Saturday, September 19, 2026
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Unnao Case: अपील में 1940 दिनों की देरी क्यों? उन्नाव पीड़िता से मांगा जवाब…सेंगर के लिए मांगी गई है फांसी

Unnao Case: उन्नाव रेप केस से जुड़े कस्टोडियल डेथ (Custodial Death) मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने पीड़िता से एक कड़ा सवाल पूछा है।

हाईकोर्ट के जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर दुडेजा की बेंच ने पीड़िता की उस अपील पर सुनवाई की, जिसमें उसने पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की 10 साल की सजा को बढ़ाकर मृत्युदंड (Death Sentence) में बदलने की मांग की है। अदालत ने 13 मार्च, 2020 को आए ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील दायर करने में हुई 1,940 दिनों की देरी (लगभग 5 साल से अधिक) पर स्पष्टीकरण मांगा है।

लिमिटेशन (समय सीमा) का पेंच

  • अदालत ने तकनीकी आधार पर पीड़िता के वकील से कई सवाल पूछे।
  • समान कार्यवाहियां: जब पीड़िता इसी घटना से जुड़े अन्य मामलों (जैसे रेप केस की अपील) की पैरवी समय पर कर रही थी, तो इस विशिष्ट मामले (पिता की कस्टोडियल डेथ) में इतनी देरी क्यों हुई?
  • अदालत की टिप्पणी: देरी को माफ करने के लिए आपको हमें ठोस कारण दिखाना होगा। जब आप अन्य मुकदमों की पैरवी कर रही थीं, तो इस अपील के लिए ऐसा क्यों नहीं कर सकीं?”

वकील की दलील: यह एक चमत्कार है कि वह जीवित है

  • पीड़िता के वकील महमूद प्राचा ने देरी के पीछे भावनात्मक और सुरक्षात्मक कारणों का हवाला दिया।
  • प्रतिकूल परिस्थितियां: उन्होंने कहा कि पीड़िता बेहद कठिन परिस्थितियों में जी रही है और यह किसी ‘चमत्कार’ से कम नहीं है कि वह आज भी खड़ी है और लड़ रही है।
  • सत्य बनाम देरी: प्राचा ने कोर्ट से पूछा, देरी बहुत अधिक है, लेकिन क्या देरी कभी सत्य पर भारी पड़ सकती है?

कुलदीप सेंगर का विरोध

  • कुलदीप सिंह सेंगर के वकील कन्हैया सिंघल ने इस अपील का कड़ा विरोध किया।
  • मीडिया ट्रायल: उन्होंने आरोप लगाया कि न्यायिक मंच का उपयोग ‘मीडिया ट्रायल’ के लिए किया जा रहा है।
  • उद्देश्य पर सवाल: सेंगर ने अपने जवाब में दावा किया कि यह अपील किसी न्याय के लिए नहीं, बल्कि ‘पैसा ऐंठने’ और दबाव बनाने के लिए की गई है।

केस की पृष्ठभूमि (The Custodial Death Case)

  • घटना: पीड़िता के पिता को 2018 में आर्म्स एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया था और पुलिस हिरासत में बर्बरता के कारण 9 अप्रैल, 2018 को उनकी मृत्यु हो गई थी।
  • ट्रायल कोर्ट का फैसला (2020): कोर्ट ने सेंगर और उसके भाई को गैर-इरादतन हत्या (Culpable Homicide) का दोषी मानते हुए 10 साल की सजा सुनाई थी।
  • पीड़िता की मांग: अब पीड़िता चाहती है कि इसे हत्या (Section 302 IPC) माना जाए और दोषियों को फांसी दी जाए।

मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
देरी की अवधि1,940 दिन (लगभग 5 साल 4 महीने)।
पीड़िता की मांग10 साल की सजा को बढ़ाकर फांसी में बदला जाए।
CBI का रुखएजेंसी ने कहा कि उसे देरी माफ करने पर कोई विशेष आपत्ति नहीं है।
वर्तमान स्थितिकोर्ट ने देरी के कारणों पर विस्तृत जवाब मांगा है।

कानून बनाम भावना

भारतीय कानून में लिमिटेशन एक्ट के तहत किसी भी फैसले को चुनौती देने की एक निश्चित समय सीमा होती है। हालांकि, गंभीर मामलों में अदालतें ठोस कारण होने पर देरी को माफ कर सकती हैं। अब देखना यह होगा कि क्या कोर्ट पीड़िता की परिस्थितियों को ठोस कारण मानकर उसकी अपील पर मेरिट के आधार पर सुनवाई करेगा या नहीं।

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