न्यायमूर्ति विक्रम नाथ के भाषण की मुख्य व महत्वपूर्ण बातें
- “समझौता और सहनशीलता” की सीमा:परिवार और विवाह को बचाए रखने के नाम पर महिलाओं पर बनाए जाने वाले सामाजिक दबाव पर बोलते हुए उन्होंने कहा:“एक बेटी को यह सोचते हुए बड़ा नहीं होना चाहिए कि परिवार को बचाए रखने की कीमत चुप्पी है, और न ही एक बेटे को यह सोचते हुए बड़ा होना चाहिए कि परिवार की प्रतिष्ठा महिला की सब कुछ सहने की इच्छा पर निर्भर करती है। एक बिंदु ऐसा आता है जहां सामंजस्य (Adjustment) रिश्ते को बनाए रखने का हिस्सा न रहकर एक अनुचित अपेक्षा बन जाता है।”
- हिंसा केवल शारीरिक नहीं होती:उन्होंने घरेलू हिंसा अधिनियम (Domestic Violence Act, 2005) की सराहना करते हुए कहा कि यह कानून न केवल शारीरिक हिंसा, बल्कि यौन, मौखिक, भावनात्मक और आर्थिक शोषण को भी मान्यता देता है।
- आंकड़े बनाम जमीनी हकीकत:नवीनतम राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6, 2023-24) के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा किreported स्पॉउसल वायलेंस में 29.2% से घटकर 22.3% की कमी आई है। लेकिन 22.3% का आंकड़ा भी यह दर्शाता है कि घरेलू हिंसा अब भी भारतीय महिलाओं के जीवन की एक बड़ी वास्तविकता है।“सफलता का मापदंड केवल दर्ज शिकायतों की संख्या नहीं हो सकता, बल्कि यह है कि क्या महिलाएं वास्तव में सुरक्षित महसूस कर रही हैं और क्या उन्हें दिए गए संरक्षण आदेश वास्तव में उन तक पहुंच रहे हैं।”
- संरक्षण अधिकारियों (Protection Officers) की भूमिका:उन्होंने PWDVA (घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम) के तहत नियुक्त संरक्षण अधिकारियों के प्रयासों की सराहना की और कहा कि संकटग्रस्त महिलाओं को न्याय दिलाने में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
नई दिल्ली: घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण अधिनियम, 2005 (DV Act) के प्रभावी क्रियान्वयन, परिवारों में महिलाओं पर “समझौता (Adjustment) करने” के सामाजिक दबाव, विवाह को बाहरी तौर पर बनाए रखने के नाम पर सहने की मजबूरी, और हिंसा की शिकार महिलाओं तक वास्तविक न्याय पहुंचाने की विधिक चुनौतियों पर सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश और नालसा (NALSA) के कार्यकारी अध्यक्ष न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने एक संवेदनशील और विचारोत्तेजक संबोधन दिया है।
राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) द्वारा आयोजित संरक्षण अधिकारियों (Protection Officers) के राष्ट्रीय सम्मेलन के विदाई सत्र को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति विक्रम नाथ—जो वरिष्ठता क्रम के अनुसार अगले वर्ष 2027 में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बनने की कतार में हैं—ने दो-टूक कहा कि महिलाओं को यह भरोसा होना चाहिए कि उनकी बात सुनी जाएगी, कानून सक्रिय प्रतिक्रिया देगा और उन्हें सम्मान, सुरक्षा तथा अपने जीवन के निर्णय लेने की पूरी स्वतंत्रता के साथ जीने का समर्थन मिलेगा।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ के प्रमुख विधिक एवं सामाजिक विचार
1. ‘चुप्पी और सहनशीलता को परिवार बचाने का पैमाना न बनाएं’ न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने घरेलू संबंधों में महिलाओं से की जाने वाली गैर-जरूरी त्याग की अपेक्षाओं पर प्रहार करते हुए कहा:
“किसी बेटी को यह मानकर बड़ा नहीं होना चाहिए कि परिवार को बचाए रखने की कीमत उसकी चुप्पी (Silence is the price of preserving a family) है; और न ही किसी बेटे को यह सोचकर बड़ा होना चाहिए कि परिवार की प्रतिष्ठा इस बात पर निर्भर करती है कि एक महिला कितना सहने को तैयार है।
एक सीमा ऐसी आती है जहां ‘समझौता’ (Adjustment) रिश्ते को बनाए रखने का हिस्सा न रहकर एक ऐसी अपेक्षा बन जाता है कि महिला वह सब कुछ सहे जो उसे कतई नहीं सहना चाहिए। उस रेखा को पहचानना और उसके पार जाने पर कानून की त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करना घरेलू हिंसा से निपटने का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।”
2. भय और पीड़ा की आवाज को सामान्य न माना जाए:
- जब कोई महिला पहली बार अपने डर, हिंसा या पीड़ा के बारे में बात करती है, तो उसकी आवाज को अनसुना या सामान्य नहीं माना जाना चाहिए।
- न्यायमूर्ति नाथ ने कहा:“देश की महिलाएं समान नागरिक हैं और हमारे संविधान के पूर्ण संरक्षण और वादे की हकदार हैं। हममें से प्रत्येक का यह दायित्व है कि यह संवैधानिक वादा उनके दैनिक जीवन में साकार हो।”
3. विवाह का दिखावा बनाम महिला की सुरक्षा:
- न्यायमूर्ति नाथ ने अदालती अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि जज हर दिन विभिन्न सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि की महिलाओं को घरेलू हिंसा से जूझते देखते हैं—चाहे वे उच्च शिक्षित और आर्थिक रूप से स्वतंत्र हों या बिना किसी सहारे की अशिक्षित महिलाएं।
- उन्होंने रेखांकित किया कि अकसर खुद महिला के अपने परिवार की तरफ से ही यह दबाव आता है कि “शादी बचानी है, बच्चों का भविष्य देखना है या खानदान की इज्जत दांव पर है, इसलिए चुपचाप सह लो।”
- उन्होंने सवाल उठाया कि शादी के बाहरी दिखावे को बचाना उसके भीतर हो रही हिंसा का सामना करने से अधिक महत्वपूर्ण कैसे हो सकता है? जब कोई महिला अपनी पीड़ा साझा करे, तो पहला कदम सुरक्षा और समर्थन का होना चाहिए, न कि उससे यह पूछना कि वह इसमें कैसे तालमेल बैठा सकती है।
4. आंकड़े केवल वो बताते हैं जो दर्ज हुआ, न कि वो जो अनकहा रह गया:
- राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6, 2023-24) का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि पति/साथी द्वारा हिंसा की रिपोर्टिंग NFHS-5 के 29.2% से घटकर 22.3% हुई है।
- उन्होंने आगाह किया कि 22.3% का आंकड़ा भी यह दर्शाता है कि घरेलू हिंसा आज भी एक बड़ी जमीनी सच्चाई है। वास्तविक चुनौती यह है कि महिलाएं हिंसा झेलने और औपचारिक न्याय प्रणाली (Formal Justice System) तक पहुंचने के बीच के भारी अंतर को कैसे पार करें।
- सफलता का पैमाना केवल दर्ज मुकदमों की संख्या नहीं, बल्कि यह है कि क्या महिलाएं वास्तव में सुरक्षित हैं और क्या अदालती संरक्षण आदेश उन तक पहुंच रहे हैं।
5. घरेलू हिंसा का व्यापक दायरा: केवल विवाह या शारीरिक चोट तक सीमित नहीं: न्यायमूर्ति नाथ ने डीवी एक्ट (DV Act, 2005) के विधायी महत्व को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया:
- यह कानून केवल पति-पत्नी के रिश्ते तक सीमित नहीं है, बल्कि एक ही साझा घर (Shared Household) में रहने वाले माता-पिता, बच्चों, भाई-बहनों और विवाह जैसी प्रकृति के संबंधों (Live-in Relationships) में होने वाली हिंसा को भी कवर करता है।
- कानून में हिंसा केवल ‘शारीरिक’ नहीं होती, बल्कि यौन उत्पीड़न, मौखिक और भावनात्मक शोषण (Verbal & Emotional Abuse), तथा आर्थिक शोषण (Economic Abuse) भी घरेलू हिंसा की वैधानिक परिभाषा में शामिल हैं।
राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की चिंता: आदेशों का अनुपालन और निष्पादन
सम्मेलन में मुख्य अतिथि का स्वागत करते हुए राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा विजया रहाटकर ने अदालती आदेशों के धरातल पर क्रियान्वयन की व्यावहारिक समस्या को उठाया:
- उन्होंने रेखांकित किया कि यद्यपि अदालतों से महिलाओं को राहत और भरण-पोषण/संरक्षण आदेश मिल जाते हैं, परंतु सबसे बड़ी समस्या अदालती आदेशों के निष्पादन (Execution of orders) में आती है।
- आदेश लागू न होने के कारण पीड़ित महिलाओं को निष्पादन अर्जी लेकर बार-बार अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।
- उन्होंने न्यायपालिका से आग्रह किया कि वह आदेशों के जमीनी क्रियान्वयन के लिए सख्त अनुपालन तंत्र सुनिश्चित करे ताकि संकटग्रस्त महिलाओं को वास्तविक राहत मिल सके।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (PWDVA, 2005):
- धारा 3 (घरेलू हिंसा की परिभाषा): शारीरिक, लैंगिक, मौखिक, भावनात्मक और आर्थिक दुर्व्यवहार को अपराध और नागरिक दायित्व की श्रेणी में रखती है।
- धारा 8 और 9 (संरक्षण अधिकारी / Protection Officers): संरक्षण अधिकारी अदालत और पीड़ित महिला के बीच की सबसे अहम प्रशासनिक कड़ी होते हैं, जिनका कार्य घरेलू घटना रिपोर्ट (DIR) तैयार करना, विधिक सहायता दिलाना और अदालती संरक्षण आदेशों की तामील कराना है।
- धारा 18, 19, 20, 22: संरक्षण आदेश, निवास आदेश, मौद्रिक अनुतोष और मुआवजे के त्वरित आदेश देने की मजिस्ट्रेट की शक्ति।
- संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21:
- महिलाओं के साथ भेदभाव के विरुद्ध संवैधानिक गारंटी और गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार परिवार की चारदीवारी के भीतर भी पूरी तरह लागू होता है। निजता या पारिवारिक व्यवस्था की आड़ में किसी नागरिक को हिंसा सहने के लिए विवश नहीं किया जा सकता।
विधिक विवरण
- कार्यक्रम: संरक्षण अधिकारियों का राष्ट्रीय सम्मेलन (National Conference of Protection Officers)
- आयोजक: राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW)
- प्रमुख वक्ता:
- न्यायमूर्ति विक्रम नाथ (वरिष्ठतम न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय एवं कार्यकारी अध्यक्ष, नालसा)
- विजया रहाटकर (अध्यक्ष, राष्ट्रीय महिला आयोग)
- दिनांक: 7 अक्टूबर 2026
- संबद्ध कानून व सांविधिक प्रावधान:
- घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (DV Act) — धाराएं 3, 8, 9, 12, 18, 19, 20
- विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 (NALSA Act) — महिलाओं को निःशुल्क विधिक सहायता (धारा 12)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 14, 15(3) एवं अनुच्छेद 21
- प्रमुख सांख्यिकीय संदर्भ: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6, 2023-24) — वैवाहिक हिंसा में गिरावट (29.2% से 22.3%), फिर भी गंभीर चुनौती बरकरार।
Justice Speech: प्रमुख बिंदु (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| वक्ता | न्यायमूर्ति विक्रम नाथ (वरिष्ठतम जज, सुप्रीम कोर्ट व कार्यकारी अध्यक्ष, NALSA) |
| अवसर | राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) द्वारा आयोजित संरक्षण अधिकारियों का राष्ट्रीय सम्मेलन |
| मुख्य विषय | घरेलू हिंसा अधिनियम (DV Act), महिलाओं की सुरक्षा, और सामाजिक मानसिकता में बदलाव |
| NFHS-6 आंकड़े | जीवनसाथी द्वारा हिंसा के मामलों में गिरावट: 29.2% (NFHS-5) से घटकर 22.3% (NFHS-6) हुई |
| NCW की मांग | NCW अध्यक्ष विजया राहटकर ने अदालती आदेशों के कार्यान्वयन (Execution of Orders) को सख्त बनाने की अपील की |

