Police Action: शादी टूटने और दहेज के विवाद में कानूनी केस दर्ज करने के बजाय पीड़ित पिता पर ‘प्राइवेट सेटलमेंट’ (निजी समझौता) करने का दबाव बनाने वाले एक ऑल-विमेन पुलिस स्टेशन को मद्रास हाईकोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई है।
महिला पुलिस अधिकारी पर ₹1 लाख की राशि का जुर्माना
हाईकोर्ट की जस्टिस एल. विक्टोरिया गौरी की एकल पीठ ने मामले को बेहद गंभीरता से लेते हुए संबंधित महिला पुलिस अधिकारियों को ₹1 लाख की राशि कोर्ट में जमा कराने और 14 जुलाई को व्यक्तिगत रूप से पेश होकर स्पष्टीकरण देने का सख्त निर्देश दिया है। अदालत ने कहा, पुलिस थानों को कानून द्वारा यह अधिकार नहीं दिया गया है कि वे दहेज उत्पीड़न जैसे गंभीर और संज्ञेय अपराधों (Cognisable Offences) को आपसी पैसों के लेन-देन और निजी समझौतों में बदल दें। यह बेहद चिंताजनक और विरोधाभासी है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए ‘ऑल-विमेन पुलिस स्टेशन’ (महिला पुलिस थाने) आजकल कानूनी कार्यवाही करने के बजाय एक अनौपचारिक पंचायत या मध्यस्थता का केंद्र बनते जा रहे हैं। पुलिस अधिकारी कोई आर्बिट्रेटर या प्राइवेट मीडिएटर नहीं हैं।
मामला क्या है?: दहेज न मिलने पर दूल्हे ने तोड़ी शादी, पुलिस ने कराया ‘आधा रिफंड’
यह कानूनी विवाद एक लाचार पिता की याचिका पर सामने आया, जिसका पक्ष अदालत में अधिवक्ता वनिश और एस. किशोर कुमार ने रखा।
शादी का टूटना: पीड़ित पिता ने अपनी जीवनभर की कमाई और खून-पसीने की बचत से अपनी बेटी की शादी 8 जून, 2026 को तय की थी। लेकिन शादी की तारीख से ठीक पहले दूल्हे के परिवार ने अतिरिक्त दहेज की मांग कर दी। जब पिता ने असमर्थता जताई, तो लड़के वालों ने एकतरफा फैसला लेते हुए शादी तोड़ दी।
पुलिस की भूमिका: पीड़ित पिता जब कानूनी कार्रवाई के लिए महिला पुलिस थाने पहुंचे, तो पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ सख्त एफआईआर दर्ज करने के बजाय मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की।
अवैध समझौता: पुलिस ने कथित तौर पर लड़के वालों की तरफदारी करते हुए पिता को केवल ₹5,00,000 वापस लेने और बाकी की रकम के लिए एक महीने का इंतजार करने के लिए राजी किया। इसके बाद बिना किसी कानूनी ठोस कार्रवाई के केस की फाइल को बंद कर दिया गया।
सरकारी वकील डी. राजाभूपति ने इन आरोपों का विरोध करते हुए दलील दी कि शिकायत की पूरी जांच की गई थी और दोनों पक्षों ने थाने के बाहर ‘अपनी मर्जी’ से यह समझौता किया था।
हाई कोर्ट का कड़ा रुख: ‘कागज़ों पर काउंसिलिंग, ज़मीन पर वसूली’
जस्टिस एल. विक्टोरिया गौरी ने 9 जुलाई को दिए अपने आदेश में महिला थानों के मूल उद्देश्य से भटकने पर गहरी निराशा और आक्रोश व्यक्त किया। कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां इस प्रकार थीं।
वैधानिक ढांचे से बाहर काम कर रही है पुलिस
अदालत ने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए स्थापित संस्थान को कानून के वैधानिक ढांचे (Statutory Framework) से बाहर जाकर काम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। जब शिकायत में एक गंभीर संज्ञेय अपराध का खुलासा हो रहा हो, तो पुलिस का पहला और एकमात्र कर्तव्य आपराधिक कानून का ईमानदारी से पालन करना और एफआईआर दर्ज करना है, न कि पैसों की डीलिंग कराना।
सरकारी योजनाएं और काउंसिलिंग इकाइयां पड़ी हैं ठप
कोर्ट ने इस बात को भी रेखांकित किया कि सरकार द्वारा महिला थानों में काउंसिलिंग यूनिट्स, मोबाइल काउंसिलिंग सेवाएं, जागरूकता अभियान और ग्रामीण आउटरीच जैसे बेहतरीन कार्यक्रम कागजों में तो तय किए गए हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से ये सभी तंत्र पूरी तरह निष्क्रिय (Dormant) हो चुके हैं। सामाजिक संवेदनशीलता बढ़ाने का जो बड़ा मिशन था, उसे पूरी तरह भुला दिया गया है। “ऐसा ढुलमुल रवैया न केवल कानूनी मंजूरी के खिलाफ है, बल्कि यह समाज में दहेज उत्पीड़न जैसे गंभीर अपराधों की गंभीरता को बेहद छोटा और तुच्छ (Trivialise) बना देता है।”
केस शीट: मद्रास उच्च न्यायालय समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्देश |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (मदुरै पीठ) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस एल. विक्टोरिया गौरी (एकल पीठ) |
| प्रासंगिक घटना | जून 2026 में दहेज की अतिरिक्त मांग के कारण शादी का एकतरफा टूटना |
| पुलिस की लापरवाही | कानूनी केस दर्ज न कर ₹5 लाख के आंशिक रिफंड पर प्राइवेट सेटलमेंट कराना। |
| अदालत का अंतरिम कड़ा आदेश | संबंधित पुलिस अधिकारियों को ₹1-1 लाख कोर्ट में डिपॉजिट करने और 14 जुलाई को हाजिर होने का समन। |

