Sunday, November 8, 2026
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Arrest Memo: आरोपी को रिहा होने से रोकने के लिए बाद में अरेस्ट मेमो में कारण जोड़ना झूठे साक्ष्य गढ़ने का गंभीर अपराध; IO के खिलाफ तुरंत FIR दर्ज हो

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मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी उल्लंघन

  1. मामले का घटनाक्रम:याचिकाकर्ता मोहम्मद यासीन आत्महत्या के एक मामले में जांच में शामिल होने के लिए 13 सितंबर को पुलिस स्टेशन गया था, जहां पुलिस ने उसे 14 सितंबर को गिरफ्तार कर लिया। याचिकाकर्ता को गिरफ्तारी के समय न तो गिरफ्तारी के कारण दिए गए और न ही अरेस्ट मेमो में कोई विवरण लिखा गया।
  2. अरेस्ट मेमो में बाद में हेरफेर:4 नवंबर के अपने आदेश में हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता को सौंपी गई अरेस्ट मेमो की प्रति में केवल “BNS की धारा 108” लिखा था। बाद में रिमांड मजिस्ट्रेट और ट्रायल कोर्ट के सामने पेश किए गए कागजातों में पुलिस अधिकारी ने यह विवरण जोड़ दिया कि ‘मामला दर्ज हो चुका है और ऐसे साक्ष्य मिले हैं कि याचिकाकर्ता के उत्पीड़न के कारण मृतका ने आत्महत्या की’।
  3. संवैधानिक सुरक्षा और सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश:अदालत ने माना कि गिरफ्तारी के कारणों और आधारों का अभियुक्त को लिखित में न देना सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित स्थापित सिद्धांतों और संविधान के अनुच्छेद 22(1) का सीधा उल्लंघन है। इसके बाद अदालत ने यासीन की हिरासत को अवैध करार देते हुए उसे तुरंत रिहा करने का आदेश दिया।

मुख्य विधिक व प्रशासनिक निष्कर्ष

1. पुलिस साक्ष्य गढ़े जाने के खिलाफ सख्त कार्रवाई:

यह आदेश पुलिस अधिकारियों को कड़ा संदेश देता है कि अदालतों और रिमांड मजिस्ट्रेटों को गुमराह करने या प्रक्रियात्मक कमियों को छिपाने के लिए अरेस्ट मेमो या केस डायरी में बाद में बदलाव करना एक गंभीर आपराधिक अपराध (साक्ष्य गढना/फर्जीवाड़ा) है।

2. व्यक्तिगत स्वतंत्रता और प्रक्रियात्मक पवित्रता:

बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं में अदालती निगरानी यह सुनिश्चित करती है कि धारा 50 CrPC / धारा 35 BNSS और संवैधानिक गारंटियों का पालन केवल कागजी औपचारिकता न बने।

प्रयागराज: भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 (दैहिक स्वतंत्रता की सुरक्षा) व अनुच्छेद 22(1) (गिरफ्तारी के वास्तविक और विस्तृत आधारों से तत्काल अवगत कराए जाने का अपरिवर्तनीय मौलिक अधिकार), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 47 (गिरफ्तारी के आधारों की लिखित सूचना देने का वैधानिक कर्तव्य—पूर्ववर्ती CrPC धारा 50), भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) के अध्याय XIV (लोक न्याय के विरुद्ध अपराध एवं मिथ्या साक्ष्य गढ़ना—Offences relating to False Evidence and Against Public Justice), तथा सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों—पंकज बंसल बनाम भारत संघ [(2023) SCC OnLine SC 1244], प्रबीर पुरकायस्थ बनाम राज्य [(2024) 8 SCC 329] एवं अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य [(2014) 8 SCC 273]—के स्थापित विधिक मानकों के तहत इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पुलिस द्वारा सरकारी दस्तावेजों में हेरफेर करने के मामले में अत्यंत सख्त रुख अपनाया है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन (Justice Atul Sreedharan) और न्यायमूर्ति अचल सचदेव (Justice Achal Sachdev) की खंडपीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition) पर सुनवाई करते हुए फर्रुखाबाद जिले के संबंधित जांच अधिकारी (Investigating Officer – IO) के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने का आदेश दिया है।

अदालत ने पाया कि जांच अधिकारी ने गिरफ्तारी के समय आरोपी को सौंपे गए अरेस्ट मेमो में गिरफ्तारी के वास्तविक कारण (Reasons for arrest) दर्ज नहीं किए थे, किंतु बाद में रिमांड मजिस्ट्रेट और विचारण न्यायालय के समक्ष आरोपी को राहत या जमानत पाने से रोकने की दुर्भावना से आधिकारिक केस डायरी व अरेस्ट मेमो में पिछली तारीख में कारण जोड़कर जाली/मिथ्या साक्ष्य गढ़े (Fabricated evidence)। खंडपीठ ने इस कृत्य को लोक न्याय के विरुद्ध गंभीर संज्ञेय अपराध करार देते हुए फर्रुखाबाद के पुलिस अधीक्षक (SP) को सात दिनों के भीतर एफआईआर दर्ज कर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया और आरोपी मोहम्मद यासीन की कस्टडी को पूरी तरह अवैध घोषित करते हुए उसे तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।

उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘रिमांड और जमानत से वंचित करने हेतु पुलिस द्वारा साक्ष्य गढ़ना निंदनीय; लोक न्याय के विरुद्ध अपराध’:

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने पुलिस की इस हेराफेरी को न्यायिक प्रणाली के साथ धोखाधड़ी मानते हुए अपने आदेश में दर्ज किया: “यह न्यायालय पुलिस की ओर से केवल गिरफ्तारी के कारणों और गिरफ्तारी मेमो की खानापूर्ति करने के उद्देश्य से साक्ष्य गढ़ने (Fabricating evidence) की ऐसी कार्रवाई की कठोर निंदा करता है—जो कारण याचिकाकर्ता को कभी उपलब्ध ही नहीं कराए गए थे—ताकि उसे रिमांड कार्यवाहियों और जमानत कार्यवाहियों में विधिक राहत से वंचित किया जा सके। जांच अधिकारी द्वारा प्रथम दृष्टया ‘मिथ्या साक्ष्य देने और लोक न्याय के विरुद्ध अपराध’ (Offence relating to false evidence and offence against public justice) किया गया प्रतीत होता है।”

2. फर्रुखाबाद के पुलिस अधीक्षक (SP) को 7 दिन में FIR दर्ज करने का अधिदेश:

  • पीठ ने वरिष्ठ पुलिस नेतृत्व की जवाबदेही तय करते हुए आदेश दिया:“पुलिस अधीक्षक, फर्रुखाबाद को निर्देशित किया जाता है कि वे इस मामले के संबंधित जांच अधिकारी (IO) के विरुद्ध तत्काल प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराएं और इस न्यायालय के समक्ष सात दिनों की अवधि के भीतर एक औपचारिक अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) प्रस्तुत करें।”
  • अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर 2026 को तय की है, जहाँ एसपी की अनुपालन रिपोर्ट का परीक्षण किया जाएगा।

3. ‘अरेस्ट मेमो में केवल धारा लिखना आधारों की सूचना नहीं; गिरफ्तारी असंवैधानिक’:

  • अदालत ने 4 नवंबर 2026 के अपने आदेश का हवाला देते हुए पाया कि आरोपी को जो पर्चा सौंपा गया था, उसमें केवल अपराध की धारा—BNS की धारा 108 (आत्महत्या का दुष्प्रेरण)—लिखी गई थी।
  • अदालत ने टिप्पणी की:“यह विवरण कि मामला दर्ज किया जा चुका है और ऐसे साक्ष्य सामने आए हैं जो यह दर्शाते हैं कि मृतका ने याचिकाकर्ता द्वारा किए गए कथित उत्पीड़न के कारण आत्महत्या की, याचिकाकर्ता को दी गई प्रति से पूरी तरह नदारद (Conspicuously absent) थे।”
  • सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुरूप गिरफ्तारी के विस्तृत आधार लिखित रूप में न दिए जाने के कारण पूरी गिरफ्तारी अवैध और असंवैधानिक हो गई।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (सितंबर – नवंबर 2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयइलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ प्रयागराज (संवैधानिक बंदी प्रत्यक्षीकरण क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 226)
पीठन्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन (Justice Atul Sreedharan) एवं न्यायमूर्ति अचल सचदेव (Justice Achal Sachdev)
आदेश की तिथिनवंबर 2026 (मामले की अगली सुनवाई: 16 नवंबर 2026)
केस संदर्भमोहम्मद यासीन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 3 अन्य [Habeas Corpus Writ Petition No. … / 2026]
याचिकाकर्ता (बंदी)मोहम्मद यासीन (Mohd. Yaseen) — आत्महत्या मामले में अवैध रूप से निरुद्ध अभियुक्त।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ताअधिवक्ता सत्य धीर सिंह जादौन (Advocate Satya Dheer Singh Jadaun)।
प्रतिवादी पक्ष1. उत्तर प्रदेश राज्य (गृह विभाग)
2. पुलिस अधीक्षक (SP), फर्रुखाबाद
3. संबंधित थाना प्रभारी व जांच अधिकारी (IO)।
मूल आपराधिक मामलाएक महिला की आत्महत्या के मामले में भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 108 (आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण) के तहत दर्ज प्राथमिकी।
घटना का घटनाक्रमयासीन 13 सितंबर 2026 को स्वयं जांच में सहयोग करने थाने गया था। 14 सितंबर को पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के समय जो अरेस्ट मेमो उसे दिया गया, उसमें केवल ‘धारा 108 BNS’ का उल्लेख था; यह नहीं बताया गया कि उसने किस प्रकार उत्पीड़न किया या उसके खिलाफ क्या साक्ष्य मिले।
जांच अधिकारी (IO) की जालसाजीजब मामला रिमांड मजिस्ट्रेट के समक्ष गया, तो जमानत मिलने से रोकने के लिए जांच अधिकारी ने अदालत में पेश की जाने वाली फाइल में बाद में यह लिख दिया कि मृतका ने यासीन द्वारा प्रताड़ित किए जाने के कारण आत्महत्या की थी। हाईकोर्ट ने दोनों दस्तावेजों (यासीन को दी गई कॉपी और कोर्ट में पेश कॉपी) का मिलान किया, जिससे साफ पकड़ा गया कि बाद में हेरफेर किया गया था।
उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय1. यासीन की गिरफ्तारी को अनुच्छेद 22(1) और BNSS धारा 47 के उल्लंघन में अवैध घोषित कर तत्काल रिहाई का आदेश दिया गया।
2. फर्रुखाबाद के पुलिस अधीक्षक को जांच अधिकारी के विरुद्ध आपराधिक षड्यंत्र व साक्ष्य गढ़ने की धाराओं में एफआईआर दर्ज कर 7 दिन में अनुपालन रिपोर्ट देने का सख्त निर्देश दिया गया।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘अनुच्छेद 22(1), बीएनएसएस धारा 47 और मिथ्या साक्ष्य’

  • ‘गिरफ्तारी के कारण’ (Reasons) बनाम ‘गिरफ्तारी के आधार’ (Grounds of Arrest):
    • सर्वोच्च न्यायालय ने प्रबीर पुरकायस्थ [(2024) 8 SCC 329] में स्पष्ट किया है कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 22(1) प्रत्येक गिरफ्तार व्यक्ति को यह मौलिक अधिकार देता है कि उसे गिरफ्तारी के आधारों से यथाशीघ्र अवगत कराया जाए।
    • कानूनन ‘कारण’ (Reasons for arrest) वे प्रशासनिक आधार होते हैं जो पुलिस अधिकारी अपनी डायरी में लिखता है कि गिरफ्तारी क्यों आवश्यक थी (जैसे फरार होने का डर या साक्ष्य मिटाने का अंदेशा)। जबकि ‘आधार’ (Grounds of arrest) वे बुनियादी तथ्य और आरोप होते हैं जो आरोपी को लिखित में दिए जाने अनिवार्य हैं ताकि वह अपने वकील से परामर्श कर सके और प्रभावी रूप से जमानत मांग सके। केवल “धारा 108 BNS” लिख देना आधार की श्रेणी में नहीं आता।
  • भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत साक्ष्य गढ़ने का अपराध:
    • पुलिस अधिकारी द्वारा केस डायरी या अरेस्ट मेमो में बाद में अतिरिक्त विवरण जोड़ना BNS की उन धाराओं को आकर्षित करता है जो न्यायिक कार्यवाही में उपयोग हेतु झूठे साक्ष्य गढ़ने (Fabricating false evidence for judicial proceedings) और सरकारी पद का दुरुपयोग कर किसी व्यक्ति को अवैध हानि पहुंचाने से संबंधित हैं।
    • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब कोई पुलिस अधिकारी अदालत को धोखा देने के उद्देश्य से दस्तावेज में हेरफेर करता है, तो वह केवल विभागीय कदाचार (Departmental Misconduct) का दोषी नहीं होता, बल्कि वह एक सामान्य अपराधी की तरह आपराधिक कानून के तहत सजा पाने का हकदार होता है।
  • बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus) का त्वरित उपचार:
    • यदि गिरफ्तारी की प्रक्रिया में अनुच्छेद 21 व 22(1) का तनिक भी उल्लंघन हुआ हो, तो उस क्षण से आगे की संपूर्ण कस्टडी पूर्णतः अवैध और असंवैधानिक हो जाती है।
    • उच्च न्यायालय ने सही माना कि रिमांड मजिस्ट्रेट द्वारा पारित रिमांड आदेश भी इस प्रारंभिक अवैधता को वैध नहीं बना सकता, और इसीलिए बंदी को अविलंब रिहा करने का आदेश पारित किया गया।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ प्रयागराज (संवैधानिक बंदी प्रत्यक्षीकरण क्षेत्राधिकार — अनुच्छेद 226)
  • केस संदर्भ: मोहम्मद यासीन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 3 अन्य [Habeas Corpus Writ Petition No. … / 2026]
  • पीठ: न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन (Justice Atul Sreedharan) एवं न्यायमूर्ति अचल सचदेव (Justice Achal Sachdev)
  • आदेश की तिथि: नवंबर 2026 (अनुपालन रिपोर्ट व अगली सुनवाई: 16 नवंबर 2026)
  • कार्यवाही का परिणाम: बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकृत; गिरफ्तारी अवैध घोषित; मोहम्मद यासीन को तत्काल रिहा करने का आदेश; फर्रुखाबाद पुलिस अधीक्षक को संबंधित जांच अधिकारी (IO) के खिलाफ आपराधिक एफआईआर दर्ज कर 7 दिनों के भीतर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ता (मोहम्मद यासीन) की ओर से: अधिवक्ता सत्य धीर सिंह जादौन (Advocate Satya Dheer Singh Jadaun)।
  • प्रतिवादी राज्य प्रशासन की ओर से: मुख्य स्थायी अधिवक्ता एवं अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
    • भारत का संविधान:
      • अनुच्छेद 21 — जीवन और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण
      • अनुच्छेद 22(1) — गिरफ्तारी के कारणों व आधारों को जानने का मौलिक अधिकार
      • अनुच्छेद 226 — उच्च न्यायालय का बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट क्षेत्राधिकार
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS):
      • धारा 47 — गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधारों की सूचना देने का कर्तव्य (पूर्ववर्ती CrPC धारा 50)
      • धारा 35 — बिना वारंट गिरफ्तारी की शर्तें (पूर्ववर्ती CrPC धारा 41)
    • भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS):
      • धारा 108 — आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण (पूर्ववर्ती IPC धारा 306)
      • अध्याय XIV — मिथ्या साक्ष्य देना, न्यायिक रिकॉर्ड गढ़ना और लोक न्याय के विरुद्ध अपराध (पूर्ववर्ती IPC धारा 192, 193, 218)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • अवैध गिरफ्तारी, अरेस्ट मेमो में छेड़छाड़ और पुलिस की आपराधिक जवाबदेही का विधिक मानक: ‘गिरफ्तारी के समय अभियुक्त को गिरफ्तारी के वास्तविक आधारों और आरोपों के तथ्यात्मक विवरण से लिखित रूप में अवगत कराया जाना संविधान के अनुच्छेद 22(1) और BNSS की धारा 47 के तहत एक गैर-परक्राम्य और अनिवार्य संवैधानिक सुरक्षा उपाय है; अरेस्ट मेमो में केवल अपराध की सांविधिक धारा का उल्लेख कर देना विधिक आधारों की सूचना नहीं माना जा सकता; अभियुक्त को जमानत या रिमांड से राहत पाने से रोकने के उद्देश्य से जांच अधिकारी द्वारा बाद में सरकारी केस डायरी या अरेस्ट मेमो में पिछली तारीख से कारण जोड़ना लोक न्याय के विरुद्ध अपराध और आपराधिक साक्ष्य गढ़ने (Fabricating False Evidence) की श्रेणी में आता है; ऐसा कृत्य करने वाले जांच अधिकारी केवल विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई के नहीं, बल्कि आपराधिक प्राथमिकी (FIR) और अभियोजन के सीधे भागीदार हैं; तथा प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों के उल्लंघन में की गई गिरफ्तारी आरंभ से ही शून्य (Void ab initio) होने के कारण बंदी तत्काल रिहाई का हकदार है।’
  • वर्तमान स्थिति व अनुपालन रूपरेखा: इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस कड़े आदेश के तहत फर्रुखाबाद के पुलिस अधीक्षक को अब 7 दिनों के भीतर उस जांच अधिकारी के खिलाफ जालसाजी और झूठे साक्ष्य गढ़ने की धाराओं में प्राथमिकी दर्ज करनी होगी और 16 नवंबर 2026 को अदालत के समक्ष एफआईआर की प्रति सहित अनुपालन हलफनामा पेश करना होगा; इस आदेश से उत्तर प्रदेश पुलिस बल के भीतर गिरफ्तारी के समय कागजी खानापूर्ति करने और बाद में बैक-डेटिंग कर रिकॉर्ड बदलने की असंवैधानिक परिपाटी पर कड़ा न्यायिक अंकुश लगा है।

Arrest Memo: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court)
पीठन्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन एवं न्यायमूर्ति अचल सचदेव
केस / पक्षकारमो. यासीन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 3 अन्य (Mohd. Yaseen v. State of UP and 3 Others)
याचिका का प्रकारबंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus Petition)
प्रतिनिधित्वयाचिकाकर्ता पक्ष: अधिवक्ता सत्य धीर सिंह जादौन (Advocate Satya Dheer Singh Jadaun)
संबंधित कानूनभारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 108 (आत्महत्या के लिए उकसाना) व गिरफ्तारी के संवैधानिक नियम (Article 22(1))
अदालत का अंतिम आदेशगिरफ्तारी असंवैधानिक व आरोपी रिहा: याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी अवैध घोषित कर रिहाई का आदेश; फर्रुखाबाद SP को IO पर FIR दर्ज कर 7 दिन में रिपोर्ट देने का निर्देश।
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