Sunday, May 17, 2026
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CJI Express: फाइल कहां है से लिंक भेज दीजिए तक का सफर…डिजिटल न्यायप्रणाली पर सीजेआई के मुख्य विचार, पढ़ें उनके संस्मरण वाला संबोधन

CJI Express: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्या कांत ने न्यायपालिका के डिजिटल बदलाव (Digital Transformation) पर एक बेहद व्यावहारिक और विचारोत्तेजक भाषण दिया है।

भाषण का मुख्य सारांश (Quick Takeaways)

विषयसीजेआई सूर्या कांत का दृष्टिकोण
तकनीक का महत्वडिजिटल सिस्टम केवल सुविधा के साधन नहीं हैं, बल्कि ये न्याय के रास्ते की बाधाओं को कम करने वाले संवैधानिक तंत्र हैं।
बदलाव की गतिजो बदलाव दशकों में आता, उसे कोविड-19 महामारी के संकट ने एक झटके में स्वीकार करने पर मजबूर कर दिया।
पर्यावरणीय प्रभावपेपरलेस कोर्ट रूम ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच अदालतों की टिकाऊ (Sustainable) जिम्मेदारी है।
युवा वकीलों की भूमिकापहली पीढ़ी के युवा वकीलों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करके अपने लिए नए अवसरों और सुलभता को बढ़ाया है।

पहले लाल कपड़े में बंधे फाइलों का भारी भरकम बंडल होते थे…

सीजेआई सूर्याकांत ने रेखांकित किया कि कैसे भारतीय अदालतें लाल कपड़े में बंधे फाइलों के भारी-भरकम बंडलों और कागजी ट्रॉलियों के दौर से निकलकर पूरी तरह आधुनिक और तकनीक-अनुकूल बन रही हैं। डिजिटल परिवर्तन: पेपरलेस कानूनी प्रणाली को बढ़ावा विषय पर बोलते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि भाषा का यह छोटा सा बदलाव वास्तव में न्याय वितरण प्रणाली (Justice-Delivery System) के एक बहुत बड़े और ऐतिहासिक संस्थागत परिवर्तन को दर्शाता है।

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जितनी भारी फाइल, उतनी अच्छी तैयारी का भ्रम टूटा

सीजेआई सूर्या कांत ने ईमानदारी से स्वीकार किया कि वे खुद भी कभी इस पूर्वाग्रह (Prejudice) के शिकार थे कि वकील की फाइल जितनी भारी होगी, उसकी तैयारी उतनी ही मजबूत होगी। लेकिन समय के साथ यह समझ में आ गया कि न्याय किताबों या पन्नों की संख्या में नहीं, बल्कि कार्यकुशलता (Efficiency) और सुलभता (Accessibility) में निहित है।

आम नागरिकों को प्रशासनिक देरी से मुक्ति

  • कागजी कार्रवाई से डिजिटल सिस्टम पर जाने का सबसे बड़ा लाभ आम लोगों, विशेषकर समाज के कमजोर वर्गों को हुआ है।
  • तारीख पर तारीख से राहत: पहले कई बार मामले केवल इसलिए टल जाते थे क्योंकि फाइल समय पर कोर्ट रूम में नहीं पहुंच पाती थी या कहीं गुम हो जाती थी।
  • दूर-दराज के वादियों को लाभ: एक किसान जो रात भर यात्रा करके सुदूर गांव से आता है, एक पेंशन का इंतजार करने वाली महिला, या एक विचाराधीन कैदी (Undertrial Prisoner) इन सभी को सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही के कारण लंबा इंतजार करना पड़ता था। डिजिटल प्रणाली ने इस दूरी और समय को खत्म कर दिया है।

डिजिटल ह्यूमिलिटी’ (डिजिटल विनम्रता) का मजेदार किस्सा

सीजेआई ने कोविड-19 महामारी के दौरान अचानक शुरू हुए इस डिजिटल बदलाव के शुरुआती दिनों की चुनौतियों और वकीलों के अनुभवों को भी साझा किया। उन्होंने मुस्कुराते हुए एक किस्सा सुनाया। कहा, मुझे याद है कि एक वरिष्ठ वकील कई मिनटों तक म्यूट (Mute) रहकर बहुत जोश के साथ अपनी दलीलें पेश कर रहे थे। जब तक इस बात का पता चला, तब तक वर्चुअल कोर्ट रूम में मौजूद हर व्यक्ति ‘डिजिटल विनम्रता’ (Digital Humility) का एक बड़ा सबक सीख चुका था! शायद इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ था, जहाँ बार (Bar) में किसी वकील की वरिष्ठता (Seniority) भी कमजोर इंटरनेट कनेक्टिविटी के आगे कोई काम नहीं आई।

सिक्किम: देश की पहली ‘पेपरलेस न्यायपालिका’

सीजेआई ने इस बात पर विशेष गर्व व्यक्त किया कि यह तकनीकी बदलाव अब केवल सुप्रीम कोर्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की जिला अदालतों तक पहुंच चुका है। उन्होंने सिक्किम का उदाहरण दिया, जिसे हाल ही में देश की पहली पूरी तरह से पेपरलेस न्यायपालिका (First Paperless Judiciary) घोषित किया गया है। उन्होंने इसे आने वाली पीढ़ियों के प्रति पर्यावरण और पारिस्थितिक चेतना (Ecological Consciousness) की दिशा में एक जिम्मेदार कदम बताया।

सीजेआई की चेतावनी: ‘डिजिटल विभाजन’ (Digital Exclusion) से बचना जरूरी

  • मुख्य न्यायाधीश ने तकनीक के अत्यधिक उपयोग को लेकर एक बहुत ही महत्वपूर्ण संवैधानिक और मानवीय चेतावनी भी दी।
  • समावेशी न्याय: डिजिटल परिवर्तन ऐसा नहीं होना चाहिए जो देश के गरीब, निरक्षर या तकनीक से दूर रहने वाले नागरिकों को न्याय की प्रक्रिया से बाहर (Exclude) कर दे।
  • मानवीय संवेदनशीलता: अदालतों को आधुनिक बनाने के साथ-साथ मानवीय दृष्टिकोण, प्रक्रियात्मक सहायता (Procedural Assistance) और संस्थागत संवेदनशीलता को हमेशा बनाए रखना होगा, ताकि अंतिम छोर पर खड़ा व्यक्ति भी आसानी से न्याय पा सके।

भविष्य की आधुनिक न्यायपालिका

मुख्य न्यायाधीश का यह वक्तव्य साफ करता है कि भारतीय न्यायपालिका अब केवल परंपराओं के बोझ तले दबी संस्था नहीं रहना चाहती। तकनीक को अपनाकर अदालतें अपने मूल काम यानी ‘प्रशासनिक फाइलों को घुमाने’ के बजाय ‘न्याय निर्णय’ (Adjudication) पर अधिक ध्यान केंद्रित कर पा रही हैं।

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