Tuesday, June 16, 2026
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Hoodwink the Court: अदालत की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश… RTI अथॉरिटी के ₹25,000 जुर्माना को क्यों माना वैध

Hoodwink the Court: कर्नाटक हाई कोर्ट ने सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत आम जनता को समय पर जानकारी न देने और राज्य सूचना आयोग के आदेशों की लगातार अनदेखी करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों को बेहद कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है।

बेंगलुरु विकास प्राधिकरण सचिव की याचिका खारिज

हाई कोर्ट के जस्टिस सूरज गोविंदराज की एकल पीठ ने अपने आदेश में बीडीए सचिव शिवकुमार सी.एल. (Shivakumar CL) द्वारा कर्नाटक सूचना आयोग (KIC) के आदेशों को चुनौती देने वाली याचिका को पूरी तरह खारिज (Dismiss) कर दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने सचिव पर लगा ₹25,000 का जुर्माना और उनके खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई (Disciplinary Proceedings) शुरू करने की आयोग की सिफारिश को पूरी तरह वैध माना। अदालत ने बेंगलुरु विकास प्राधिकरण (BDA) के सचिव की याचिका को खारिज करते हुए उनके आचरण की गंभीर भर्त्सना की और इसे “अदालत की आंखों में धूल झोंकने” (Attempt to Hoodwink the Court) का एक असफल प्रयास करार दिया।

नौकरशाही के लापरवाह रवैये पर आक्रोश

अदालत ने नौकरशाही के लापरवाह रवैये पर कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए अपने आदेश में कहा, राज्य सूचना आयोग (KIC) के समक्ष जब-जब इस मामले की सुनवाई हुई, याचिकाकर्ता (सचिव) का आचरण न तो कानूनन और न ही तथ्यों के आधार पर स्वीकार करने योग्य था। वास्तव में, इस तरह के गैर-जिम्मेदाराना रवैये की कड़े शब्दों में निंदा की जानी चाहिए, जो यह अदालत करती है। अदालत के सामने बाद में झूठे तर्क देना विधिक प्रक्रिया का मजाक उड़ाना है।

क्या था पूरा मामला? (RTI आवेदन और 3 साल की प्रशासनिक सुस्ती)

अपील में देरी: यह पूरा विवाद सुरेश चंद्र बाबू नामक नागरिक द्वारा दायर एक आरटीआई आवेदन से जुड़ा है। सूचना समय पर न मिलने के कारण आवेदक ने 9 मार्च 2023 को आरटीआई अधिनियम के तहत ‘प्रथम अपीलीय प्राधिकारी’ (First Appellate Authority) के समक्ष पहली अपील दायर की थी। बीडीए में ‘सचिव’ ही प्रथम अपीलीय प्राधिकारी होता है। तत्कालीन सचिव ने मई 2023 में कुछ कागजी कार्रवाई तो शुरू की, लेकिन कोई अंतिम आदेश पारित नहीं किया।

नए सचिव की एंट्री और निष्क्रियता: इसके बाद, 8 मई 2025 को शिवकुमार सी.एल. ने बीडीए सचिव का पदभार संभाला। लेकिन उनके आने के बाद भी दिसंबर 2025 तक इस लंबित अपील पर कोई निर्णय नहीं लिया गया।

सूचना आयोग की अवहेलना: मामला जब कर्नाटक सूचना आयोग (KIC) के पास पहुंचा, तो आयोग ने जुलाई, अगस्त और नवंबर 2025 में लगातार तीन बार सुनवाई की। इन सुनवाइयों के दौरान न तो बीडीए सचिव की तरफ से कोई वकील पेश हुआ और न ही आवेदक को जानकारी दी गई।

कड़ी कार्रवाई: थक-हारकर आयोग ने 1 जनवरी 2026 को सचिव पर ₹25,000 का जुर्माना लगाया। इसके बाद भी जब फरवरी 2026 में सचिव न तो खुद पेश हुए और न ही कोई जवाब दिया, तो आयोग ने सरकार को उनके खिलाफ विभागीय जांच (Disciplinary Action) शुरू करने का निर्देश दे दिया।

कोर्ट रूम जिरह: तो क्या आप हाथ पर हाथ धरकर बैठे रहेंगे?

सुनवाई के दौरान सचिव के वकील (एडवोकेट एम.वी. चरती) ने यह दलील देने की कोशिश की कि देरी उनके मुवक्किल के पूर्ववर्तियों (Predecessors) के कार्यकाल में हुई थी और उन्होंने तो केवल मई 2025 में कार्यभार संभाला था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि सचिव केवल ‘प्रथम अपीलीय प्राधिकारी’ हैं, ‘जन सूचना अधिकारी’ (PIO) नहीं, इसलिए 2023 के पुराने मामले के लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। बचाव में उन्होंने 12 मार्च 2026 का एक पत्र दिखाया, जिसमें उन्होंने अपने डिप्टी सेक्रेटरी को जानकारी देने का निर्देश दिया था।

यह रही अदालत की तीखी टिप्पणी

जस्टिस सूरज गोविंदराज ने इन सभी दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया और सचिव के आचरण पर बेहद तीखी टिप्पणियां कीं। कहा, आंखों में धूल झोंकने की कोशिश: कोर्ट ने नोट किया कि सचिव ने मई 2025 से दिसंबर 2025 (लगभग 8 महीने) तक कोई आदेश पारित नहीं किया। कोर्ट ने कहा, याचिकाकर्ता जिस 12 मार्च 2026 के पत्र का सहारा ले रहे हैं, वह सूचना आयोग द्वारा 1 जनवरी 2026 को जुर्माना लगाने के बहुत बाद का है। इस पत्र पर भरोसा करना पूरी तरह से गलत है और मेरी सुविचारित राय में, यह इस अदालत की आंखों में धूल झोंकने (Hoodwink) का एक प्रयास है, जिसकी अनुमति कतई नहीं दी जा सकती।

सिस्टम सुधारने की सख्त हिदायत: जब वकील ने बहाना बनाया कि पुराने वादों की फाइलें अधिकारी के सामने तभी आती हैं जब स्टाफ उन्हें टेबल पर रखता है, तो जज ने फटकार लगाते हुए कहा, “तो क्या आप आवेदन पर कुंडली मारकर बैठे रहेंगे? कानूनन आपको 45 दिनों के भीतर अपील का निपटारा करना होता है। आपने मई 2025 से जनवरी 2026 तक क्या किया? हम आपके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई को वापस लेने की अनुमति बिल्कुल नहीं देंगे। अपने घर को व्यवस्थित कीजिए (Set your house in order)। अपने विभाग में ऐसा डिजिटल या प्रशासनिक सिस्टम बनाइए जिससे आपको लंबित अपीलों की तुरंत जानकारी मिले, क्योंकि प्रथम अपीलीय प्राधिकारी आप हैं, कोई स्टाफ नहीं।”

विश्लेषण: कर्नाटक हाई कोर्ट का अंतिम विधिक आदेश

अदालत ने स्पष्ट किया कि आरटीआई जैसे जनकल्याणकारी कानून को नौकरशाही के ढुलमुल रवैये के कारण निष्प्रभावी नहीं होने दिया जा सकता।

विधिक/प्रशासनिक बिंदुकर्नाटक हाई कोर्ट का विधिक निष्कर्ष और आदेश
याचिकाकर्ताशिवकुमार सी.एल. (सचिव, बेंगलुरु विकास प्राधिकरण)।
सूचना आयोग का आदेश₹25,000 का जुर्माना और विभागीय जांच की सिफारिश।
हाई कोर्ट का अंतिम निर्णययाचिका पूरी तरह खारिज; आयोग के आदेश में कोई विधिक त्रुटि या कमी नहीं है।
पूर्ववर्तियों पर कार्रवाई की छूटकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि सरकार और संबंधित विभाग याचिकाकर्ता के उन पूर्ववर्ती अधिकारियों (Predecessors) के खिलाफ भी स्वतंत्र रूप से कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है, जिन्होंने मार्च 2023 से मई 2025 के बीच इस आरटीआई अपील पर कोई काम नहीं किया था।
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