Judicial Dignity: सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा की अदालतों में दलित-आदिवासी समुदाय के आरोपियों पर ‘थाना साफ करने’ जैसी अपमानजनक जमानत शर्तें थोपे जाने के मामले में अपना अंतिम फैसला सुनाया है।
मामले का सारांश (Quick Highlights)
| विवरण | तथ्य/आदेश |
| मामला | दलित-आदिवासी आरोपियों से थाना साफ कराने की शर्त। |
| सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी | यह शर्त ‘अपमानजनक’ और ‘जातिगत पूर्वाग्रह’ से प्रेरित है। |
| वर्तमान स्थिति | ओडिशा हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की रिपोर्ट के बाद मामला निपटाया गया। |
| सीजेआई का स्पष्टीकरण | टिप्पणी किसी जज के खिलाफ नहीं, बल्कि गलत प्रथा के खिलाफ है। |
| भविष्य का नियम | भारत की कोई भी अदालत ऐसी ‘Caste-coloured’ शर्तें नहीं लगा सकती। |
आदिवासी आरोपियों को 2 महीने तक पुलिस थानों की सफाई करने का निर्देश
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस ‘सुओ मोटो’ (स्वत: संज्ञान) मामले को अब बंद कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसका पिछला कड़ा आदेश किसी न्यायाधीश की व्यक्तिगत छवि खराब करने के लिए नहीं, बल्कि संस्थागत सुधार के लिए था। यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब ओडिशा की निचली अदालतों और हाई कोर्ट द्वारा कुछ ऐसे आदेश दिए गए जिनमें दलित और आदिवासी आरोपियों को जमानत के बदले 2 महीने तक पुलिस थानों की सफाई करने का निर्देश दिया गया था।
“जातिगत पूर्वाग्रह” और “अपमानजनक” शर्तें
- सुप्रीम कोर्ट ने इन शर्तों को “नृशंस” (Obnoxious) और “शर्मनाक” करार दिया।
- मानवाधिकारों का हनन: कोर्ट ने इसे मानवीय गरिमा पर सीधा प्रहार माना और कहा कि यह “दोषी होने के पूर्व-अनुमान” (Presumption of guilt) पर आधारित है, जो कानून में पूरी तरह वर्जित है।
- औपनिवेशिक मानसिकता: जजों ने गहरा असंतोष व्यक्त करते हुए कहा कि राज्य की न्यायपालिका “औपनिवेशिक मानसिकता” की ओर पीछे मुड़ रही है।
- तथ्य: ‘आर्टिकल 14’ की रिपोर्ट के अनुसार, मई 2025 से जनवरी 2026 के बीच ऐसे 8 आदेश दिए गए थे, जिनमें से अधिकांश रायगड़ा जिले से थे और खनन विरोधी प्रदर्शनों से जुड़े थे।
जजों के सम्मान पर स्पष्टीकरण
- स्वत: संज्ञान लेते हुए सुनवाई में सीजेआई सूर्यकांत की बेंच ने एक महत्वपूर्ण संतुलन बनाया।
- मनोबल पर असर: सीजेआई ने कहा कि कोर्ट की पिछली टिप्पणियों को किसी विशिष्ट हाई कोर्ट जज या न्यायिक अधिकारी के खिलाफ व्यक्तिगत आक्षेप (Aspersion) के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए, क्योंकि इससे न्यायपालिका का मनोबल गिर सकता है।
- सुधारात्मक दृष्टिकोण: कोर्ट का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि ऐसी “जातिगत रंग” (Caste-coloured) वाली शर्तें दोबारा न लगाई जाएं।
पूरे देश के लिए ‘जीरो टॉलरेंस’
- सुप्रीम कोर्ट ने केवल ओडिशा ही नहीं, बल्कि देश के सभी राज्यों के लिए निर्देश जारी किए हैं।
- शर्तें रद्द: ओडिशा की अदालतों द्वारा दी गई ऐसी सभी शर्तों को ‘शून्य और प्रभावीहीन’ (Null and Void) घोषित कर दिया गया है।
- सभी हाई कोर्ट्स को निर्देश: इस आदेश की प्रति देश के सभी उच्च न्यायालयों को भेजी गई है ताकि वे अपने अधिकार क्षेत्र के हर जज को सूचित करें कि किसी भी परिस्थिति में ऐसी दमनकारी शर्तें न लगाई जाएं।
गरिमापूर्ण न्याय
यह फैसला एक मिसाल है कि न्यायपालिका को सामाजिक न्याय के अग्रदूत के रूप में काम करना चाहिए। किसी आरोपी की सामाजिक पृष्ठभूमि का उपयोग उसे हीन महसूस कराने के लिए करना न केवल असंवैधानिक है, बल्कि यह समाज में वैमनस्य को बढ़ाता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि ‘जमानत’ एक कानूनी प्रक्रिया है, किसी सामाजिक सज़ा का माध्यम नहीं।

