Tuesday, September 29, 2026
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Criminal Trial: गवाह को दोबारा बुलाने (Recall) की शक्ति लापरवाह मुकदमेबाज को दूसरा मौका देने के लिए नहीं…जानिए क्यों कहा ऐसा

Criminal Trial: मद्रास हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत गवाहों को दोबारा बुलाने की अदालती शक्ति पर अंकुश लगाते हुए महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था दी है।

अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष के बीच Criminal Trial रणनीति एक गंभीर न्यायिक खोज: अदालत

हाईकोर्ट के जस्टिस विक्टोरिया गौरी की एकल पीठ ने कहा, आपराधिक मुकदमा अभियोजन पक्ष (Prosecution) और बचाव पक्ष (Defence) के बीच रणनीति का कोई खेल नहीं है, बल्कि यह सत्य की एक गंभीर न्यायिक खोज है। लेकिन सत्य की यह खोज निष्पक्षता, वैधता और प्रक्रियात्मक अनुशासन के दायरे में ही होनी चाहिए। अदालत अभियोजन पक्ष को मुकदमे के बिल्कुल अंतिम चरण (Fag end of trial) में अपनी उन कमियों को सुधारने की अनुमति नहीं दे सकती, जिन्हें वह साक्ष्य के सामान्य दौर में साबित करने में विफल रहा था; बशर्ते वह सबूत न्याय के लिए वाकई अपरिहार्य (Indispensable) न हो। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि गवाह को दोबारा बुलाने (Recall) की शक्ति का प्रयोग केवल इसलिए नहीं किया जाना चाहिए कि वह सबूत उपयोगी हो सकता है, बल्कि इसलिए किया जाना चाहिए क्योंकि उस सबूत के बिना फैसला अन्यायपूर्ण हो जाएगा।

मामला क्या है?: मर्डर केस और अंतिम समय में आईओ (IO) को बुलाने की जिद

यह पूरा विधिक विवाद ‘अन्बू’ (Anbu) नामक एक आरोपी के खिलाफ दर्ज हत्या (IPC की धारा 302) के मुकदमे से जुड़ा है।

हत्या का आरोप: अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी अन्बू मृतक का करीबी सहयोगी था। मृतक ने अन्बू को ₹14,00000 के कृषि उत्पाद बेचने के लिए सौंपे थे। आरोप है कि अन्बू ने उत्पाद बेच दिए लेकिन पैसे कंपनी को नहीं लौटाए। जब पैसे वापस मांगे गए, तो अन्बू मृतक को अपनी कार में ले गया, उस पर ‘बिलहुक’ (एक प्रकार का हथियार) से हमला किया और शव को पानी में फेंक दिया।

मुकदमे के आखिरी मोड़ पर नई मांग: निचली अदालत (कुंभकोणम) में मामले का ट्रायल लगभग पूरा हो चुका था, जांच अधिकारी (Investigating Officer – IO) की गवाही और जिरह (Cross-examination) हो चुकी थी, और बचाव पक्ष (Defence) के साक्ष्य शुरू होने वाले थे। इसी बीच अभियोजन पक्ष ने कॉल डिटेल्स, सिम डिटेल्स और बैंक खातों से जुड़े नए दस्तावेज रिकॉर्ड पर लाने के लिए आईओ को दोबारा बुलाने (Recall) की अर्जी दाखिल की।

निचली अदालत ने दी मंजूरी: कुंभकोणम के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने अभियोजन पक्ष की इस अर्जी को स्वीकार कर लिया, जिसके खिलाफ आरोपी अन्बू ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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हाई कोर्ट का रुख: बचाव पक्ष द्वारा कमियां उजागर करने के बाद केस सुधारना अनुचित

याचिकाकर्ता (अन्बू) के वकीलों ने दलील दी कि जब जिरह के दौरान बचाव पक्ष ने अभियोजन की कमियों और खामियों (Lacunae) को उजागर कर दिया, तो अपनी उन कमियों को छिपाने और केस को मजबूत करने के लिए अंतिम समय में यह पैंतरा चला गया है, जो अनुच्छेद 21 (निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार) का उल्लंघन है। जस्टिस विक्टोरिया गौरी ने इस तर्क से सहमति जताते हुए कहा:

लापरवाह मुकदमेबाज को दूसरी पारी (Second Innings) नहीं: कोर्ट ने अपने आदेश में तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, “BNSS की धारा 348 एक शक्तिशाली न्यायिक उपकरण है। इसका उद्देश्य न्याय की विफलता को रोकना है, न कि किसी लापरवाह मुकदमेबाज को ‘दूसरी पारी’ (Second Innings) का उपहार देना।”

‘किसी भी चरण में’ का मतलब ‘बिना कारण के’ नहीं: सरकार की ओर से दलील दी गई कि BNSS की धारा 348 के तहत अदालत को मुकदमे के ‘किसी भी चरण’ (At any stage) पर गवाह बुलाने की व्यापक शक्ति है। हाई कोर्ट ने इस पर स्पष्ट किया कि ‘किसी भी चरण में’ का अर्थ यह कतई नहीं है कि ‘बिना किसी ठोस कारण के’ कभी भी गवाह बुला लिया जाए। जब अभियोजन के साक्ष्य बंद हो चुके हों और आरोपी का बयान दर्ज हो चुका हो, तब गवाह को दोबारा बुलाने के लिए बहुत उच्च स्तर की न्यायिक संतुष्टि (Higher degree of judicial satisfaction) की आवश्यकता होती है।

कमियों को भरने (Filling up lacunae) पर रोक: कोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने यह जांचने की जहमत ही नहीं उठाई कि ये दस्तावेज इतने दिनों तक क्यों नहीं लाए गए और इनके बिना न्याय क्यों संभव नहीं था। इस मोड़ पर गवाह को दोबारा बुलाने की अनुमति देना अभियोजन पक्ष को अपनी केस की कमियां भरने की छूट देने जैसा होगा, जो आरोपी के प्रति गंभीर पूर्वाग्रह और अन्याय होगा।

अदालत ने निचली अदालत के आदेश को यांत्रिक, अस्पष्ट और विधिक रूप से टिकाऊ न मानते हुए पूरी तरह रद्द (Set aside) कर दिया।

विधिक तुलना: नए और पुराने कानून का संबंध (Statutory Matrix)

विधिक और प्रशासनिक श्रेणियांमद्रास उच्च न्यायालय की विधिक व्याख्या (२०२६)
संबंधित अदालतमद्रास उच्च न्यायालय (मदुरै पीठ)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस विक्टोरिया गौरी (एकल पीठ)
समानार्थक विधिक धाराएंधारा 348 BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) जो पुरानी धारा 311 CrPC (दंड प्रक्रिया संहिता) के समरूप है।
मामले के पक्षकारअन्बू (याचिकाकर्ता/आरोपी) बनाम राज्य (अभियोजन पक्ष)
अदालत का मुख्य विधिक सिद्धांतट्रायल के अंतिम छोर पर अभियोजन पक्ष को अपनी केस की कमियों (Lacunae) को भरने या सुधारने के लिए गवाह रिकॉल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
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