केस मैट्रिक्स: Supreme Court Suo Motu Hearing on Digital Arrest & Cyber Frauds
| पहलू | विवरण |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| माननीय पीठ | CJI सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची एवं जस्टिस वी. मोहाना |
| केस का प्रकार | स्वप्रेरित याचिका (Suo Motu Writ Petition) |
| मुख्य सुझाव | डिजिटल अरेस्ट को Standalone Offence बनाना, सख्त सजा और आरोपी की संपत्ति फ्रीज करना। |
| सरकार का रुख | नया ड्राफ्ट बिल लाया जा रहा है जिसमें डिजिटल अरेस्ट और डीपफेक के कड़े प्रावधान होंगे। |
| अदालत का आदेश | सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर बुधवार को दिशा-निर्देश (Directions) जारी करेगा। |
Digital Arrest & Cyber Frauds: देश भर में तेजी से बढ़ते ‘डिजिटल अरेस्ट’ (Digital Arrest) और साइबर फ्रॉड के मामलों पर सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहाना की पीठ डिजिटल अरेस्ट और ऑनलाइन घोटालों के खिलाफ ठोस कदम उठाने से जुड़ी एक स्वतः संज्ञान (Suo Motu) याचिका पर सुनवाई कर रही थी।शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को आपराधिक कानूनों में ‘डिजिटल अरेस्ट’ को एक अलग व स्वतंत्र अपराध (Standalone Offence) के रूप में परिभाषित करने और इसके दोषियों के लिए कठोर सजा (Harsher Punishment) तय करने का सुझाव दिया है।
सुप्रीम कोर्ट और जजों की मुख्य टिप्पणियां
- संपत्ति जब्त करने की सिफारिश (CJI सूर्यकांत):“क्या आपको आपराधिक कानूनों में ‘डिजिटल अरेस्ट’ को औपचारिक रूप से परिभाषित करने की आवश्यकता है? इसमें जबरन वसूली (Extortion) और डकैती/लूट (Robbery) के तत्व शामिल हैं। इसे सख्त परिणामों वाले एक स्वतंत्र अपराध के रूप में परिभाषित किया जाना चाहिए, साथ ही ऐसा प्रावधान भी हो कि प्राथमिक साक्ष्यों के आधार पर आरोपी की संपत्ति तुरंत फ्रीज कर दी जाए।”
- डीपफेक पर नई कानूनी व्यवस्था की मांग (जस्टिस जोयमाल्या बागची):“हमारे सामने अब डीपफेक (Deepfakes) की चुनौती है, जिसका उपयोग धोखाधड़ी और भेष बदलने (Impersonation) के लिए किया जा रहा है। आप मौजूदा कानूनों से लड़ रहे हैं, लेकिन आपको कानून को और पैना (Chisel) करना होगा। अनुच्छेद 142 के तहत अदालत खुद नया अपराध परिभाषित नहीं कर सकती, इसके लिए विधायी हस्तक्षेप की आवश्यकता है।”
केंद्र सरकार का जवाब: जल्द आएगा नया विधेयक
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से महत्वपूर्ण जानकारी दी गई।
- सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत को सूचित किया कि सरकार डीपफेक और डिजिटल अरेस्ट से निपटने के लिए एक नए विधेयक (Draft Bill) पर काम कर रही है, जो जल्द ही सामने आएगा।
- अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने बताया कि अंतर-विभागीय समिति (Inter-Departmental Committee – IDC) मौजूदा कानूनी कमियों को दूर करने के लिए अपनी व्यापक रिपोर्ट को अंतिम रूप दे रही है।
- CBI जांच का दायरा: अटॉर्नी जनरल ने बताया कि सीबीआई वर्तमान में ₹10 करोड़ और उससे अधिक के 20 बड़े साइबर फ्रॉड मामलों की जांच कर रही है, जबकि अन्य मामलों को राज्य पुलिस संभाल रही है।
बैंक खातों की फ्रीजिंग और सुरक्षा के लिए AG के सुझाव
अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट से निम्नलिखित निर्देश जारी करने का अनुरोध किया।
- RBI द्वारा SOP लागू करना: संदिग्ध म्यूल खातों (Mule Accounts) में लेनदेन को अस्थाई रूप से रोकने (Debit Holds) के लिए आरबीआई द्वारा एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाकर पूरे देश में लागू की जाए।
- ग्रीवांस रेड्रेसल व मनी रिस्टोरेशन मॉड्यूल: सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बैंक खातों को फ्रीज करने और फ्रॉड की रकम वापस दिलाने संबंधी तंत्र को तेज किया जाए।
- साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर: सभी राज्यों में स्टेट साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (State Cyber Crime Coordination Centres) के गठन में तेजी लाई जाए।
स्वतः संज्ञान (Suo Motu) मामले का इतिहास
- मामले की शुरुआत: यह मामला अक्टूबर 2025 में दर्ज किया गया था, जब एक बुजुर्ग दंपत्ति ने सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखकर बताया था कि सीबीआई, आईबी और न्यायपालिका के फर्जी अधिकारी बनकर ठगों ने उन्हें डराकर ₹1.5 करोड़ की ठगी की।
- व्हाट्सएप की कार्रवाई: अप्रैल 2026 में व्हाट्सएप ने कोर्ट को बताया था कि उसने जनवरी 2026 से 12 हफ्तों के भीतर भारत में डिजिटल अरेस्ट से जुड़े 9,400 से अधिक खातों को बैन कर दिया था।

