Sunday, August 23, 2026
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Kurfanama Niyamawali: कुर्फानामा के आधार पर जमीन पर अधिकार जताना…जानिए संथाल परगना काश्तकारी (पूरक उपबंध) अधिनियम, 1949

Kurfanama Niyamawali: संथाल परगना क्षेत्र में भूमि विवादों और ऐतिहासिक टेनेंसी कानूनों की व्याख्या को लेकर झारखंड हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था दी है।

रैयती जमीनों के संरक्षण के लिए बने कड़े कानूनों किसी कागजी दस्तावेज के जरिए दरकिनार नहीं

हाईकोर्ट के जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की एकल पीठ ने गोड्डा जिले से जुड़े एक भूमि विवाद में संथाल परगना प्रमंडल, दुमका के कमिश्नर द्वारा पारित बेदखली (Eviction) के आदेश को सही ठहराते हुए याचिकाकर्ता की रिट याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। कहा, संथाल परगना क्षेत्र में गैर-हस्तांतरणीय (Non-transferable) रैयती जमीनों के संरक्षण के लिए बने कड़े कानूनों को किसी साधारण कागजी दस्तावेज के जरिए दरकिनार नहीं किया जा सकता।

एक्ट लागू होने से ठीक पहले कम से कम 12 वर्षों का निरंतर कब्जा साबित करना होगा

अदालत ने टिप्पणी की, यदि कोई व्यक्ति ‘कुर्फानामा’ (एक प्रकार का भूमि समझौता विलेख) के आधार पर जमीन पर अपना अधिकार जताता है और बेदखली की कार्रवाई (Eviction Proceedings) का विरोध करना चाहता है, तो उसे ‘संथाल परगना काश्तकारी (पूरक उपबंध) अधिनियम, 1949’ (Santhal Pargana Tenancy Act, 1949) के लागू होने से ठीक पहले कम से कम 12 वर्षों का निरंतर कब्जा साबित करना होगा। इसके अलावा, यदि कुर्फानामा तस्दीक नियमावली (Tasdik Niyamawali) के कानूनी पैमानों को पूरा नहीं करता, तो उसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

मामला क्या है?: 1941 के ‘कुर्फानामा’ बनाम 1965 के ‘दत्तक ग्रहण’ (Adoption) की जंग

यह कानूनी लड़ाई गोड्डा जिले के मौजा दुमरिया में स्थित कुछ भूखंडों पर अवैध कब्जे और मालिकाना हक के दावों से जुड़ी है।

विवाद की शुरुआत: प्रतिवादी संख्या 5 ने संथाल परगना टेनेंसी (SPT) एक्ट, 1949 की धारा 20 और 42 के तहत सब-डिवीजनल ऑफिसर (SDO) के समक्ष एक मामला दायर किया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि याचिकाकर्ता ने उनकी जमीन पर अवैध अतिक्रमण किया हुआ है। प्रतिवादी संख्या 5 ने मूल भूस्वामी ‘तेतरू झा’ द्वारा 1965 में निष्पादित एक पंजीकृत गोदनामे (Registered Deed of Adoption) के आधार पर खुद को उनका वैध दत्तक पुत्र बताते हुए जमीन पर अपना हक जताया था।

याचिकाकर्ता का दावा: दूसरी ओर, वर्तमान याचिकाकर्ता ने इस गोदनामे को चुनौती दी और दावा किया कि उनके पिता को तेतरू झा ने साल 1941 में एक ‘कुर्फानामा’ लिखकर इस जमीन का कब्जा सौंपा था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि उनके पिता और उनके बाद वे खुद लगातार इस जमीन पर खेती और कब्जा कर रहे हैं। उन्होंने यह भी दलील दी कि प्रशासन ने बेदखली का आदेश देते समय उनके पास मौजूद कुर्फानामा और लगान रसीदों (Rent Receipts) की पूरी तरह अनदेखी की है।

कानूनी दांवपेंच: जहां फेल हो गई याचिकाकर्ता की दलील

इस मामले में पहले SDO ने बेदखली का आदेश दिया था, जिसे डिप्टी कमिश्नर (DC) गोड्डा ने पलट दिया। अंत में, कमिश्नर संथाल परगना प्रमंडल (दुमका) ने DC के आदेश को रद्द करते हुए SDO के मूल बेदखली आदेश को बहाल कर दिया था, जिसे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी ने मामले के रिकॉर्ड और कानूनी प्रावधानों की बारीकी से जांच करने के बाद निम्नलिखित मुख्य कानूनी सिद्धांत तय किए।

12 वर्षों के वैधानिक कब्जे की गणना में चूक (Statutory Failure of 12 Years)

अदालत ने रेखांकित किया कि हालांकि याचिकाकर्ता साल 1941 के कुर्फानामा पर भरोसा कर रहा है, लेकिन ऐतिहासिक ‘संथाल परगना टेनेंसी एक्ट’ 1 नवंबर 1949 को लागू हुआ था। कानून के तहत सुरक्षा पाने या बेदखली को रोकने के लिए अधिनियम लागू होने के समय तक 12 साल का कब्जा होना जरूरी था।
कोर्ट ने गणना करते हुए पाया कि 1941 से 1949 के बीच याचिकाकर्ता के पिता का कब्जा केवल 8 वर्ष ही पूरा कर पाया था। इस प्रकार, याचिकाकर्ता कानूनन अनिवार्य 12 वर्षों के निरंतर कब्जे की शर्त को पूरा करने में विफल रहा।

‘तस्दीक नियमावली’ की कसौटी पर फेल हुआ कुर्फानामा

अदालत ने स्पष्ट किया कि संथाल परगना क्षेत्र के विशेष नियमों (तस्दीक नियमावली) के तहत किसी कुर्फानामा को कानूनी मान्यता देने के लिए तीन में से किसी एक शर्त का पूरा होना अनिवार्य है, वह दस्तावेज पंजीकृत (Registered) होना चाहिए। यदि वह अपंजीकृत (सादा कुर्फानामा) है, तो उसे पहले किसी सक्षम न्यायालय द्वारा मान्यता दी गई हो। या फिर उस दस्तावेज को पहले किसी अदालत के समक्ष साक्ष्य (Exhibited) के रूप में प्रदर्शित और स्वीकार किया गया हो।
हाई कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता का कुर्फानामा इनमें से एक भी शर्त पूरी नहीं करता था। कोर्ट ने इसे प्रथम दृष्टया ‘मिलीभगत’ (Collusive) से तैयार किया गया दस्तावेज माना जो कानून की नजर में शून्य है।

हाई कोर्ट का अंतिम फैसला

झारखंड उच्च न्यायालय ने माना कि संथाल परगना क्षेत्र में आदिवासी और स्थानीय रैयतों की जमीनों के अवैध हस्तांतरण को रोकने के लिए जो विधायी मंशा (Legislative Intent) है, उसका कड़ाई से पालन होना चाहिए। चूंकि याचिकाकर्ता न तो समय-सीमा (12 साल का कब्जा) साबित कर सका और न ही उसका कुर्फानामा कानूनी रूप से वैध था, इसलिए कमिश्नर दुमका द्वारा जारी किया गया बेदखली का आदेश पूरी तरह से विधिक और सही है।

अदालत ने कमिश्नर के आदेश में किसी भी प्रकार की विधिक अवैधता न पाते हुए अतिक्रमणकारी को बेदखल करने के आदेश को बरकरार रखा और रिट याचिका को खारिज (Dismissed) कर दिया।

केस शीट: झारखंड हाई कोर्ट निर्णय (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और व्याख्या
संबंधित अदालतझारखंड उच्च न्यायालय (Jharkhand High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस संजय कुमार द्विवेदी (एकल पीठ)
मूल अधिनियमसंथाल परगना काश्तकारी (पूरक उपबंध) अधिनियम, 1949
लागू धाराएंधारा 20 और धारा 42 (अवैध हस्तांतरण और बेदखली से संबंधित)
विवाद का मुख्य दस्तावेजवर्ष 1941 का एक अपंजीकृत कुर्फानामा (Kurfanama)
अदालत का विधिक निष्कर्षअधिनियम लागू होने (1949) से पहले 12 साल का कब्जा न होने पर कुर्फानामा बेकार है।
अंतिम निर्णययाचिका खारिज; कमिश्नर का बेदखली (Eviction) आदेश बरकरार।
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