Saturday, August 15, 2026
HomeHigh CourtFamily Court: तलाक की अपील लंबित होने के दौरान दूसरी शादी अपने...

Family Court: तलाक की अपील लंबित होने के दौरान दूसरी शादी अपने आप में अमान्य नहीं…यह व्यवस्था क्यों दी, पढ़िए

Family Court: केरल हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह कानून के तहत तलाक और पुनर्विवाह के विधिक नियमों पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है।

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 15 का जिक्र

हाईकोर्ट के जस्टिस ए.के. जयशंकरण नांबियार और जस्टिस प्रीता ए.के. की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 15 केवल कुछ विशेष परिस्थितियों में पुनर्विवाह पर एक निश्चित वैधानिक अवधि के लिए रोक लगाती है, लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि तलाकशुदा पहला विवाह कानूनी रूप से अस्तित्व में बना हुआ है।

Family Court के फैसले को लेकर यह रही अदालत की टिप्पणी

अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि सक्षम अदालत (Family Court) से तलाक की डिक्री (Decree of Divorce) मिलने के बाद कोई पक्ष दूसरी शादी कर लेता है, तो केवल इसलिए वह शादी अमान्य (Void) या द्विविवाह (Bigamous) की श्रेणी में नहीं आ जाएगी क्योंकि उस डिक्री के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील लंबित है।

विधिक पृष्ठभूमि: पारिवारिक अदालत से हाई कोर्ट तक का मामला

पारिवारिक अदालत का फैसला: यह कानूनी विवाद एक वैवाहिक अपील के दौरान उत्पन्न परिस्थितियों पर आधारित है। एक पत्नी ने क्रूरता और परित्याग (Cruelty and Desertion) के आधार पर फैमिली कोर्ट में तलाक और स्थायी गुजारा भत्ते (Permanent Alimony) की याचिका दायर की थी। कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए शादी को भंग कर दिया और पत्नी के पक्ष में ₹20 लाख का गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया।

देरी से अपील और पुनर्विवाह: पति ने इस फैसले के खिलाफ केरल हाई कोर्ट में वैवाहिक अपील दायर की, लेकिन यह अपील तय समय सीमा बीत जाने के बाद (देरी से) दाखिल की गई थी। हालांकि कोर्ट ने बाद में इस देरी को माफ (Condoned) कर दिया, लेकिन हाई कोर्ट द्वारा तलाक की डिक्री पर कोई अंतरिम रोक (Interim Stay) नहीं लगाई गई थी। इसी दौरान, पत्नी ने दूसरी शादी कर ली।

पति की विधिक चुनौती: पति के वकील ने तर्क दिया कि चूंकि तलाक के खिलाफ अपील लंबित थी, इसलिए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5(i) और 17 के तहत पत्नी की दूसरी शादी पूरी तरह अवैध और शून्य (Void ab initio) है।

Also Read; WhatsApp Pix: प्रश्नपत्र की फोटो खींचकर WhatsApp Pix के तौर पर भेजना प्राइवेसी का उल्लंघन नहीं, आईटी एक्ट की धारा 66E को यहां समझिए

हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: धारा 15 की सीमाएं और सर्वोच्च न्यायालय के नजीर

केरल हाई कोर्ट ने पति की दलीलों को विधिक रूप से खारिज करते हुए धारा 15 के वास्तविक विधायी उद्देश्य को समझाया।

अक्षमता का मतलब पहले विवाह का जीवित होना नहीं

डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में स्पष्ट किया, हम अपीलकर्ता के इस तर्क को स्वीकार नहीं कर सकते कि यदि तलाक की डिक्री के बाद कोई पक्ष तय समय में अपील लंबित रहने के दौरान दोबारा शादी करता है, तो वह विवाह अमान्य हो जाएगा। धारा 15 केवल यह स्पष्ट करती है कि डिक्री के बाद कुछ परिस्थितियों में पुनर्विवाह करना गैर-कानूनी होगा, लेकिन इस अस्थायी विधिक अक्षमता (Incapacity) का यह प्रभाव नहीं होता कि समाप्त हो चुका पहला विवाह दोबारा जीवित हो जाए या उसे अस्तित्व में माना जाए।

समय सीमा के बाद दाखिल अपील पर रोक लागू नहीं होती

अदालत ने एक और महत्वपूर्ण विधिक बिंदु को रेखांकित करते हुए कहा कि धारा 15 के तहत पुनर्विवाह पर वैधानिक रोक (Statutory Embargo) केवल तभी प्रभावी होती है जब अपील कानून द्वारा निर्धारित मूल समय सीमा (Limitation Period) के भीतर दायर की गई हो। इस मामले में, पति ने तय समय के बाद अपील की थी, जिसका विधिक लाभ पत्नी के पुनर्विवाह के अधिकार को रोकने के लिए नहीं लिया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला

हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दो ऐतिहासिक निर्णयों लीला गुप्ता बनाम लक्ष्मी नारायण और कृष्णावेणी राय बनाम पंकज का संदर्भ दिया। इन मामलों में शीर्ष अदालत ने यह स्थापित किया था कि धारा 15 केवल कुछ खास स्थितियों में पुनर्विवाह के अधिकार को कुछ समय के लिए टालती है, न कि शून्य घोषित करती है।

स्थायी गुजारा भत्ते (Alimony) पर नया मोड़

यद्यपि हाई कोर्ट ने तलाक की डिक्री को चुनौती देने वाली पति की मुख्य याचिका को ‘निष्प्रभावी’ (Infructuous) मानकर खारिज कर दिया, लेकिन पत्नी के पुनर्विवाह के कारण गुजारा भत्ते के मुद्दे पर रुख बदल गया।

धारा 25(3) का प्रभाव: हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25(3) के तहत, यदि स्थायी गुजारा भत्ता प्राप्त करने वाला पक्ष दोबारा शादी कर लेता है, तो कोर्ट परिस्थितियों में बदलाव के आधार पर उस आदेश को संशोधित या रद्द कर सकता है।

नया मूल्यांकन: चूंकि फैमिली कोर्ट ने पति की अनुपस्थिति (साक्ष्य न होने) में ₹20 लाख का एकमुश्त गुजारा भत्ता तय किया था, इसलिए हाई कोर्ट ने इस वित्तीय आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने मामले को वापस फैमिली कोर्ट (Remitted) भेजते हुए निर्देश दिया कि दोनों पक्षों को नए साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति दी जाए और पत्नी की दूसरी शादी को ध्यान में रखते हुए 2 महीने के भीतर गुजारा भत्ते पर नए सिरे से निर्णय लिया जाए।

Family Court : केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक श्रेणियां / बिंदुकेरल उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (2026)
संबंधित अदालतकेरल उच्च न्यायालय, कोच्चि (डिवीजन बेंच)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस ए.के. जयशंकरण नांबियार और जस्टिस प्रीता ए.के.
मुख्य अधिनियमहिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (धारा 5, 13, 15, 17 और 25)
निर्णय का मुख्य आधारतलाक की डिक्री के खिलाफ समय सीमा बीतने के बाद दायर अपील के लंबित रहने मात्र से, बिना अंतरिम रोक के किया गया दूसरा विवाह अवैध नहीं होता।
तलाक पर अंतिम विधिक स्थितिपत्नी के पुनर्विवाह के कारण तलाक के खिलाफ पति की अपील निष्प्रभावी होकर खारिज
गुजारा भत्ते पर विधिक स्थिति₹20 लाख का पुराना आदेश रद्द; पुनर्विवाह के आलोक में नए सिरे से सुनवाई के लिए मामला निचली अदालत में वापस भेजा गया (समय सीमा: 2 माह)।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
overcast clouds
29 ° C
29 °
29 °
89 %
3.6kmh
100 %
Sat
35 °
Sun
36 °
Mon
29 °
Tue
32 °
Wed
32 °