Interfaith marriage: गुजरात हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और नाटकीय घटनाक्रम के बाद 21 वर्षीय महिला की कस्टडी उसके पति को सौंपने का आदेश दिया।
विश्व हिंदू परिषद (VHP) और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं का हंगामा
जस्टिस एन. एस. संजय गौड़ा और जस्टिस डी. एम. व्यास की विशेष खंडपीठ ने न केवल विवाह संपन्न कराया, बल्कि पुलिस को यह सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया कि इस जोड़े के वैवाहिक जीवन में कोई खलल न पड़े। यह आदेश दक्षिणपंथी समूहों द्वारा विवाह पंजीकरण की प्रक्रिया में बाधा डालने और कोर्ट के कड़े हस्तक्षेप के बाद आया है। यह मामला तब सुर्खियों में आया जब गुरुवार को अहमदाबाद के घीकांटा उप-पंजीयक कार्यालय में विश्व हिंदू परिषद (VHP) और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने इस जोड़े की शादी के रजिस्ट्रेशन को रुकवा दिया था।
कोर्ट का हस्तक्षेप और ‘हैबियस कॉर्पस’
- पृष्ठभूमि: पति ने मार्च 2026 में अपनी पत्नी की ‘अवैध हिरासत’ के खिलाफ ‘हैबियस कॉर्पस’ (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका दायर की थी। महिला को प्रशासन ने एक सरकारी महिला गृह (State Home for Women) में रखा था।
- अदालती कार्रवाई: शुक्रवार को जब कोर्ट को बताया गया कि बाहरी विरोध के कारण शादी नहीं हो पाई, तो बेंच ने कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने दोपहर तक का समय सुनिश्चित किया ताकि विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act) के तहत शादी की औपचारिकताएं पूरी हो सकें।
पुलिस प्रशासन को कड़ी फटकार
सुनवाई के दौरान बेंच ने मौखिक रूप से पूछा, “दो वयस्कों को शादी करने के लिए पुलिस सुरक्षा की आवश्यकता क्यों पड़नी चाहिए? यह राज्य की जिम्मेदारी है कि वह उनके अधिकारों की रक्षा करे।” पब्लिक प्रोसिक्यूटर द्वारा आश्वासन दिए जाने के बाद कि डीसीपी (DCP) रैंक के अधिकारी सुरक्षा की निगरानी करेंगे, यह जोड़ा रजिस्ट्रार कार्यालय पहुँचा और शादी संपन्न हुई।
भविष्य की सुरक्षा के निर्देश
- शादी की पुष्टि होने के बाद, हाई कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए।
- कस्टडी का हस्तांतरण: महिला को तुरंत सरकारी गृह से रिहा कर उसके पति की कस्टडी में सौंपा जाए।
- पुलिस की जिम्मेदारी: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य की जिम्मेदारी शादी के साथ खत्म नहीं होती। संबंधित पुलिस थानों को निर्देश दिया गया कि वे सुनिश्चित करें कि “किसी भी व्यक्ति द्वारा उनके वैवाहिक जीवन को कोई नुकसान न पहुँचाया जाए।”
- सुरक्षा निधि (Fixed Deposit): इससे पहले की सुनवाई में, कोर्ट ने महिला की भविष्य की सुरक्षा के लिए एक निश्चित राशि की एफडी (Fixed Deposit) कराने का भी आदेश दिया था।
मामले का सारांश (Quick Highlights)
| विवरण | तथ्य |
| याचिका का प्रकार | हैबियस कॉर्पस (Habeas Corpus)। |
| विवाह कानून | विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act)। |
| विरोध का कारण | दक्षिणपंथी संगठनों (VHP/Bajrang Dal) द्वारा हस्तक्षेप। |
| कोर्ट का आदेश | महिला को पति के साथ रहने का अधिकार; पुलिस सुरक्षा के निर्देश। |
| न्यायाधीश | जस्टिस एन. एस. संजय गौड़ा और जस्टिस डी. एम. व्यास। |
व्यक्तिगत स्वतंत्रता की जीत
गुजरात हाई कोर्ट का यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और दो वयस्कों की पसंद के अधिकार पर मुहर लगाता है। कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सामाजिक या राजनीतिक दबाव किसी भी नागरिक के संवैधानिक अधिकारों (विशेषकर अपनी पसंद से विवाह करने के अधिकार) को दबा नहीं सकता।

