Thursday, September 24, 2026
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Cryptic Docket Order: समन जारी करने से पहले मजिस्ट्रेट को कारण दर्ज करना अनिवार्य…बिना दिमाग लगाए जारी आदेश टिकाऊ नहीं, यह रही हिदायत

केस एवं प्रक्रियात्मक सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक/प्रशासनिक बिंदुविवरण (अगस्त 2026)
माननीय पीठन्यायमूर्ति जे. श्रीनिवास राव (तेलंगाना उच्च न्यायालय)
मामला नाम / केस नंबरKistaiahgari Sandeep v. State of Telangana & Anr. (Criminal Petition No. 7515 of 2026)
संबंधित कानूनCrPC धारा 190 / 204 (BNSS धारा 210 / 227) – संज्ञान और समन प्रक्रिया
प्रमुख विधिक नजीरेंSunil Bharati Mittal v. CBI, GHCL Employees Stock Option Trust, Fakhruddin Ahmad v. State of Uttaranchal
मुख्य कानूनी सिद्धांतआपराधिक संज्ञान अपराध का लिया जाता है, न कि अपराधी का। समन जारी करने के लिए मजिस्ट्रेट का सकारण आदेश (Reasoned Order) देना अनिवार्य है।
अदालत का निर्णयसमन जारी करने का आदेश रद्द; मजिस्ट्रेट को नए सिरे से सकारण आदेश पारित करने की स्वतंत्रता।

Cryptic Docket Order: तेलंगाना हाईकोर्ट ने एक आपराधिक मामले में मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लेने (Taking Cognizance) और समन जारी करने के आदेश को रद्द कर दिया है।

न्यायमूर्ति जे. श्रीनिवास राव की एकल पीठ ने ‘किस्टैयागारी संदीप बनाम तेलंगाना राज्य एवं अन्य’ मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि संज्ञान लेने की प्रक्रिया एक न्यायिक कार्य है, जिसमें न्यायाधीश/मजिस्ट्रेट द्वारा न्यायिक विवेक का प्रयोग (Application of Mind) करना और यह दर्ज करना आवश्यक है कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर प्रथम दृष्टया (Prima Facie) अपराध बनता है या नहीं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी अभियुक्त को अदालत में मुकदमा झेलने के लिए बुलाने का आदेश यांत्रिक (Mechanically) या संक्षिप्त/अस्पष्ट (Cryptic Docket Order) तरीके से पारित नहीं किया जा सकता।

हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां

  • समन जारी करना एक गंभीर विषय:“किसी अभियुक्त को आपराधिक मुकदमे का सामना करने के लिए समन जारी करने की कार्रवाई एक गंभीर विषय है। ऐसा आदेश अस्पष्ट/संक्षिप्त (Cryptic) आदेशों के आधार पर पारित नहीं किया जा सकता। संज्ञान लेते और प्रक्रिया शुरू करते समय पीठासीन अधिकारी (Presiding Officer) द्वारा विवेक के उचित प्रयोग को आदेश में दर्शाया जाना अनिवार्य है।”
  • सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला (Sunil Bharati Mittal v. CBI): अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय की नजीर का हवाला देते हुए दोहराया कि संज्ञान लेने की पूर्व शर्त (Sine Qua Non) मजिस्ट्रेट द्वारा विवेक का प्रयोग और यह संतुष्टि है कि यदि आरोपों को साबित कर दिया जाए, तो क्या उनसे अपराध घटित होता है।

Cryptic Docket Order: मामला क्या था? (Case Background)

  1. मामले की पृष्ठभूमि:
    • याचिकाकर्ता (किस्टैयागारी संदीप) ने संगारेड्डी स्थित ‘विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (निषेध एवं आबकारी अपराध)’ के समक्ष लंबित मामले (C.C. No.178/2024) की कार्यवाही को चुनौती दी थी।
    • मजिस्ट्रेट ने 19 फरवरी 2024 को एक संक्षिप्त डॉकेट ऑर्डर के जरिए आईपीसी की धारा 188, 336 और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 15 के तहत अपराधों का संज्ञान लिया और याचिकाकर्ता को समन जारी कर दिया था।
  2. याचिकाकर्ता का तर्क और हाई कोर्ट का निष्कर्ष:
    • याचिकाकर्ता के वकील एस. सूर्या तेजा ने तर्क दिया कि मजिस्ट्रेट ने बिना किसी कारण के और बिना विवेक का प्रयोग किए सीधे समन जारी कर दिया।
    • High Court ने आदेश का अवलोकन करने के बाद पाया कि डॉकेट ऑर्डर में मजिस्ट्रेट ने कोई कारण दर्ज नहीं किया था और न ही यह दर्शाया था कि पुलिस रिपोर्ट/सामग्री से अपराध का प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं।

⚖️ हाई कोर्ट का अंतिम आदेश

  1. समन आदेश रद्द (Docket Order Quashed): तेलंगाना हाई कोर्ट ने 19 फरवरी 2024 के विवादित डॉकेट आदेश (Crime No.15/2024) को रद्द कर दिया।
  2. ताजा आदेश पारित करने की छूट: अदालत ने स्पष्ट किया कि इस आदेश से मजिस्ट्रेट पर कोई रोक नहीं होगी; मजिस्ट्रेट कानून के अनुसार सामग्री का पुनः परीक्षण करके और अपने विवेक का प्रयोग करते हुए कारण दर्ज (Reasoned Order) करके नए सिरे से संज्ञान लेने का आदेश पारित कर सकते हैं।

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