Saturday, November 7, 2026
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Self-Perceived Gender: स्वयं को महिला मानने वाली ट्रांसजेंडर महिला पर भी लागू होंगे BNS में शीलभंग के सुरक्षात्मक प्रावधान; सेना के अग्निवीर की डिस्चार्ज अर्जी खारिज

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मामले की पृष्ठभूमि और विधिक तर्क

  1. मामले का घटनाक्रम:शिकायतकर्ता (एक ट्रांसजेंडर महिला) ने आरोपी विशाल के खिलाफ अक्टूबर 2025 में शादी का झूठा वादा करके यौन हमला और लज्जा भंग करने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज कराई थी। आरोपी के खिलाफ BNS की धारा 75 और ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 18(d) के तहत मामला दर्ज किया गया।
  2. बचाव पक्ष के तर्क:आरोपी के वकील ने तर्क दिया कि BNS के तहत ‘महिला’ शब्द की परिभाषा केवल जैविक महिला (Female Human Being) तक सीमित है, इसलिए यह एक ट्रांसजेंडर पीड़ित पर लागू नहीं हो सकती। इसके अतिरिक्त, बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि पीड़िता को घटना के समय औपचारिक ट्रांसजेंडर पहचान पत्र (Transgender Identity Certificate) जारी नहीं हुआ था।
  3. न्यायालय का दृष्टिकोण:हाईकोर्ट ने बचाव पक्ष के तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने नालसा बनाम भारत संघ (NALSA v. Union of India) फैसले का संदर्भ देते हुए कहा कि हर व्यक्ति को अपनी लैंगिक पहचान स्वयं निर्धारित करने का संवैधानिक अधिकार है। औपचारिक प्रमाण पत्र न होने का मतलब यह नहीं है कि कोई व्यक्ति अपराध से संरक्षण का अधिकार खो देता है।

मुख्य विधिक व ट्रांसजेंडर न्यायशास्त्र निष्कर्ष

1. BNS के तहत ‘महिला’ की समावेशी व्याख्या (Inclusive Interpretation of ‘Woman’):

यह फैसला भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े दंडात्मक प्रावधानों को एक समावेशी और आधुनिक आयाम प्रदान करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘महिला’ शब्द की व्याख्या केवल जैविक सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वे सभी ट्रांसजेंडर महिलाएं शामिल हैं जो स्व-पहचान रखती हैं।

2. NALSA सिद्धांतों और 2019 अधिनियम का क्रियान्वयन:

यह आदेश स्थापित करता है कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के दंडात्मक संरक्षण के लिए केवल 2019 का विशेष कानून ही नहीं, बल्कि देश का सामान्य आपराधिक कानून (BNS) भी समान रूप से लागू होगा।

नागपुर: भारत का संविधान के अनुच्छेद 14, 15 व 21 (समानता, गैर-विभेद एवं आत्म-पहचान व गरिमा का अधिकार), ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 (Transgender Persons Act, 2019) की धारा 4 व 5 (स्व-पहचाने गए लिंग के अधिकार की मान्यता) एवं धारा 18(d) (ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के विरुद्ध शारीरिक, मौखिक या यौन दुर्व्यवहार हेतु दंड), भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 75 (महिला का यौन उत्पीड़न / शीलभंग—पूर्ववर्ती IPC धारा 354A) व धारा 2(37) (BNS के तहत ‘स्त्री’ / Woman की परिभाषा), तथा सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक संविधान पीठ निर्णय नालसा (NALSA) बनाम भारत संघ [(2014) 5 SCC 438] के विधिक सिद्धांतों के तहत बॉम्बे उच्च न्यायालय ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के सुरक्षात्मक आपराधिक अधिकारों पर एक युगांतकारी निर्णय सुनाया है।

बॉम्बे उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ के न्यायमूर्ति मेहरोज के. पठान (Justice Mehroz K Pathan) की एकल पीठ ने 3 नवंबर 2026 को दिए अपने विस्तृत निर्णय में भारतीय सेना के अग्निवीर (Agniveer) आरोपी विशाल सुनील इंगले (Vishal Sunil Ingle) द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Application) को पूर्णतः खारिज (Dismissed) कर दिया। आरोपी ने सत्र अदालत द्वारा उसकी उन्मोचन अर्जी (Discharge Application) खारिज किए जाने के आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।

उच्च न्यायालय ने कानून की ऐतिहासिक और समावेशी व्यवस्था देते हुए तय किया कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत किसी महिला के शीलभंग और यौन उत्पीड़न से संबंधित अपराधों के आरोप उस स्थिति में भी पूरी तरह विचारणीय और वैध हैं, जहाँ पीड़िता एक ऐसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति है जो स्वयं को ‘महिला’ के रूप में पहचानती है (Transgender person who identifies herself as a woman)। अदालत ने यह भी दो-टूक व्यवस्था दी कि घटना के समय सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी औपचारिक पहचान प्रमाण पत्र (Certificate of Identity) का न होना किसी भी पीड़ित को दंडात्मक कानूनों के संरक्षण से वंचित नहीं कर सकता।

उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘पीड़िता की आत्म-निर्धारित पहचान को डिस्चार्ज के चरण पर चुनौती नहीं दी जा सकती’:

न्यायमूर्ति मेहरोज के. पठान ने प्राथमिकी और डिस्चार्ज अर्जी के विधिक दायरे का परीक्षण करते हुए अपने निर्णय में स्पष्ट कहा: “प्राथमिकी (FIR) का अवलोकन यह दर्शाता है कि शिकायतकर्ता/पीड़िता ने स्वयं को एक ‘महिला’ के रूप में पहचाना है, और उक्त आत्म-निर्धारण (Self determination) पर कम से कम वर्तमान चरण में—जब अभियुक्त आरोपमुक्ति (Discharge) की मांग कर रहा है—संदेह नहीं किया जा सकता या सवाल नहीं उठाया जा सकता। हमले और महिला के शीलभंग (Outraging the modesty of a woman) के आरोपों को उस स्थिति में भी कानूनी रूप से बरकरार रखा जा सकता है, जहाँ पीड़िता एक ऐसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति है जो स्वयं की पहचान एक महिला के रूप में करती है।”

2. ‘औपचारिक पहचान प्रमाण पत्र प्राप्त करने में देरी दंडात्मक प्रावधानों को नहीं रोकती’:

  • अभियुक्त की इस दलील को कि कथित घटना के समय पीड़िता के पास ट्रांसजेंडर का आधिकारिक वैधानिक प्रमाण पत्र नहीं था और उसने इसे बाद में प्राप्त किया, अदालत ने सिरे से खारिज कर दिया।
  • अदालत ने व्यवस्था दी कि लैंगिक पहचान का अधिकार व्यक्ति के अस्तित्व और गरिमा से उपजा अंतर्निहित मौलिक अधिकार है। प्रशासनिक प्रमाण पत्र मिलने में देरी किसी भी प्रकार से BNS और 2019 के अधिनियम के तहत मिलने वाले आपराधिक संरक्षण को शून्य या निष्प्रभावी नहीं कर सकती।

3. बीएनएस धारा 75 की संकीर्ण व्याख्या का निषेध:

  • अदालत ने रक्षा पक्ष के इस तर्क को अमान्य कर दिया कि BNS में ‘स्त्री’ (Woman) की परिभाषा केवल पारंपरिक जैविक रूप से जन्मी महिला तक सीमित होनी चाहिए। अदालत ने माना कि यदि कोई ट्रांसजेंडर महिला समाज में एक महिला के रूप में जी रही है और उसी रूप में पहचानी जाती है, तो उसकी गरिमा और शील पर किया गया हमला कानून की नजर में समान रूप से दंडनीय है।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2025–2026)

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयबॉम्बे उच्च न्यायालय, नागपुर पीठ (आपराधिक पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार — धारा 438/442 BNSS / 397/401 CrPC)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति मेहरोज के. पठान (Justice Mehroz K Pathan) (एकल पीठ)
निर्णय की तिथि3 नवंबर 2026
केस संदर्भविशाल सुनील इंगले बनाम महाराष्ट्र राज्य [Criminal Revision Application No. … / 2026]
याचिकाकर्ता (अभियुक्त)विशाल सुनील इंगले (Vishal Sunil Ingle) — भारतीय सेना में कार्यरत ‘अग्निवीर’ जवान।
अभियुक्त के अधिवक्ताअधिवक्ता अनिल ठक्कर (Advocate Anil Thakkar)।
अभियोजन पक्ष (राज्य)अतिरिक्त लोक अभियोजक (Additional Public Prosecutor – APP) स्वाति वी. कोल्हे (Swati V Kolhe)।
पीड़िता पक्षएक ट्रांसजेंडर महिला, जिसने स्वयं को ‘महिला’ के रूप में चिन्हित किया है।
कथित अपराध का घटनाक्रमशिकायत के अनुसार, अक्टूबर 2025 में आरोपी विशाल इंगले (जो सेना में अग्निवीर के पद पर चयनित था) ने पीड़िता को विवाह का झूठा आश्वासन देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए और यौन उत्पीड़न किया। बाद में आरोपी अपने वादे से मुकर गया।
दर्ज कराई गई प्राथमिकी की धाराएं1. भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) — धारा 75 (यौन उत्पीड़न एवं शीलभंग)।
2. ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 — धारा 18(d) (ट्रांसजेंडर व्यक्ति के जीवन, सुरक्षा या स्वास्थ्य को खतरे में डालना अथवा यौन दुर्व्यवहार करना)।
अभियुक्त की डिस्चार्ज दलीलें1. ‘महिला’ की जैविक परिभाषा: BNS की धारा 2(37) के तहत ‘स्त्री’ का अर्थ एक महिला मानव प्राणी (Female Human Being) है; अतः BNS की धारा 75 केवल जैविक महिलाओं पर लागू होती है, ट्रांसजेंडर पर नहीं।
2. पहचान प्रमाण पत्र का अभाव: कथित घटना अक्टूबर 2025 की है, जबकि पीड़िता को ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड से औपचारिक पहचान प्रमाण पत्र उक्त घटना के बाद प्राप्त हुआ; अतः घटना के दिन वह विधिक रूप से ट्रांसजेंडर के रूप में भी पंजीकृत नहीं थी।
राज्य (अभियोजन) का विधिक रुखसर्वोच्च न्यायालय के नालसा निर्णय और 2019 के अधिनियम के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी लैंगिक पहचान स्वयं निर्धारित करने का संवैधानिक अधिकार है; पीड़िता ने एफआईआर में स्वयं को महिला बताया है; डिस्चार्ज के स्तर पर मिनी-ट्रायल नहीं हो सकता और आरोपों का परीक्षण विचारण में ही संभव है।
उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णयआपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज (Dismissed); सत्र न्यायालय का आरोपमुक्ति से इनकार का आदेश बरकरार; अभियुक्त के विरुद्ध BNS धारा 75 व 2019 अधिनियम की धारा 18(d) के तहत नियमित विचारण (Trial) चलाने का निर्देश।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘नालसा सिद्धांत, BNS धारा 75 और स्व-निर्धारित लैंगिक पहचान’

  • ‘नालसा बनाम भारत संघ’ [(2014) 5 SCC 438] का बाध्यकारी संवैधानिक अधिदेश:
    • भारत के उच्चतम न्यायालय की दो-न्यायाधीशों की पीठ (जस्टिस के.एस. राधाकृष्णन और जस्टिस ए.के. सीकरी) ने स्पष्ट व्यवस्था दी थी कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 21 के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक को अपनी ‘स्व-अनुभूत लैंगिक पहचान’ (Self-Perceived Gender Identity) तय करने का पूर्ण मौलिक अधिकार है।
    • अदालत ने माना था कि किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति को पुरुष, महिला या ‘थर्ड जेंडर’ के रूप में स्वयं को पहचानने का अधिकार है। इसके लिए किसी मेडिकल प्रक्रिया, लिंग-पुष्टि सर्जरी (SRS) या सरकारी प्रमाण पत्र की बाध्यता को पूर्व-शर्त नहीं बनाया जा सकता।
  • ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 का विधिक ढांचा:
    • धारा 4(1): यह प्रावधान करती है कि एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति को अपनी स्व-पहचानी गई पहचान का अधिकार होगा।
    • धारा 4(2): यह स्पष्ट करती है कि किसी व्यक्ति को ट्रांसजेंडर व्यक्ति के रूप में मान्यता प्राप्त करने का अधिकार है।
    • धारा 18(d): यह गैर-जमानती दंडात्मक धारा है जो किसी भी व्यक्ति को दंडित करती है जो किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति का शारीरिक, मौखिक, भावनात्मक या यौन शोषण (Sexual Abuse) करता है।
    • बॉम्बे हाईकोर्ट ने सुस्थापित किया कि यदि कोई पीड़िता कानून के तहत महिला के रूप में पहचानी जाना चाहती है, तो वह BNS के सामान्य दंडात्मक प्रावधानों के साथ-साथ इस विशेष कानून की धारा 18(d) दोनों का सहारा ले सकती है।
  • BNS की धारा 75 (यौन उत्पीड़न) और शीलभंग का विधिक दायरा:
    • रक्षा पक्ष ने तर्क दिया था कि BNS में ‘स्त्री’ को ‘Female Human Being’ कहा गया है।
    • उच्च न्यायालय ने प्रगतिशील विधिक व्याख्या अपनाते हुए यह संकेत दिया कि जब भारत के संविधान और संसद के विशेष अधिनियम ने ट्रांसजेंडर महिलाओं को महिला के रूप में जीने का अधिकार दिया है, तो आपराधिक न्याय प्रणाली में उन्हें ‘महिला’ के संरक्षण से बाहर रखना उन्हें संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और 15 (लिंग के आधार पर विभेद के प्रतिषेध) से वंचित करना होगा।
  • उन्मोचन (Discharge) के चरण पर सीमित न्यायिक हस्तक्षेप:
    • आपराधिक न्यायशास्त्र का बुनियादी नियम है (BNSS धारा 250 / CrPC धारा 227) कि डिस्चार्ज के स्तर पर अदालत केवल यह देखती है कि क्या आरोपी के विरुद्ध प्रथम दृष्टया संदेह (Grave Suspicion) मौजूद है या नहीं।
    • चूँकि पीड़िता ने प्राथमिक शिकायत में खुद को महिला बताया और यौन शोषण के विशिष्ट आरोप लगाए, इसलिए प्रमाण पत्र की तिथि या तकनीकी तर्कों के आधार पर आरोपी को मुकदमे से पहले ही आरोपमुक्त नहीं किया जा सकता था।

विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता

  • न्यायालय: बॉम्बे उच्च न्यायालय, नागपुर पीठ (आपराधिक पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: विशाल सुनील इंगले बनाम महाराष्ट्र राज्य [Criminal Revision Application No. … / 2026]
  • पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति मेहरोज के. पठान (Justice Mehroz K Pathan) (एकल पीठ)
  • निर्णय की तिथि: 3 नवंबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज; सत्र अदालत द्वारा उन्मोचन (Discharge) अस्वीकार करने का आदेश बरकरार; अभियुक्त विशाल सुनील इंगले को BNS की धारा 75 और ट्रांसजेंडर संरक्षण अधिनियम की धारा 18(d) के तहत नियमित ट्रायल का सामना करने का आदेश।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ता (अभियुक्त विशाल इंगले) की ओर से:
    • अधिवक्ता: अनिल ठक्कर (Advocate Anil Thakkar)।
  • प्रतिवादी महाराष्ट्र राज्य की ओर से:
    • अतिरिक्त लोक अभियोजक (Additional Public Prosecutor – APP) स्वाति वी. कोल्हे (Swati V Kolhe)।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
    • भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS):
      • धारा 75 — यौन उत्पीड़न और शीलभंग (पूर्ववर्ती IPC धारा 354A)
      • धारा 2(37) — ‘स्त्री’ की परिभाषा
    • ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 (Transgender Persons Act, 2019):
      • धारा 4 व 5 — स्व-पहचानी गई लैंगिक पहचान और प्रमाण पत्र की मान्यता
      • धारा 18(d) — ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के विरुद्ध यौन शोषण व दुर्व्यवहार हेतु दंड
    • भारत का संविधान:
      • अनुच्छेद 14 — विधि के समक्ष समानता
      • अनुच्छेद 15 — लिंग के आधार पर किसी भी विभेद का प्रतिषेध
      • अनुच्छेद 21 — गरिमापूर्ण जीवन, निजता और आत्म-पहचान का अधिकार
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS):
      • धारा 250 — सत्र न्यायालय द्वारा आरोपमुक्ति (Discharge) की प्रक्रिया (पूर्ववर्ती CrPC धारा 227)
      • धारा 438/442 — उच्च न्यायालय की पुनरीक्षण शक्तियां (पूर्ववर्ती CrPC धारा 397/401)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • ट्रांसजेंडर महिलाओं की लैंगिक पहचान, शीलभंग और आपराधिक संरक्षण का विधिक मानक: ‘सर्वोच्च न्यायालय के नालसा निर्णय और ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को अपनी लैंगिक पहचान स्वयं निर्धारित करने (Right to Self-Perceived Gender Identity) का अहस्तांतरणीय और संवैधानिक अधिकार प्राप्त है; यदि कोई ट्रांसजेंडर व्यक्ति स्वयं को एक ‘महिला’ के रूप में पहचानती है, तो भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 75 के अंतर्गत किसी महिला के शीलभंग और यौन उत्पीड़न से संबंधित सभी दंडात्मक प्रावधान उसके पक्ष में पूर्ण बल के साथ लागू होंगे; घटना के समय सक्षम प्राधिकारी से औपचारिक पहचान प्रमाण पत्र प्राप्त न होना या बाद में प्राप्त होना किसी पीड़ित को आपराधिक कानूनों के संरक्षण से वंचित करने का वैध आधार नहीं हो सकता; तथा उन्मोचन (Discharge) के प्रारंभिक स्तर पर अभियुक्त पीड़िता के आत्म-निर्धारित लिंग पर प्रश्नचिह्न लगाकर मुकदमे से बच नहीं सकता, और ऐसे मामलों का निस्तारण केवल विचारण अदालत (Trial Court) में साक्ष्यों के आधार पर ही होना विधि सम्मत प्रक्रिया है।’
  • वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: बॉम्बे उच्च न्यायालय के इस निर्णय के बाद संबंधित सत्र अदालत में आरोपी अग्निवीर विशाल सुनील इंगले के विरुद्ध आरोप तय करने (Framing of Charges) और नियमित गवाहियों की प्रक्रिया तत्काल प्रभाव से शुरू होगी; यह फैसला पूरे देश में एक मील का पत्थर साबित होगा, क्योंकि इसने स्पष्ट विधिक नज़ीर स्थापित की है कि नए आपराधिक कानूनों (BNS) में महिलाओं को मिलने वाले शीलभंग और यौन अपराधों के सुरक्षा कवच का लाभ ट्रांसजेंडर महिलाएं भी बिना किसी प्रशासनिक अड़चन के प्राप्त कर सकती हैं।

Self-Perceived Gender: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतबॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court – Nagpur Bench)
न्यायाधीशन्यायमूर्ति मेहरोज़ के. पठान (Justice Mehroz K. Pathan)
केस / पक्षकारविशाल सुनील इंगले बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य (Vishal Sunil Ingle v. State of Maharashtra)
आरोपीविशाल सुनील इंगले (भारतीय सेना में अग्निवीर)
प्रतिनिधित्वयाचिकाकर्ता पक्ष: अधिवक्ता अनिल ठक्कर | राज्य पक्ष: अतिरिक्त लोक अभियोजक स्वाति वी. कोल्हे
संबंधित कानून/प्रावधानBNS की धारा 75 (यौन उत्पीड़न/लज्जा भंग) एवं Transgender Persons Act, 2019 की धारा 18(d)
मूल विवादशादी के झूठे वादे पर यौन उत्पीड़न; बचाव पक्ष का तर्क कि BNS में ‘महिला’ का अर्थ केवल जैविक स्त्री है और घटना के समय औपचारिक ट्रांसजेंडर सर्टिफिकेट मौजूद नहीं था।
अदालत का अंतिम आदेशडिस्चार्ज याचिका खारिज (Application Dismissed): स्व-पहचाने गए लैंगिक अधिकार को मान्यता; केस का ट्रायल चलाने का आदेश।
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