Tuesday, September 8, 2026
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Justice Karol on Labour Laws: घरों में काम करने वाली ‘आया’ या ‘हाउसमेड’ के बारे में सोचा है…जस्टिस करोल की बड़ी टिप्पणी, पढ़ें

Justice Karol on Labour Laws: डॉ. बी.आर. अंबेडकर की 135वीं जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित समरसता दिवस पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस संजय करोल ने भारतीय श्रम क्षेत्र (Labour Sector) की कड़वी सच्चाइयों पर रोशनी डाली।

अधिवक्ता परिषद द्वारा आयोजित कार्यक्रम में जस्टिस करोल ने कहा कि राष्ट्र की शक्ति उसकी अर्थव्यवस्था के पैमाने से नहीं, बल्कि उसे चलाने वाले सिस्टम की निष्पक्षता से मापी जानी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि आर्थिक विकास के बावजूद, महिलाओं और बच्चों का एक बड़ा हिस्सा आज भी कानूनी सुरक्षा के दायरे से बाहर है।

महिलाओं के श्रम की ‘अदृश्यता’ (The Invisibility of Women’s Labour)

  • जस्टिस करोल ने देश की 48% महिला जनसंख्या के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।
  • असंगठित क्षेत्र (Informal Sector): उन्होंने कहा कि एक बड़ी संख्या में महिलाएं घरों में काम करने वाली ‘आया’ या ‘हाउसमेड’ के रूप में कार्यरत हैं। क्या कभी हमने उनके बारे में सोचा है? उन्हें कौन रेगुलेट कर रहा है?
  • अदृश्य श्रम: ऐतिहासिक रूप से महिलाओं के काम को ‘अदृश्यता और असमानता’ से जोड़ा गया है। विशेष रूप से होम-बेस्ड सेटिंग्स में काम करने वाली महिलाओं के पास कानूनी सुरक्षा बहुत सीमित है।
  • असमानता: औपचारिक रोजगार (Formal Employment) में भी वेतन में अंतर (Wage Gap), सुरक्षा की कमी और अवसरों की असमानता आज भी बरकरार है।

बाल श्रम: एक निरंतर चुनौती (Persistence of Child Labour)

  • संविधान द्वारा प्रतिबंधित होने के बावजूद बाल श्रम का अस्तित्व बना रहना एक गंभीर मुद्दा है।
  • कमजोर रेगुलेशन: जस्टिस करोल ने बताया कि छोटे वर्कशॉप, घरों, कृषि और सप्लाई चेन के उन हिस्सों में बाल श्रम अभी भी जारी है जहाँ सरकारी तंत्र की पहुंच कम है।
  • भविष्य का सवाल: भारत में 35 करोड़ नागरिक 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चे हैं। यदि उन्हें शिक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं मिला, तो राष्ट्र का भविष्य प्रभावित होगा।

ट्रेड यूनियनों की ‘गायब’ भूमिका

  • जस्टिस करोल ने श्रम सुधारों (Labour Reforms) की प्रक्रिया में ट्रेड यूनियनों की कम होती भूमिका पर सवाल उठाए।
  • भागीदारी की कमी: उन्होंने कहा कि 1986-87 के दौर में यूनियनें बहुत सक्रिय थीं, लेकिन आज वे इस समीकरण से गायब दिखती हैं।
  • असंगठित क्षेत्र की आवाज: यूनियनों को श्रमिकों की आवाज बनना चाहिए, खासकर असंगठित क्षेत्र में, ताकि सुधारों का लाभ जमीन तक पहुँच सके।

युवा वकीलों से अपील: ‘समरसता’ का असली अर्थ

  • जस्टिस करोल ने युवा वकीलों को एक विशेष मिशन दिया।
  • शिकायत निवारण: उन्होंने वकीलों से आग्रह किया कि वे श्रमिकों के मुद्दों को उठाएं, उनकी गरिमा सुनिश्चित करें और उनकी समस्याओं को हल करने वाले तंत्र का हिस्सा बनें।
  • समरसता का अर्थ: उनके अनुसार ‘समरसता’ का मतलब है—शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, संतुलन और विभिन्न समूहों के बीच एकजुटता।

सामाजिक न्याय ही असली विकास

जस्टिस संजय करोल का यह भाषण याद दिलाता है कि जब तक समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ा मजदूर—चाहे वह घर में काम करने वाली महिला हो या किसी कारखाने में काम करने वाला बच्चा कानूनी रूप से सुरक्षित महसूस नहीं करता, तब तक समग्र विकास का लक्ष्य अधूरा है।

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