Wednesday, July 22, 2026
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Explore AI APP: कानूनी गलियारों में AI की धमक…अदालतों से लेकर कॉपोरेट लॉ फर्म्स तक कैसे बदल रहा है काम का तरीका, यहां विस्तार से जानें

Explore AI APP: भारतीय न्यायपालिका और कानूनी जगत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का दायरा अब सिर्फ चर्चाओं तक सीमित नहीं है।

विशेष रूप से डिजाइन किए गए एआई टूल्स का उपयोग

संसद में कानून मंत्रालय भले ही यह कह रहा हो कि अदालतों में एआई की संभावनाओं को “तलाश” (Explore) जा रहा है, लेकिन जमीन पर सुप्रीम कोर्ट से लेकर देश की बड़ी लॉ फर्म्स तक एआई अपने पैर पूरी तरह पसार चुका है। जानकारों की मानें तो यह मुकदमों के निपटारे की रफ्तार बढ़ाने में एक गेम-चेंजर साबित हो रहा है। तारीखों के चक्कर, दस्तावेज छानने की सुस्ती और अनुवाद में होने वाली देरी को कम करने के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए एआई टूल्स का उपयोग किया जा रहा है। सबसे खास बात यह है कि इन सभी प्रक्रियाओं में ‘ह्यूमन इंटरफेस’ (मानवीय निगरानी) को अनिवार्य रखा गया है ताकि सटीकता (Accuracy) से कोई समझौता न हो।

सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स में छाए ये खास AI टूल्स

भारतीय अदालतों में मुकदमों के बोझ को कम करने और प्रशासनिक कार्यों को गति देने के लिए कई स्वदेशी एआई प्रणालियां काम कर रही हैं।

TERES (Technology Enabled ReSolution): सुप्रीम कोर्ट में संविधान पीठ की सुनवाइयों के दौरान मौखिक दलीलों को रियल-टाइम (तुरंत) लिखित टेक्स्ट में बदलने के लिए इस ट्रांसक्रिप्शन सिस्टम का उपयोग किया जा रहा है। इसकी सह-संस्थापक दीपिका किन्हाल के अनुसार, “एक गलत शब्द के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।” इसलिए इसमें दो-स्तरीय सुरक्षा है: पहली लेयर में एआई ट्रांसक्रिप्ट बनाता है और दूसरी लेयर में इंसान (ह्यूमन चेकर) लाइव उसे सही करता है। भारत में सफल प्रयोग के बाद अब दुबई, अबू धाबी और सिंगापुर की अदालतें भी इसका उपयोग कर रही हैं।

Adalat AI: यह टूल देश के 9 राज्यों के हाई कोर्ट्स में सक्रिय रूप से काम कर रहा है और 5 अन्य में इसके पायलट प्रोजेक्ट चल रहे हैं। केरल में तो इसे चुनिंदा बेंचों के बजाय पूरी कोर्ट प्रणाली में शामिल कर लिया गया है। इसके सीईओ उत्कर्ष सक्सेना के मुताबिक, यह जजों को केस की विभिन्न स्टेज को एक ही विंडो पर देखने की सुविधा देता है। यह कानूनी भाषा को बखूबी समझता है (जैसे जज द्वारा बोले गए किसी सेक्शन या क्लॉज को उसी कानूनी फॉर्मेट में लिखना)।

SUVAS (सुप्रीम कोर्ट विधिक अनुवाद सॉफ्टवेयर): अदालती फैसलों का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद करने के लिए यह प्लेटफॉर्म मील का पत्थर साबित हुआ है। मार्च 2025 के अंत तक इसके जरिए 83,783 सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का 18 क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका था, जिसमें सबसे ज्यादा 36,000 अनुवाद हिंदी में हुए।

SUPACE और LEGRAA: ये एआई अनुसंधान सहायक (Research Assistants) हैं, जो हजारों पुराने फैसलों को स्कैन करके मुख्य तथ्य, कानूनी मुद्दे और प्रासंगिक नजीरें (Precedents) जजों के सामने सेकंडों में रख देते हैं।

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केरल हाई कोर्ट का अनूठा प्रयोग: 46,000 मुकदमों की एआई से स्क्रूटनी

तकनीक अपनाने के मामले में केरल हाई कोर्ट सबसे आगे दिख रहा है। कोर्ट में शुरुआती फाइलिंग स्टेज पर ही वकालतनामा, याचिकाओं और अनुलग्नकों (Annexures) की जांच के लिए एआई का इस्तेमाल किया जा रहा है। अब तक करीब 46,000 मुकदमों को इस प्रक्रिया से गुजारा जा चुका है, जिससे वकीलों द्वारा की जाने वाली मैन्युअल गलतियों को सुधारने में लगने वाला समय बच गया है। इसके अलावा कोर्ट अपने खुद के ‘वॉयस-टू-टेक्स्ट’ (बोलकर लिखने वाले) टूल्स विकसित कर रहा है जिन्हें जिला अदालतों तक ले जाया जा रहा है। साथ ही व्हाट्सएप (WhatsApp) आधारित एक इंटरफेस पर भी काम चल रहा है जिससे सीधे केस स्टेटस चेक किया जा सकेगा।

लॉ फर्म्स और वकीलों के चैंबर में एआई की ‘सुनामी’

अदालतों के मुकाबले निजी लॉ फर्म्स में एआई को बहुत तेजी से अपनाया गया है। कानूनी काम मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बंटता है और एआई इन तीनों में फिट बैठ रहा है।

विधिक कार्यएआई की भूमिका और उपयोग
ड्राफ्टिंग (Drafting)याचिकाएं, आवेदन और अनुबंध (Contracts) एक तय फॉर्मेट में होते हैं, इसलिए एआई शुरुआती ड्राफ्ट तैयार करने और बुनियादी कमियों को जांचने का काम बेहद आसानी से कर रहा है।
डॉक्यूमेंट रिव्यू (Review)पहले वकील सैकड़ों पन्नों के दस्तावेज पढ़ने से कतराते थे, लेकिन अब ‘सिरिल अमरचंद मंगलदास’ जैसी दिग्गज लॉ फर्म्स एआई का उपयोग बड़े विलेखों (Mergers & Acquisitions) और कॉरपोरेट डील्स में क्लॉज जांचने के लिए कर रही हैं। जहां एआई को संदेह होता है, वह स्पष्ट रूप से ‘अस्पष्टता’ (Ambiguity) का सिग्नल दे देता है।
लीगल रिसर्च (Research)‘CaseMine’ और ‘Legora’ जैसे टूल्स वकीलों को सेकंडों में पुराने मुकदमों के संदर्भ ढूंढ कर देते हैं। ये टूल्स यह भी बता देते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में किस पुराने फैसले को पलट दिया है, ताकि वकील अदालत में कोई खारिज हो चुका कानून न पेश कर दें।

संप्रभुता और सुरक्षा: एआई के साथ तीन ‘कड़े नियम’

कानूनी डेटा बेहद संवेदनशील होता है, इसलिए ‘Adalat AI’ के सीटीओ अर्घ्य भट्टाचार्य ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा को लेकर तीन अभेद्य नियम (Non-negotiables) बनाए गए हैं:

सॉवरेन बॉर्डर: सारा डेटा देश की सीमाओं के भीतर ही स्टोर और प्रोसेस होगा।

इन-हाउस मॉडल: सभी एआई मॉडल बिना किसी बाहरी तीसरे पक्ष (Third-party) की मदद के आंतरिक रूप से विकसित और होस्ट किए गए हैं।

सहमति अनिवार्य: बिना स्पष्ट अनुमति के किसी भी डेटा को एक्सेस नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, बिजली कटौती या खराब इंटरनेट जैसी बुनियादी दिक्कतों को ध्यान में रखकर ही इसके कोड लिखे गए हैं।

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

यह तकनीकी बदलाव इस बात की पुष्टि करता है कि भारतीय कानूनी व्यवस्था अब आधुनिक हो रही है। एआई का लक्ष्य अदालती स्टाफ या आशुलिपिकों (Stenographers) को नौकरी से हटाना नहीं, बल्कि उनके काम को ‘वेरिफिकेशन’ (सत्यापन) में बदलना है। एआई कानून की पेचीदगियां नहीं सुलझा सकता, लेकिन फाइलों को खोजने, अनुवाद करने और ड्राफ्टिंग की सुस्ती को खत्म कर मुकदमों की पेंडेंसी को जरूर कम कर सकता है।

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