Sunday, June 28, 2026
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Dead Wood Marriage: मरे हुए रिश्ते की नाव को और खींचने से कोई फायदा नहीं…36 साल के अलगाव के बाद क्या सुनाया विधिक फैसला, यहां जानिए

Dead Wood Marriage: झारखंड हाईकोर्ट ने वैवाहिक संबंधों में लंबे समय के अलगाव और रिश्तों के पूरी तरह मृत हो जाने (Irretrievable Breakdown of Marriage) को लेकर एक महत्वपूर्ण और व्यावहारिक विधिक निर्णय सुनाया है।

लंबे समय से पति-पत्नी अलगाव को Dead Wood Marriage करार दिया

हाईकोर्ट के जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की डिवीजन बेंच ने इसके साथ ही मानवीय और आर्थिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से फैमिली कोर्ट द्वारा तय ₹10 लाख के गुजारे भत्ते को बढ़ाकर ₹40 लाख एकमुश्त स्थायी गुजारा भत्ता (One-time Permanent Alimony) करने का आदेश दिया। अदालत ने 42 साल पुरानी शादी को आधिकारिक तौर पर समाप्त करने के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि 36 वर्षों के लंबे अलगाव के बाद यह वैवाहिक रिश्ता एक ‘मरे हुए पेड़ की लकड़ी’ (Dead Wood Marriage) जैसा हो गया है, जिसे जबरन खींचने का कोई औचित्य नहीं है।

विधिक पृष्ठभूमि: 1984 की शादी और 36 साल का दर्दनाक अलगाव

यह कानूनी मामला जामताड़ा के एक दंपत्ति के बीच दशकों पुराने विवाद से उपजा था।

विवाद की शुरुआत: याचिकाकर्ता (पत्नी) और प्रतिवादी (पति) का विवाह 29 मई 1984 को हुआ था और उनकी एक बेटी भी है। पति चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स (रेलवे) में सीनियर टेक्नीशियन (एम.वी. ड्राइवर) के पद पर कार्यरत है।

क्रूरता और परित्याग के आरोप: पति का दावा था कि पत्नी साल 1990 में ही ससुराल छोड़कर अपने मायके चली गई थी और सुलह के तमाम प्रयासों के बाद भी वापस नहीं आई। वहीं, पत्नी का आरोप था कि पति के किसी दूसरी महिला के साथ अवैध संबंध थे, जिसके कारण उसे अलग रहने पर मजबूर होना पड़ा। पत्नी ने पूर्व में धारा 498A के तहत आपराधिक मामला भी दर्ज कराया था, जो बाद में सुलझ गया था।

फैमिली कोर्ट का फैसला: जामताड़ा की पारिवारिक अदालत ने क्रूरता और परित्याग (Cruelty and Desertion) के आधार पर हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) और 13(1)(ib) के तहत शादी को भंग कर दिया था और ₹10 लाख का गुजारा भत्ता तय किया था। पत्नी ने इस रकम को नाकाफी बताते हुए हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।

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हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: Dead Wood Marriage जैसी स्थिति में तलाक ही एकमात्र रास्ता

झारखंड हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों के साक्ष्यों का गहराई से अध्ययन करने के बाद निम्नलिखित महत्वपूर्ण विधिक और सामाजिक टिप्पणियां कीं।

मरे हुए रिश्ते को ढोने का कोई व्यावहारिक विधिक मूल्य नहीं

अदालत ने दोनों पक्षों के पिछले 36 वर्षों से अलग रहने के अकाट्य तथ्य को रेखांकित करते हुए कहा, इस स्थिति में इस अदालत का सुविचारित मत है कि पक्षों के बीच वैवाहिक संबंध अब ‘डेड वुड मैरिज’ (Dead Wood Marriage) बन चुका है। यह रिश्ता पूरी तरह से बेजान, भावनात्मक और व्यावहारिक मूल्य से रहित हो गया है। कानून का यह स्थापित सिद्धांत है कि जब कोई शादी इस मृत स्थिति में पहुंच जाए, तो अदालतें उसे तलाक का वैध आधार मान सकती हैं। ऐसी ‘मरे हुए रिश्ते की नाव’ (Sailing the Dead Wood) को और आगे खींचने से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा, बल्कि यह दोनों पक्षों की पीड़ा को और बढ़ाएगा।

धारा 25 (स्थायी गुजारा भत्ता) के तहत वित्तीय राहत में भारी वृद्धि

अदालत ने माना कि हालांकि तलाक का फैसला सही था, लेकिन फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई ₹10 लाख की राशि पत्नी के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए बेहद कम थी। कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के सिद्धांतों की व्याख्या करते हुए कहा कि गुजारा भत्ता तय करते समय निम्नलिखित कारकों को देखना विधिक रूप से अनिवार्य है, इसमें पक्षों की वर्तमान आय और जीवन स्तर, बढ़ती हुई महंगाई (Inflation) और पत्नी की अपनी कोई स्वतंत्र आय न होना और
बढ़ती उम्र में होने वाली भविष्य की चिकित्सा आवश्यकताएं (Medical Needs)।

पति के रिटायरमेंट और पेंशनरी लाभों का विधिक संज्ञान

हाई कोर्ट ने नोट किया कि पति 31 अगस्त 2026 को अपनी सेवा से सेवानिवृत्त (Retire) होने जा रहा है, और उसे लगभग ₹38 लाख के सेवानिवृत्ति लाभ (Retiral Benefits) और साथ ही नियमित मासिक पेंशन मिलने वाली है। अतः पति की वित्तीय क्षमता को देखते हुए कोर्ट ने गुजारे भत्ते को बढ़ाकर ₹40 लाख करना पूरी तरह से न्यायसंगत और उचित माना।

हाई कोर्ट का अंतिम विधिक निर्देश

हाई कोर्ट ने पति को आदेश दिया कि वह बढ़ा हुआ ₹40 लाख का स्थायी गुजारा भत्ता चार समान किश्तों में 12 महीनों के भीतर अनिवार्य रूप से चुकाए। इसमें
पहली किश्त के तहत इस अदालती आदेश की तारीख से एक महीने के भीतर देय होगी। वहीं शेष किश्तें अगले 11 महीनों के भीतर समान अंतरालों पर चुकानी होंगी।

Dead Wood Marriage: केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक श्रेणियां / बिंदुझारखंड उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (जून 2026)
संबंधित अदालतझारखंड उच्च न्यायालय, रांची (डिवीजन बेंच)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद
मूल अधिनियम/धाराएंहिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 (तलाक) और धारा 25 (स्थायी गुजारा भत्ता)
अलगाव की अवधि36 वर्ष (साल 1990 से दोनों पक्ष अलग रह रहे थे)
पति की विधिक स्थितिरेलवे कर्मचारी (सीनियर टेक्नीशियन), सेवानिवृत्ति तिथि: 31 अगस्त 2026
अदालत का विधिक स्टैंडभावशून्य और भावनात्मक रूप से मृत हो चुकी शादी (Dead Wood) को जबरन बनाए रखना क्रूरता है। हालांकि, आश्रित पत्नी को सम्मानजनक जीवन जीने के लिए पर्याप्त वित्तीय सुरक्षा मिलना आवश्यक है।
अंतिम न्यायिक परिणामतलाक की डिक्री बरकरार; स्थायी गुजारा भत्ता ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹40 लाख (4 किश्तों में देय) किया गया।
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