केस एवं प्रक्रियात्मक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | विवरण (जुलाई 2026) |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति मोहम्मद शफीक (मद्रास उच्च न्यायालय) |
| संबंधित कानून | IPC की धारा 494 एवं 495 (BNS की धारा 82) – द्विविवाह व पहली शादी छुपाना |
| विधिक मुद्दा | क्या द्विविवाह (Bigamy) के मुकदमे में बच्चे का पितृत्व साबित करने के लिए अनिवार्य DNA Test कराया जा सकता है? |
| मुख्य विधिक सिद्धांत | DNA Test निजता के अधिकार से जुड़ा गंभीर विषय है; केवल मुख्य आपराधिक तत्व सिद्ध करने के लिए ‘अत्यंत आवश्यकता’ होने पर ही इसका आदेश दिया जा सकता है, गौण (Collateral) मुद्दों के लिए नहीं। |
| अदालत का निर्णय | ट्रायल कोर्ट का DNA टेस्ट का आदेश रद्द; याचिकाकर्ता पति के पक्ष में फैसला। |
DNA Test of Minors: मद्रास हाईकोर्ट ने एक कथित द्विविवाह (Bigamy) और पहली शादी छुपाने के मामले में पति, पत्नी और नाबालिग बच्चे का डीएनए परीक्षण (DNA Test) कराने के निचली अदालत के आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया है।
न्यायमूर्ति मोहम्मद शफीक की पीठ ने फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि द्विविवाह या पहली शादी की बात छुपाकर दूसरी शादी करने से जुड़े अपराधों (IPC Section 494/495) को तय करने में बच्चे के पितृत्व (Paternity) का कोई लेना-देना या प्रासंगिकता नहीं है।
हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
- द्विविवाह के अपराध और डीएनए टेस्ट का संबंध:“मेरे मन में कोई संदेह नहीं है कि डीएनए टेस्ट या बच्चे का पितृत्व आईपीसी की धारा 494 (पति/पत्नी के जीवनकाल में दोबारा शादी करना) और धारा 495 (पहला विवाह छुपाकर दोबारा शादी करना) के तहत कथित अपराधों को निर्धारित करने में कोई प्रभाव नहीं डालता… ट्रायल कोर्ट द्वारा डीएनए परीक्षण का निर्देश देना वैधानिक ढांचे और संवैधानिक सुरक्षा उपायों (Constitutional Safeguards) दोनों की मौलिक गलतफहमी पर आधारित है।”
- समानुपातिकता और निजता का अधिकार (Privacy Standards): अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के सिद्धांतों का हवाला देते हुए दोहराया कि डीएनए टेस्ट जैसे आदेश नियमित (Routinely) रूप से नहीं दिए जाने चाहिए। जब तक डीएनए का परिणाम सीधे तौर पर मुख्य विवाद से जुड़ा न हो और उसकी ‘अत्यंत आवश्यकता’ (Eminent Need) न हो, तब तक ऐसे परीक्षण का आदेश नहीं दिया जा सकता। केवल एक गौण (Collateral Issue) मुद्दे को सुलझाने के लिए डीएनए परीक्षण का आदेश देना गैर-कानूनी है।
मामला क्या था? (Case Background)
- विवाह और आपराधिक शिकायत
- जोड़ा 24 जनवरी 2011 को मदुरै में विवाह के बंधन में बंधा था, और जून 2012 में उनके एक बेटा हुआ।
- पत्नी का आरोप था कि पति ने अपनी पहली शादी की बात छुपाकर उससे छलपूर्वक शादी की, संपत्ति व पैसे ठगे और प्रताड़ित किया। शिकायत के आधार पर पुलिस ने आईपीसी की धारा 420, 418, 468, 494 और 495 के तहत फाइनल रिपोर्ट दाखिल की।
- डीएनए टेस्ट की मांग कैसे उठी?
- विचारण (Trial) के दौरान cross-examination करते हुए पति ने दावा किया कि वह उस बच्चे का जैविक पिता (Biological Father) नहीं है और पत्नी की पहले भी एक शादी हो चुकी थी।
- इसके बाद, अभियोजन पक्ष (Prosecution) ने 2025 में पति, पत्नी और बच्चे का डीएनए टेस्ट कराने की अर्जी दाखिल की, जिसे ट्रायल कोर्ट ने स्वीकार कर लिया था। पति ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी।
- पति का तर्क
- पति ने दलील दी कि मुख्य मुकदमा इस बात का है कि क्या उसने पहली शादी छुपाकर दूसरी शादी की थी या नहीं। बच्चे का पितृत्व इस आपराधिक मुकदमे का मुख्य तत्व (Ingredient) नहीं है।
⚖️ हाई कोर्ट का अंतिम आदेश
मद्रास हाई कोर्ट ने माना कि आईपीसी की धारा 495 केवल धारा 494 का एक गंभीर रूप (Aggravated Form) है, जिसमें अभियोजन को यह साबित करना होता है कि आरोपी ने पहली शादी की बात छुपाई। बच्चे का डीएनए टेस्ट इस अपराध को साबित या खारिज करने के लिए आवश्यक नहीं है।
हाई कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने कानून और संवैधानिक सुरक्षा उपायों को समझने में गलती की है। इसलिए, 24 जुलाई 2026 के अपने आदेश में हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के डीएनए टेस्ट कराने के आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया।

