न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की मुख्य टिप्पणियां
1. “जज ही जजों को नियुक्त करते हैं”—एक भ्रामक धारणा:
न्यायमूर्ति दत्ता ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के उस तर्क का जवाब दिया, जिसमें सरकार ने चुनाव आयोग की चयन समिति में कार्यपालिका के बहुमत का बचाव करने के लिए कॉलेजियम का उदाहरण दिया था।
- जज ने स्पष्ट किया कि कॉलेजियम कोई निरंकुश व्यवस्था नहीं है। नियुक्ति की प्रक्रिया में केंद्र, राज्य सरकारें, खुफिया एजेंसियां (IB/RAW) और राष्ट्रपति का अंतिम अनुमोदन (Imprimatur) शामिल होता है।
- उन्होंने कहा कि ‘जज जजों को चुनते हैं’ का जुमला कुछ निहित स्वार्थों द्वारा फैलाया गया एक गढ़ा हुआ नैरेटिव (Motivated Narrative) है।
2. कॉलेजियम के प्रस्तावों की ‘चुनिंदा मंजूरी’ पर चिंता:
- न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा कि जब भी सरकार कॉलेजियम की सिफारिशों में से कुछ नामों को पास कर देती है और कम से कम एक नाम को रोक लेती है, तो इससे कॉलेजियम के प्रस्तावों की पवित्रता समाप्त हो जाती है।
- उन्होंने कहा कि न्यायपालिका सरकार के साथ सीधे टकराव (Head-on Conflict) और संवैधानिक संकट से बचने के लिए इसे चुपचाप स्वीकार कर लेती है, लेकिन यह स्थिति स्वतंत्र न्यायपालिका की अवधारणा के खिलाफ है।
3. चुनाव आयोग (ECI) की स्वतंत्रता पर रुख:
- केंद्र सरकार के इस तर्क को खारिज करते हुए कि चयन समिति में बाहरी व्यक्ति (जैसे CJI) का होना जरूरी नहीं है, जज ने सवाल उठाया: “न्यायपालिका को जजों की नियुक्ति में दूसरे पायदान पर धकेलने के बाद भी, चुनाव आयुक्तों के चयन के चरण में बाहरी व्यक्ति (CJI) को बाहर रखने की इतनी छटपटाहट क्यों है?”
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति से जुड़े 2026 के ताजा न्यायिक घटनाक्रम के दौरान न्यायिक नियुक्तियों, कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System), और कार्यपालिका द्वारा कॉलेजियम की सिफारिशों को चुनिंदा रूप से (Selectively) मंज़ूर करने के रवैये पर अत्यंत तीखी और ऐतिहासिक टिप्पणी की है।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ द्वारा ‘मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023’ की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम भारत संघ) को संविधान पीठ (Larger Bench under Article 145(3)) को संदर्भित करने के प्रश्न पर दिए गए विभाजित फैसले (Split Verdict) के दौरान सामने आई। जहां न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा ने मामले को 5 जजों की संविधान पीठ को भेजने का समर्थन किया, वहीं न्यायमूर्ति दत्ता ने सरकार की इस मांग को खारिज करते हुए वर्तमान पीठ द्वारा ही सुनवाई जारी रखने का मत व्यक्त किया। शीर्ष अदालत के न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने दो टूक शब्दों में कहा कि देश में यह बहुप्रचारित धारणा कि “जज ही जजों की नियुक्ति करते हैं” पूरी तरह से एक मनगढ़ंत मिथक (Myth) है, जिसे स्वार्थी तत्वों द्वारा प्रेरित आख्यानों (Motivated Narratives) के जरिए जनता के बीच फैलाया गया है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता के प्रमुख विधिक अवलोकन एवं तीखे निष्कर्ष
1. ‘जज ही जजों को नियुक्त करते हैं—यह स्वार्थी तत्वों का फैलाया गया मिथक है’
केंद्र सरकार द्वारा चुनाव आयुक्तों के चयन पैनल में कार्यपालिका के दबदबे का बचाव करते हुए जब यह दलील दी गई कि कॉलेजियम प्रणाली में भी मौजूदा जज ही भावी जजों को चुनते हैं, तो जस्टिस दत्ता ने इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा: “यह बहुप्रचारित मुहावरा कि ‘जज ही जजों की नियुक्ति करते हैं’ पूरी तरह एक मिथक है, जिसे स्वार्थी तत्वों द्वारा गढ़े गए प्रेरित आख्यानों के जरिए लोगों के गले उतारा गया है। यह सामान्यीकरण कि कॉलेजियम अपने आप में एक स्वतंत्र कानून की तरह काम करता है, संविधान के तहत परिकल्पित उस विस्तृत परामर्श प्रक्रिया (Consultative Process) को नजरअंदाज करता है जिसमें केंद्र और राज्यों दोनों स्तरों पर कार्यपालिका, खुफिया एजेंसियों (IB) द्वारा पृष्ठभूमि सत्यापन और अंततः भारत के राष्ट्रपति के हस्ताक्षर (Imprimatur) की अपरिहार्य भूमिका शामिल होती है।”
2. कॉलेजियम को हर विफलता के लिए दोषी ठहराने का ‘फैशन’
- जस्टिस दत्ता ने अफसोस जताते हुए कहा कि आज यह एक ‘फैशन’ बन गया है कि जब भी किसी अवांछित या अनुपयुक्त व्यक्ति की जज के रूप में नियुक्ति होती है, तो उसका पूरा ठीकरा कॉलेजियम के सिर फोड़ दिया जाता है:“आम जनता को यह विश्वास दिला दिया गया है कि कॉलेजियम ही सब कुछ तय करता है। लोग यह भूल जाते हैं कि अपवाद कभी नियम नहीं होते (Aberrations are exceptions, not the norm) और दुनिया की कोई भी प्रणाली मानवीय चयन में पूरी तरह अचूक होने की गारंटी नहीं दे सकती।”
3. कार्यपालिका द्वारा ‘चुनिंदा मंज़ूरी’ (Selective Clearance) और संवैधानिक संकट का डर
जस्टिस दत्ता ने केंद्र सरकार द्वारा कॉलेजियम की सिफारिशों में से कुछ नामों को मंज़ूर करने और कुछ को रोककर रखने (Pocket Veto / Piecemeal Approvals) की प्रथा पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया:
- पवित्रता का हनन: कॉलेजियम के प्रस्ताव की पवित्रता हर उस समय नष्ट हो जाती है जब कार्यपालिका अधिकांश नामों को मंज़ूरी दे देती है लेकिन एक या दो नामों को मनमाने ढंग से रोक लेती है।
- हॉब्सन चॉइस (विवशता): अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका कार्यपालिका के साथ सीधे टकराव (Head-on Conflict) से बचने और संभावित संवैधानिक संकट को टालने के लिए विवश होकर इस तरह की आंशिक मंज़ूरियों के साथ आगे बढ़ती है ताकि संस्थाएं ठप न हों।
- अंबेडकर के विज़न पर संकट: उन्होंने सवाल उठाया:“यह सिलसिला आखिर कब तक चल सकता है, यदि इस प्रकार के चुनिंदा क्रियान्वयन को एक स्वीकार्य प्रथा मान लिया जाए? बाबासाहेब डॉ. बी.आर. अंबेडकर का दृष्टिकोण था कि न्यायपालिका को कार्यपालिका से पूरी तरह स्वतंत्र और अपने आप में सक्षम होना चाहिए। परंतु मौजूदा स्थिति को देखते हुए वह दृष्टिकोण धुंधला और गंभीर दबाव में दिखाई देता है।”
4. चुनाव आयुक्त कानून के बचाव में कॉलेजियम की मिसाल देना ‘कुतर्क’
- जस्टिस दत्ता ने केंद्र सरकार के उस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया जिसमें 2023 के चुनाव आयुक्त अधिनियम का औचित्य साबित करने के लिए कॉलेजियम की समानता खींची गई थी:“न्यायिक नियुक्तियों में हर स्तर पर नियंत्रण रखने वाली कार्यपालिका द्वारा चुनाव आयुक्तों के चयन पैनल से सीजेआई (CJI) को बाहर रखने के बचाव में कॉलेजियम का उदाहरण देना कपटपूर्ण, टालमटोल भरा और निराशाजनक (Disingenuous, evasive and discouraging) है। यह अपनी विफलता से ध्यान भटकाने का एक कमजोर प्रयास मात्र है।”
मामले की पृष्ठभूमि एवं 2023 का चुनाव आयुक्त कानून
- अनूप बरनवाल फैसला (मार्च 2023, 5 जजों की संविधान पीठ):
- सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने व्यवस्था दी थी कि जब तक संसद कानून नहीं बनाती, तब तक मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तीन सदस्यीय समिति की सिफारिश पर होगी, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) शामिल होंगे।
- 2023 का विधायी अधिनियम (CJI को बाहर करना):
- संसद ने ‘मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023’ पारित किया।
- नए कानून के तहत चयन समिति से सीजेआई को पूरी तरह हटा दिया गया और समिति की संरचना कर दी गई:
- प्रधानमंत्री (अध्यक्ष)
- प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री
- लोकसभा में विपक्ष के नेता (LoP)
- सुप्रीम कोर्ट में चुनौती:
- एडीआर और डॉ. जया ठाकुर सहित कई याचिकाकर्ताओं ने इसे चुनौती देते हुए दलील दी कि 2:1 के सरकारी बहुमत वाला यह पैनल चुनाव आयोग की स्वायत्तता और निष्पक्ष चुनाव (जो संविधान का मूल ढांचा है) को नष्ट करता है।
- केंद्र सरकार ने मांग की थी कि अनुच्छेद 145(3) के तहत इस कानून की वैधता का परीक्षण 5 जजों की बड़ी संविधान पीठ द्वारा ही किया जाना चाहिए।
खंडपीठ का विभाजित फैसला (Split Verdict)
- न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता का मत: स्थापित न्यायिक नजीरों के तहत स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान का बुनियादी ढांचा हैं और चुनाव आयोग को कार्यपालिका के एकाधिकार से मुक्त रखना तय कानून है। इसके लिए किसी नई संविधान पीठ के संदर्भ की आवश्यकता नहीं है; वर्तमान खंडपीठ ही मामले का अंतिम फैसला करने के लिए पूर्ण सक्षम है।
- न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा का मत: 2023 के अधिनियम की संवैधानिक वैधता में संविधान की व्याख्या का सारभूत विधिक प्रश्न (Substantial question of law) शामिल है, जिसे अनुच्छेद 145(3) के अनुसार केवल पांच या अधिक न्यायाधीशों की संविधान पीठ द्वारा ही तय किया जाना चाहिए।
- परिणाम: खंडपीठ में मतभेद के चलते अब इस मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के समक्ष रखा जाएगा, जो उचित आदेश पारित कर मामले को 3 जजों की पीठ या 5 जजों की संविधान पीठ के गठन हेतु निर्देशित करेंगे।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) बनाम भारत संघ [W.P.(C) No. 87/2024] सहपठित डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत संघ [W.P.(C) No. 14/2024 – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन, शादान फरासत एवं अधिवक्ता प्रशांत भूषण
- केंद्र सरकार की ओर से: अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी एवं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता
- प्रासंगिक कानून एवं प्रावधान:
- मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 124(2) एवं 217 (उच्च व उच्चतम न्यायालयों में न्यायिक नियुक्तियां)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 324 (चुनाव आयोग की संरचना व स्वायत्तता)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 145(3) (संविधान पीठ के गठन हेतु विधि के सारभूत प्रश्न की अनिवार्यता)
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023, सुप्रीम कोर्ट 5-जज संविधान पीठ) — ‘चुनाव आयोग को कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त रखने के लिए चयन समिति में सीजेआई का होना आवश्यक माना गया था।’
- सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ (द्वितीय जज केस 1993, तृतीय जज संदर्भ 1998 एवं NJAC केस 2015) — ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान के मूल ढांचे का अंग है; जजों की नियुक्ति में कॉलेजियम की प्रधानता अनिवार्य है।’
- पीठ: न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा (सर्वोच्च न्यायालय)
Election Commission-IV: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ (Judges) | न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा (खंडपीठ) |
| मुख्य विषय | कॉलेजियम प्रणाली पर सरकार का तर्क व चुनाव आयोग कानून, 2023 की चुनौती |
| विभाजित फैसला (Split Verdict) | मामले को 5 जजों की बड़ी बेंच को भेजने पर दोनों जजों की राय अलग रही |

