Fake Court order: बॉम्बे हाई कोर्ट ने मुंबई पुलिस को कड़ी फटकार लगाते हुए हाई कोर्ट के ही आदेशों के फर्जीवाड़े (Fabrication of Orders) के मामले में की गई जांच को “कैजुअल” और गैर-जिम्मेदाराना करार दिया है।
मामले का सारांश (Quick Highlights)
| विवरण | तथ्य |
| आरोपी | वकील विनयकुमार खातू। |
| आरोप | बॉम्बे हाई कोर्ट के फर्जी आदेश तैयार कर क्लाइंट को देना। |
| पुलिस की गलती | जांच में “कैजुअल” रवैया और फर्जीवाड़ा करने वाले का पता न लगाना। |
| मुख्य बिंदु | व्हाट्सएप चैट्स की गहन जांच के आदेश। |
| अगली सुनवाई | 15 जून, 2026। |
नए सिरे से और गहन जांच के निर्देश दिए
जस्टिस आर. एम. जोशी की एकल पीठ ने कहा कि यह “चौंकाने वाला” है कि जब हाई कोर्ट के आदेशों के साथ छेड़छाड़ की गई, तब भी पुलिस ने असली अपराधी को पकड़ने के बजाय एक दिशा में और पूर्व-निर्धारित तरीके से जांच की। कोर्ट ने इस मामले में नए सिरे से और गहन जांच के निर्देश दिए हैं। यह मामला वकील विनयकुमार अशोक खातू से जुड़ा है, जिन पर उनके एक पूर्व मुवक्किल (Client) ने आरोप लगाया था कि वकील ने उन्हें हाई कोर्ट के दो फर्जी आदेश (दिनांक 17 अक्टूबर, 2022 और 12 दिसंबर, 2022) थमा दिए थे।
कैजुअल जांच और शॉकिंग स्थिति
- सुनवाई के दौरान जब कोर्ट ने जांच अधिकारी (IO) से पूछा कि ये फर्जी दस्तावेज किसने तैयार किए, तो अधिकारी कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पाया। इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की।
- गंभीरता का अभाव: “चूंकि यह इस अदालत (High Court) के दस्तावेजों के फर्जीवाड़े का मामला है, इसलिए जांच अत्यंत गंभीर तरीके से की जानी चाहिए थी।”
- असली अपराधी कौन? कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि पुलिस ने असली अपराधी को ढूंढने की कोशिश ही नहीं की और जांच केवल एक ही दिशा में सीमित रखी।
व्हाट्सएप चैट और साजिश का पहलू
- वकील (आरोपी) ने अपनी जमानत याचिका में कुछ व्हाट्सएप चैट पेश किए थे, जो कथित तौर पर फर्जी आदेश मिलने की तारीख के काफी बाद के थे। इन चैट्स में केस के लंबित होने पर चर्चा की गई थी।
- वकील की दलील: खातू का तर्क है कि उन्हें झूठा फंसाया जा रहा है और शायद शिकायतकर्ता ने ही किसी और के माध्यम से ये दस्तावेज बनवाए हों।
- पुलिस की लापरवाही: कोर्ट ने नोट किया कि जांच अधिकारी के पास ये व्हाट्सएप स्क्रीनशॉट पहले से थे, फिर भी उसने मोबाइल फोन का उचित विश्लेषण नहीं किया और न ही इन चैट्स की सच्चाई जानने की कोशिश की।
हाई कोर्ट का सख्त निर्देश
- जस्टिस जोशी ने स्पष्ट किया कि हाई कोर्ट अपने आदेशों के फर्जीवाड़े पर मूकदर्शक बनकर नहीं बैठ सकता।
- नई जांच: आजाद मैदान पुलिस स्टेशन के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक को व्हाट्सएप रिकॉर्ड्स पर ध्यान केंद्रित करते हुए आगे की जांच करने का निर्देश दिया गया है।
- डेडलाइन: इस जांच की रिपोर्ट 15 जून, 2026 तक कोर्ट में पेश करनी होगी।
- जमानत पर फैसला: वकील की जमानत अर्जी पर भी अब 15 जून को ही विचार किया जाएगा।
न्यायपालिका की साख का सवाल
यह मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि अगर अदालतों के आदेश ही फर्जी बनाए जाने लगेंगे, तो पूरी न्यायिक प्रणाली पर जनता का विश्वास खत्म हो जाएगा। बॉम्बे हाई कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया है कि पुलिस केवल चार्जशीट फाइल करने की औपचारिकता न निभाए, बल्कि उस गिरोह या व्यक्ति तक पहुँचे जिसने कोर्ट के नाम का दुरुपयोग किया है।

