याचिकाकर्ताओं के तर्क और मुख्य चिंताएं
- ब्रांडेड दवाओं को बढ़ावा देने का प्रभाव:दवा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को उपहार, नकद राशि, प्रायोजित यात्राएं और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों के टिकट दिए जाते हैं। इससे डॉक्टरों के दवा लिखने (Prescription) के निर्णय प्रभावित होते हैं, जिससे मरीजों पर अनावश्यक महंगी दवाओं और स्वास्थ्य देखभाल का वित्तीय बोझ बढ़ता है।
- कानूनी जवाबदेही का अभाव:याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने तर्क दिया कि मौजूदा नियमों के तहत उपहार स्वीकार करने वाले डॉक्टरों पर तो अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान है, लेकिन ऐसे प्रलोभन देने वाली फार्मा कंपनियों पर कार्रवाई करने के लिए कोई मजबूत वैधानिक ढांचा (Statutory Framework) मौजूद नहीं है।
- Apex Laboratories (2022) फैसले का हवाला:याचिकाकर्ताओं ने 2022 के एपेक्स लेबोरेटरीज बनाम आयकर उपायुक्त फैसले का हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि फार्मा कंपनियां डॉक्टरों को दिए गए फ्रीबीज (जैसे सोने के सिक्के, इलेक्ट्रॉनिक्स, विदेश यात्राएं) पर आयकर छूट (Tax Deductions) का दावा नहीं कर सकतीं।
UCPMP, 2024 और केंद्र सरकार का रुख
- UCPMP 2024 कोड:रसायन और उर्वरक मंत्रालय के फार्मास्यूटिकल्स विभाग द्वारा जारी यूनिफॉर्म कोड फॉर फार्मास्युटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिसेस (UCPMP, 2024) कंपनियों को डॉक्टरों और उनके परिवारों को व्यक्तिगत उपहार, वित्तीय लाभ या यात्रा सुविधाएं देने से रोकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पहले सवाल उठाया था कि क्या यह कोड लागू करने में पर्याप्त है या इसे कानूनी रूप से लागू करने योग्य (Statutory Backing) बनाया जाना चाहिए।
- 3-सदस्यीय समिति का प्रस्ताव:सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि केंद्र सरकार एक 3-सदस्यीय समिति बनाने का प्रस्ताव करती है, जो यह देखेगी कि क्या कानूनी ढांचा आवश्यक है और यदि आवश्यक है, तो उसका स्वरूप क्या होना चाहिए।
नई दिल्ली: फार्मास्युटिकल कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को अपनी दवाएं लिखने (Prescribe करने) के बदले दिए जाने वाले महंगे उपहारों, विदेश यात्राओं, होटल आतिथ्य और नकद प्रलोभनों (Freebies to Doctors) पर रोक लगाने, चिकित्सा पेशे की शुचिता, तथा मरीजों पर पड़ने वाले महंगे इलाज के वित्तीय बोझ पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा कदम उठाया है।
‘फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ व अन्य द्वारा दायर जनहित याचिका
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने ‘फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ (FMSRAI) व अन्य द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश जारी किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि समिति सभी पक्षों से प्राप्त सुझावों और ज्ञापनों पर विचार करेगी तथा केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट देगी। केंद्र सरकार के अनुपालन हलफनामे पर विचार के लिए मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी 2027 निर्धारित की गई है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को एक उच्चस्तरीय समिति (High-Level Committee) गठित करने का आदेश दिया है, जो फार्मा कंपनियों के विपणन तौर-तरीकों को नियंत्रित करने और इसके लिए कानूनी रूप से लागू करने योग्य वैधानिक तंत्र (Statutory Framework) की आवश्यकता पर विचार कर अपनी सिफारिशें सौंपेगी।
सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रमुख विधिक मुद्दे एवं बहस
1. ‘डॉक्टरों पर तो नियम हैं, पर फार्मा कंपनियों को दंडित करने का कोई वैधानिक कानून नहीं’
- याचिकाकर्ताओं की प्रमुख दलील:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने तर्क दिया कि नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के नियमों के तहत रिश्वत या उपहार स्वीकार करने वाले डॉक्टरों पर लाइसेंस निलंबन जैसी अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान तो मौजूद है, परंतु उपहार और प्रलोभन देने वाली फार्मा कंपनियों पर शिकंजा कसने के लिए कोई वैधानिक दंड प्रक्रिया उपलब्ध नहीं है।
- उन्होंने शीर्ष अदालत को याद दिलाया कि 2022 में भी केंद्र सरकार ने सूचित किया था कि एक उच्चस्तरीय समिति कानूनी रूप से प्रवर्तनीय तंत्र की जांच कर रही है, परंतु अब तक कोई बाध्यकारी कानून अस्तित्व में नहीं आ सका।
2. यूसीपीएमपी (UCPMP) 2024 और सांविधिक मान्यता (Statutory Backing) का सवाल:
- फार्मास्यूटिकल्स विभाग द्वारा जारी ‘यूनिफॉर्म कोड फॉर फार्मास्युटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिसेज’ (UCPMP), 2024 फार्मा कंपनियों को डॉक्टरों या उनके परिजनों को उपहार, नकद लाभ, व्यक्तिगत आतिथ्य और सम्मेलनों के नाम पर यात्रा खर्च देने से रोकता है।
- हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने सवाल उठाया कि क्या यूसीपीएमपी 2024 के पास पर्याप्त प्रवर्तन तंत्र (Enforcement Mechanism) है? शीर्ष अदालत ने माना कि बिना किसी विधायी अधिनियम या दंडात्मक प्रावधान के यह कोड केवल स्वैच्छिक या सलाहकारी बनकर रह जाता है।
3. केंद्र सरकार का प्रस्ताव:
- केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को अवगत कराया कि सरकार एक तीन सदस्यीय समिति (Three-Member Committee) गठित करने का प्रस्ताव करती है।
- यह समिति इस बात का गहन अध्ययन करेगी कि क्या इस विषय पर एक स्वतंत्र वैधानिक ढांचा आवश्यक है और यदि हां, तो उसका प्रारूप क्या होना चाहिए।
जनहित एवं चिकित्सा नैतिकता: प्रलोभनों का मरीज पर प्रभाव
- प्रिस्क्रिप्शन का व्यवसायीकरण:
- याचिका में रेखांकित किया गया कि जब दवा कंपनियां डॉक्टरों को सोने के सिक्के, गैजेट्स, महंगी विदेश यात्राएं और पंचसितारा आतिथ्य प्रदान करती हैं, तो इसका सीधा असर डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन पर पड़ता है।
- सस्ती और जेनेरिक दवाओं के स्थान पर अत्यधिक महंगी ब्रांडेड दवाएं लिखी जाती हैं, जिससे आम जनता और गरीब मरीजों के इलाज का खर्च बेतहाशा बढ़ जाता है।
- अपेक्स लैबोरेटरीज (Apex Laboratories) ऐतिहासिक नजीर का हवाला:
- याचिकाकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय के 2022 के ऐतिहासिक फैसले (अपेक्स लैबोरेटरीज बनाम आयकर उपायुक्त) का हवाला दिया।
- उस मामले में शीर्ष अदालत ने व्यवस्था दी थी कि फार्मा कंपनियां डॉक्टरों को दिए गए उपहारों और मुफ्त सुविधाओं (Freebies) पर आयकर अधिनियम के तहत टैक्स छूट (Tax Deduction) का दावा नहीं कर सकतीं।
- कोर्ट ने दर्ज किया था कि मुफ्त उपहारों का उद्देश्य डॉक्टरों के विवेक को प्रभावित करना होता है, जो सार्वजनिक नीति और कानून के विरुद्ध है।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी निर्देश
- समिति का गठन: केंद्र सरकार तुरंत एक समिति का गठन करे जो फार्मा कंपनियों के आचरण और प्रचार गतिविधियों पर वैधानिक नियंत्रण लगाने के लिए नियमों और उपायों की सिफारिश करेगी।
- हितधारकों की भागीदारी: यह समिति मेडिकल एसोसिएशनों, नागरिक समाज और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों से सुझाव और प्रतिवेदन आमंत्रित कर उनका परीक्षण करेगी।
- सिफारिशें सौंपना: समिति अपनी विस्तृत रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपेगी ताकि सरकार आवश्यक विधायी अथवा प्रशासनिक कदम उठा सके।
- अनुपालन हलफनामा और समय-सीमा: केंद्र सरकार को अगली सुनवाई से पहले अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश देते हुए अदालत ने मामले को 29 जनवरी 2027 के लिए सूचीबद्ध किया।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- संविधान का अनुच्छेद 21 (स्वास्थ्य का अधिकार):
- सर्वोच्च न्यायालय ने निरंतर माना है कि किफायती, निष्पक्ष और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सेवा पाना अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का आंतरिक हिस्सा है। दवाओं के अनैतिक विपणन से स्वास्थ्य अधिकार का सीधा हनन होता है।
- राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग विनियम (NMC Regulations):
- भारतीय चिकित्सा परिषद (व्यावसायिक आचरण, शिष्टाचार और नैतिकता) विनियम डॉक्टरों को किसी भी फार्मा कंपनी या संबद्ध स्वास्थ्य उद्योग से कोई भी उपहार, नकद राशि, व्यक्तिगत आतिथ्य या यात्रा सुविधा स्वीकार करने से प्रतिबंधित करते हैं।
- ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 एवं औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश (DPCO):
- यद्यपि दवाओं की गुणवत्ता और आवश्यक दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण के लिए कानून हैं, परंतु मार्केटिंग और प्रमोशन के नैतिक मानकों के लिए वर्तमान में कोई कड़ा दंडात्मक कानून नहीं है, जिसे यह समिति दूर करने का प्रयास करेगी।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FMSRAI) व अन्य बनाम भारत संघ [रिट याचिका (सिविल) – सर्वोच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: 8 अक्टूबर 2026
- अगली सुनवाई की तिथि: 29 जनवरी 2027
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख
- केंद्र सरकार (भारत संघ) की ओर से: सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता
- प्रासंगिक कानून एवं नीतियां:
- यूनिफॉर्म कोड फॉर फार्मास्युटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिसेज (UCPMP), 2024
- राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019 (NMC Act) एवं नैतिक आचरण संहिता
- आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 37(1) (व्यावसायिक व्यय पर कटौती के नियम)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 एवं अनुच्छेद 32
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- अपेक्स लैबोरेटरीज प्राइवेट लिमिटेड बनाम आयकर उपायुक्त (2022, सुप्रीम कोर्ट) — ‘डॉक्टरों को दिए जाने वाले मुफ्त उपहार और प्रलोभन कानून द्वारा निषिद्ध हैं; ऐसी अनैतिक प्रथाओं पर कंपनियां व्यावसायिक खर्च की छूट नहीं ले सकतीं।’
- वर्तमान स्थिति: केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित समिति के गठन का सुप्रीम कोर्ट ने दिया आदेश; फार्मा कंपनियों के लिए दंडात्मक कानूनी ढांचे की रूपरेखा पर केंद्र को 29 जनवरी 2027 तक दाखिल करना होगा अनुपालन हलफनामा।
Freebies to Doctors:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (न्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं न्यायमूर्ति संदीप मेहता) |
| याचिकाकर्ता | फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FMSRAI) व अन्य |
| मुख्य मुद्दा | फार्मा कंपनियों द्वारा डॉक्टरों को मुफ़्त उपहार, विदेश यात्राएं व अन्य प्रलोभन देने पर रोक के लिए कानूनी ढांचा बनाना |
| केंद्र का पक्ष | सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 3-सदस्यीय समिति गठित करने का प्रस्ताव दिया |
| अगली सुनवाई | 29 जनवरी 2027 |

