Wednesday, September 30, 2026
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Rising Of Court: कोर्ट का समय क्लर्क की टाइमिंग से नहीं, जज के उठने से तय होता है…अधिवक्तागण को यह मिली नसीहत, पढ़ें पूरा मामला

Rising Of Court: मद्रास हाई कोर्ट ने मदुरै की एक महिला मजिस्ट्रेट के साहस की सराहना की है। कहा, वकीलों का रुतबा जजों को डराने का लाइसेंस नहीं है।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

विवरणतथ्य
संबंधित कानूनBNSS की धारा 384 और BNS की धारा 267।
मुख्य बिंदु‘अदालत का उठना’ वास्तविक न्यायिक बैठक समाप्त होने तक माना जाता है।
कोर्ट का आदेशवकीलों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही रद्द करने से इनकार।
मजिस्ट्रेट की प्रशंसानिडरता, ईमानदारी और कर्तव्य के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के लिए।

वकीलों और बार पदाधिकारियों पर अपनी मर्जी का आदेश देने का दबाव

एक महत्वपूर्ण न्यायिक व्यवस्था देते हुए जस्टिस एल. विक्टोरिया गौरी ने वकीलों के खिलाफ कार्यवाही को रद्द करने से इनकार करते हुए कहा कि पेशेवर स्थिति किसी को भी न्याय प्रशासन में बाधा डालने की छूट नहीं देती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई मजिस्ट्रेट कोर्ट के उठने (Rising of Court) से पहले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 384 के तहत अवमाननापूर्ण आचरण का संज्ञान लेता है, तो वह पूरी तरह वैध है। यह मामला जनवरी 2026 में मदुरै के न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट नंबर V में हुई एक घटना से जुड़ा है। वहां कुछ वकीलों और बार पदाधिकारियों ने कथित तौर पर कोर्ट रूम में घुसकर कार्यवाही बाधित की, अभद्र भाषा का प्रयोग किया और जज पर अपनी मर्जी का आदेश देने का दबाव बनाया।

Rising of Court versus Office Hours

  • वकीलों ने तर्क दिया था कि मजिस्ट्रेट ने कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया और कोर्ट के समय के बाद कार्यवाही शुरू की। इस पर हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक टिप्पणी की।
  • समय की सीमा: “अदालत कोई ‘टाइम-क्लॉक’ संस्था नहीं है जो केवल कार्यालय घंटों की बाहरी सीमा से संचालित हो। न्यायिक कार्य अक्सर निर्धारित घंटों से आगे बढ़ता है, विशेषकर रिमांड और तत्काल मामलों में।”
  • कानूनी शब्द: कानून में ‘कार्यालय समय समाप्त होने से पहले’ नहीं, बल्कि ‘अदालत के उठने से पहले’ (Before the rising of the Court) शब्द का उपयोग किया गया है।
  • तथ्य: इस मामले में कोर्ट शाम 7:30 बजे तक बैठी थी और सीसीटीवी फुटेज से स्पष्ट है कि मजिस्ट्रेट ने उठने से पहले ही खुली अदालत में संज्ञान ले लिया था।

युवा मजिस्ट्रेट की सराहना: न्यायपालिका की जीवित अंतरात्मा

  • हाई कोर्ट ने न्यायिक मजिस्ट्रेट सुश्री लक्ष्मी प्रिया के आचरण को अनुकरणीय बताया।
  • सिद्धांतों पर अडिग: कोर्ट ने कहा कि एक युवा अधिकारी ने वकीलों की उम्र, कद या अनुभव की परवाह किए बिना ‘सुविधा का रास्ता’ नहीं, बल्कि ‘दृढ़ विश्वास का रास्ता’ चुना।
  • मनु नीति चोलन की विरासत: बेंच ने उन्हें न्याय के महान आदर्शों का उत्तराधिकारी और न्यायपालिका की अमूल्य संपत्ति बताया। कोर्ट ने कहा कि जिसे कुछ लोग ‘जिद्दीपन’ कह रहे हैं, वह वास्तव में न्यायिक कर्तव्य के निर्वहन में एक आवश्यक ‘सैद्धांतिक दृढ़ता’ है।

पेशेवर मर्यादा और अनुशासन

  • अदालत ने बार और बेंच के बीच संबंधों पर कड़ा संदेश दिया।
  • अनुशासन सर्वोपरि: किसी भी जज को डराने-धमकाने (Browbeating) का प्रयास कानून के शासन की जड़ पर प्रहार है।
  • इम्युनिटी नहीं: वकील होने का मतलब यह नहीं है कि आप अदालत के भीतर अनुशासनहीनता करेंगे और कानून के परिणामों से बच जाएंगे।
  • प्राकृतिक न्याय: कोर्ट ने वकीलों को निर्देश दिया कि वे मजिस्ट्रेट के सामने अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत करें और मजिस्ट्रेट को कानून के अनुसार जांच जारी रखने का आदेश दिया।

न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा

यह फैसला निचली अदालतों के न्यायाधीशों के मनोबल को बढ़ाने वाला है। यह स्पष्ट करता है कि यदि कोई न्यायिक अधिकारी दबाव में आए बिना कानून की गरिमा की रक्षा करता है, तो उच्च न्यायपालिका उसके पीछे मजबूती से खड़ी है। न्याय का मंदिर वकीलों की शोर-शराबे वाली राजनीति का नहीं, बल्कि मर्यादा का स्थान है।

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