Wednesday, November 4, 2026
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Court News: हर दिन अदालत में आनेवाले व्यक्तियों का आंकड़ा रखें, किस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा, पढ़िए…

Court News: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों का सार्वजनिक शौचालयों की उपलब्धता एक महत्वपूर्ण कर्तव्य है। ऐसी सुविधाएं सभी के लिए सुलभ हों, यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाने की जरूरत है।

वकील की जनहित याचिका पर सुनवाई

शीर्ष अदालत ने सभी उच्च न्यायालयों, देश भर में अदालत परिसर और न्यायाधिकरण, राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेशों से पुरुषों, महिलाओं, विकलांग व्यक्तियों (पीडब्ल्यूडी) और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए अलग-अलग शौचालय सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए कहा है। एक वकील ने मामले को लेकर जनहित याचिका दायर की थी।

अदालत स्तर पर समिति का गठन करें, फिर नजर रखें

न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने कहा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सर्वोपरि है और पर्याप्त सार्वजनिक शौचालयों के निर्माण से गोपनीयता की भी रक्षा होती है। महिलाओं और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए खतरा दूर होता है। पीठ ने कहा, प्रत्येक उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया जाएगा। इसमें उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल/रजिस्ट्रार, मुख्य सचिव, पीडब्ल्यूडी सचिव और सदस्य शामिल होंगे। राज्य के वित्त सचिव, बार एसोसिएशन के एक प्रतिनिधि और किसी भी अन्य अधिकारी, जो वे उचित समझें, छह सप्ताह की अवधि के भीतर करें।

शौचालय का पूरे वर्ष रखरखाव भी किया जाए

शीर्ष अदालत का फैसला वकील राजीब कलिता द्वारा दायर जनहित याचिका पर आया, जिसमें पुरुषों, महिलाओं, विकलांग व्यक्तियों और ट्रांसजेंडरों के लिए देश की सभी अदालतों/न्यायाधिकरणों में बुनियादी शौचालय सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की गई थी। यह देखते हुए कि जीवन के अधिकार में स्वस्थ और स्वच्छ जीवन का अधिकार और सम्मान के साथ जीने का अधिकार शामिल है। शीर्ष अदालत ने कहा, निर्देशक सिद्धांतों के तहत सार्वजनिक शौचालयों तक पहुंच की उपलब्धता राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों का एक महत्वपूर्ण कर्तव्य है। यदि ऐसे प्रावधान किए गए हैं तो यह पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए कि शौचालयों का पूरे वर्ष रखरखाव किया जाए।

गठित समिति एक व्यापक योजना बनाए

शीर्ष अदालत ने समिति को एक व्यापक योजना बनाने और औसतन हर दिन अदालतों में आने वाले व्यक्तियों की संख्या का एक आंकड़ा रखने का निर्देश दिया। यह सुनिश्चित किया कि पर्याप्त अलग शौचालय बनाएं। पीठ ने कहा कि वह शौचालय सुविधाओं की उपलब्धता, बुनियादी ढांचे में खामियों और उसके रखरखाव के संबंध में एक सर्वेक्षण भी करेगी। राज्य सरकारें/केंद्रशासित प्रदेश अदालत परिसर के भीतर शौचालय सुविधाओं के निर्माण, रखरखाव और सफाई के लिए पर्याप्त धनराशि आवंटित करेंगे, जिसकी उच्च न्यायालयों द्वारा गठित समिति के परामर्श से समय-समय पर समीक्षा की जाएगी। उच्च न्यायालयों और राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को चार महीने की अवधि के भीतर सभी द्वारा एक स्थिति रिपोर्ट दायर की जाएगी।

अदालत परिसर में शौचालय बहुत आवश्यक

पीठ ने देश भर में राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल प्लाजा के पास बने सार्वजनिक शौचालयों की स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की। टिप्पणी किया कि इसका रखरखाव और पहुंच बहुत कम है। न्यायालयों और न्यायाधिकरणों में बड़ी संख्या में काम करने वाले न्यायाधीशों/अधिवक्ताओं/वादियों/कर्मचारियों के लिए शौचालय/शौचालय/विश्राम कक्ष की आवश्यकता और भी अधिक है क्योंकि नौकरी की मांग के कारण वे अधिकतर लंबे समय तक एक ही स्थान पर बैठे रहते हैं। इसलिए, यह सरकार और स्थानीय अधिकारियों का कर्तव्य है कि वे अदालत परिसर के भीतर बुनियादी शौचालय और स्वच्छता सुविधाएं प्रदान करें।

शौचालय सुविधा ही नहीं, बुनियादी आवश्यकता है

अदालत ने कहा कि शौचालय केवल सुविधा का मामला नहीं है, बल्कि एक बुनियादी आवश्यकता है जो मानवाधिकार का एक पहलू है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उचित स्वच्छता तक पहुंच को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई है, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है। इस अधिकार में स्वाभाविक रूप से सभी व्यक्तियों के लिए एक सुरक्षित और स्वच्छ वातावरण सुनिश्चित करना शामिल है।

पर्याप्त शौचालय का नहीं होना, गहरी खामी को दर्शाता है

पीठ ने कहा, ​​जिला न्यायालयों का जहां तक संबंध है, हमें अपनी गहरी चिंताओं को भी इंगित करना चाहिए कि ऐसे उदाहरण हैं जहां न्यायाधीश, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी उचित शौचालय सुविधाओं तक पहुंच का अभाव है। यह न केवल सीधे प्रभावित लोगों के अधिकारों का उल्लंघन करता है, बल्कि न्यायिक प्रणाली की प्रतिष्ठा को भी धूमिल करता है, जिसे निष्पक्षता, गरिमा और न्याय के मॉडल के रूप में काम करना चाहिए। पर्याप्त शौचालय सुविधाएं प्रदान करने में विफलता सिर्फ एक तार्किक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह न्याय प्रणाली में एक गहरी खामी को दर्शाता है। मामलों की खेदजनक स्थिति उस कठोर वास्तविकता को दर्शाती है जिसका सामना न्यायिक प्रणाली को करना पड़ता है।

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