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के निर्णयों के खिलाफ लिखित असहमति (Written Dissents) दर्ज कराई थी।
- ये आपत्तियां पूर्ण आयोग (Full Commission) की जानकारी, सहमति या भागीदारी के बिना जारी किए गए प्रशासनिक फैसलों और आधिकारिक आदेशों से संबंधित थीं, जिनमें से चार फैसले एक ही दिन में लिए गए थे।
- इसी खुलासे के बाद विपक्षी दलों और ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) ने जंतर-मंतर पर CEC के इस्तीफे की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया था।
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- संविधान का अनुच्छेद 21 एवं अनुच्छेद 32 (न्याय तक पहुंच – Access to Justice):
- सर्वोच्च न्यायालय ने अनीता कुशवाहा बनाम पुष्पा सदन (2016) में स्थापित किया है कि अदालतों तक निर्बाध पहुंच नागरिकों का एक मौलिक अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट के आसपास निषेधाज्ञा (Section 163 BNSS) के बोर्ड लगाना वकीलों और वादकारियों के अदालत पहुंचने के अधिकार को अवरुद्ध करता है, जिसे अदालत ने तुरंत हटाने का आदेश दिया।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 163 (पूर्ववर्ती CrPC 144):
- यह धारा उपद्रव या आशंकित खतरे के मामलों में तात्कालिक आदेश जारी करने की शक्ति देती है। परंतु इसका उपयोग शांतिपूर्ण असंतोष या अदालत आने-जाने के मार्ग को सील करने के लिए एक सामान्य औजार के रूप में नहीं किया जा सकता।
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 11 व 12:
- जब सुप्रीम कोर्ट ने 9 अक्टूबर को मेट्रो और ट्रेन सेवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध न लगाने का आदेश दिया था, तो 45 स्टेशनों को बंद करना प्रथम दृष्टया अदालती आदेश की भावना का उल्लंघन है, जिस पर अदालत ने अधिकारियों से जवाब मांगा है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: शैलेंद्र मणि त्रिपाठी बनाम गोविंद मोहन व अन्य [अवमानना याचिका] संयुक्त रूप से पठित संबंधित रिट याचिकाएं [सर्वोच्च न्यायालय]
- विशेष पीठ: न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (विशेष रविवार सिटिंग)
- आदेश की तिथि: रविवार, 11 अक्टूबर 2026
- अगली सुनवाई की तिथि: मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 (सभी गैर-सूचीबद्ध व संबद्ध अर्जियों के साथ)
- प्रमुख विधिक निर्देश:
- सुप्रीम कोर्ट परिसर के आसपास से BNSS की धारा 163 के सभी बोर्ड तुरंत हटाए जाएं।
- कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त किसी को भी अवैध रूप से हिरासत में न रखा जाए।
- केंद्रीय गृह सचिव, दिल्ली पुलिस कमिश्नर और DMRC चेयरपर्सन 45 मेट्रो स्टेशनों के बंद होने पर कारण बताओ हलफनामा दाखिल करें।
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- केंद्र सरकार/दिल्ली की ओर से: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता
- अवमानना याचिकाकर्ता: अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी
- अन्य वरिष्ठ अधिवक्तागण: वरिष्ठ अधिवक्ता कीर्ति उप्पल, वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. मेनका गुरुस्वामी
- प्रासंगिक कानून एवं संवैधानिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (जीवन व स्वतंत्रता), अनुच्छेद 19(1)(a), अनुच्छेद 19(1)(b) एवं अनुच्छेद 129 (अवमानना शक्ति)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 163
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(b) व 12
- वर्तमान स्थिति: नोटिस जारी; सुप्रीम कोर्ट परिसर से निषेधाज्ञा बोर्ड हटाने का तत्काल निर्देश; मामले की विस्तृत सुनवाई मंगलवार (13 अक्टूबर) को तय।
Special Sunday Sitting: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| विशेष पीठ | जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना |
| सुनवाई की तिथि | रविवार, 11 अक्टूबर 2026 (विशेष अवकाश सुनवाई) |
| मुख्य आदेश | 1. BNSS की धारा 163 का बोर्ड हटाने का निर्देश 2. मेट्रो व सार्वजनिक परिवहन का सुचारू संचालन सुनिश्चित करना 3. गैर-कानूनी हिरासत (Illegal Detention) पर रोक और अवमानना नोटिस |
| अगली सुनवाई | मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 |

