Monday, June 29, 2026
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Child Welfare: बच्चे को अभ्यस्त होने के लिए और समय चाहिए…पिता को रात में कस्टडी देने के आदेश बदलने से पहले क्यों टिप्पणी की

दिल्ली हाईकोर्ट ने बच्चे के मानसिक और भावनात्मक कल्याण (Child Welfare) को सर्वोपरि रखते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

Child Welfare को लेकर अंतरिम कस्टडी आदेश में संशोधन किया

हाईकोर्ट के जस्टिस तेजस कारिया और जस्टिस मधु जैन की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के अंतरिम कस्टडी आदेश में संशोधन करते हुए पाया कि निचली अदालत का अंतिम निर्देश उसके खुद के तर्कों के विपरीत (Inconsistent) था। अदालत ने एक फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक पिता को उसके नाबालिग बेटे की ओवर नाइट कस्टडी (रात में अपने पास रखने का अधिकार) दी गई थी। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पिता के साथ रात भर रहने से पहले बच्चे को नए माहौल में पूरी तरह ढलने और अभ्यस्त होने (Acclimatise) के लिए और अधिक समय की आवश्यकता है।

मामला क्या है?: रात की कस्टडी बनाम दिन की मुलाकात

यह मामला एक माता-पिता के बीच बच्चे की कस्टडी को लेकर चल रहे विवाद से जुड़ा है।

फैमिली कोर्ट का विरोधाभासी आदेश: फैमिली कोर्ट ने माना था कि बच्चा पहले कभी भी अपने पिता के साथ रात में नहीं रुका है, और अचानक उसे बिना मां की देखरेख (Unsupervised) के पिता के पास छोड़ना शायद उचित न हो। इसके बावजूद, कोर्ट ने अपने अंतिम आदेश में पिता को 20 जून से 22 जून, 2026 तक बच्चे की ओवरनाइट कस्टडी दे दी।

हाई कोर्ट में अपील: मां ने फैमिली कोर्ट के इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी। मां ने साफ किया कि उसे पिता को मिलने के अधिकार (Visitation Rights) देने पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन वह केवल रात में बच्चे को अकेले भेजने के खिलाफ है।

पिता का तर्क: दूसरी ओर, पिता की दलील थी कि कस्टडी और मुलाकातों से जुड़े आदेश अंतरिम प्रकृति (Interlocutory) के होते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि रात में साथ रहने से बच्चे को उनके साथ घुलने-मिलने और सहज (Comfortable) होने में मदद मिलेगी।

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Child Welfare को लेकर हाई कोर्ट का विधिक रुख: बच्चे पर मानसिक दबाव नहीं डाला जा सकता

दिल्ली हाई कोर्ट ने मामले की गंभीरता को समझते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट का खुद का यह मानना सही था कि बच्चे को मां से अलग रहने के लिए अभी और वक्त चाहिए, लेकिन उसका अंतिम आदेश इस सोच से मेल नहीं खा रहा था। खंडपीठ ने टिप्पणी की, यह उम्मीद करना कि बच्चा बिना किसी सुपरविजन के प्रतिवादी (पिता) के साथ रहे, उचित नहीं हो सकता। अपीलकर्ता (मां) से अलग रहकर पिता के पास रात में रुकने से पहले बच्चे को उस माहौल के अनुकूल होने के लिए और अधिक समय की आवश्यकता होगी।

कोर्ट का संशोधित आदेश: सुबह से रात तक पिता के साथ रहेगा बच्चा

अदालत ने बच्चे के हित को ध्यान में रखते हुए पिता के अधिकारों और बच्चे की मानसिक स्थिति के बीच एक संतुलन बनाया।

रात की कस्टडी रद्द: हाई कोर्ट ने 20 से 22 जून तक रात में बच्चे को पिता के पास रखने के निर्देश को पूरी तरह रद्द (Set Aside) कर दिया।

दिन की कस्टडी का नया समय: कोर्ट ने आदेश को संशोधित करते हुए निर्देश दिया कि पिता को 20 जून से 25 जून, 2026 तक प्रतिदिन सुबह 9:00 बजे से रात 8:00 बजे तक बच्चे की कस्टडी दी जाए। इसके बाद बच्चा रात में अपनी मां के पास वापस लौट आएगा।

केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Overview)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांदिल्ली उच्च न्यायालय की विधिक व्यवस्था (जून 2026)
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस तेजस कारिया और जस्टिस मधु जैन (खंडपीठ)
मुख्य कानूनी सिद्धांतकस्टडी मामलों में पिता का अधिकार सर्वोपरि नहीं है, बल्कि बच्चे का सर्वोत्तम हित (Best Interest of the Child) और उसकी मानसिक सहजता सबसे महत्वपूर्ण है।
फैमिली कोर्ट की विसंगतियह मानने के बाद भी कि बच्चा कभी पिता के साथ रात में नहीं रहा, कोर्ट ने ‘ओवरनाइट कस्टडी’ दे दी थी।
हाई कोर्ट का अंतिम आदेशरात की कस्टडी का आदेश निरस्त; पिता को ६ दिनों तक केवल दिन में (सुबह 9 से रात 8 बजे तक) बच्चे के साथ समय बिताने की अनुमति।
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