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Law Student Fraud: LL.B तीसरे वर्ष की छात्रा…वकालत के पेशे को किया कलंकित…₹80 लाख की ठगी, रोचक है फैसला

Law Student Fraud: गुजरात हाई कोर्ट ने कानून की एक छात्रा को अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) देने से इनकार कर दिया है, जिस पर वकील न होते हुए भी खुद को सुप्रीम कोर्ट का वकील बताकर लोगों से ठगी करने का आरोप है।

वकालत का एक नेक पेशा: कोर्ट

हाईकोर्ट जस्टिस पी.एम. रावल की बेंच ने एलएलबी (LL.B.) तीसरे वर्ष की एक छात्रा की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया। पुलिस जांच में छात्रा के पास से फर्जी बार काउंसिल आईडी, रबर स्टैंप और सुप्रीम कोर्ट के वकील का नेमप्लेट बरामद हुआ है। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि वकालत जैसे नेक पेशे (Noble Profession) की छवि को इस तरह धूमिल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

जांच में खुले चौंकाने वाले राज (The Investigation Findings)

  • पुलिस ने जब आरोपी छात्रा के आवास और कार्यालय पर छापेमारी की, तो वहां से कई आपत्तिजनक सामग्री मिली।
  • फर्जी पहचान: छात्रा के नाम से ‘बार काउंसिल ऑफ गुजरात’ का फर्जी एनरोलमेंट कार्ड।
  • बड़ी पदवी: एक बोर्ड (नेमप्लेट) जिस पर उसे ‘सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया’ का वकील दर्शाया गया था।
  • सरकारी मुहरें: कलोल तालुका पुलिस स्टेशन की फर्जी मुहरें, नोटरी की मुहरें और नोटरी रजिस्टर।
  • ठगी का आंकड़ा: FIR के अनुसार, छात्रा और अन्य आरोपियों ने मिलकर अलग-अलग लोगों से करीब ₹80,00,000 की ठगी की है।

आरोपी पक्ष की दलील: मैं तो केवल इंटर्न हूँ

छात्रा के वकील ने बचाव में तर्क दिया कि वह केवल अंतिम सेमेस्टर की छात्रा है और एक ‘जूनियर इंटर्न’ के रूप में काम कर रही है। उसने कभी किसी कोर्ट में ‘वकालतनामा’ पेश नहीं किया और न ही वह कभी कोर्ट में पेश हुई। वह केवल अपने वकील जेठ (Brother-in-law) का राजस्व कार्य (Revenue work) संभाल रही थी। फीस न देने के चक्कर में शिकायतकर्ता ने उसे ‘जूनियर लेडी एडवोकेट’ समझकर फंसाया है।

हाई कोर्ट का कड़ा रुख: हिरासत में पूछताछ जरूरी

  • कोर्ट ने छात्रा की दलीलों को खारिज कर दिया।
  • पेशे की गरिमा: वकालत एक नेक पेशा है। अभी पढ़ाई पूरी भी नहीं हुई और छात्रा के पास से पुलिस की मुहरें और सुप्रीम कोर्ट के वकील का बोर्ड मिलना गंभीर मामला है।
  • गहन जांच: ₹80 लाख की बड़ी राशि की हेराफेरी और इस साजिश में शामिल अन्य लोगों का पता लगाने के लिए ‘कस्टोडियल इंटेरोगेशन’ (हिरासत में पूछताछ) अनिवार्य है।
  • कानूनी आधार: कोर्ट ने ‘श्री गुरुबख्श सिंह सिब्बिया बनाम पंजाब राज्य (1980)’ के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में अग्रिम जमानत का कोई मामला नहीं बनता।

दर्ज की गई धाराएं (BNS Sections)

चूंकि यह मामला अब नई न्याय संहिता के तहत है, इसलिए आरोपी के खिलाफ 316(2): आपराधिक विश्वासघात (Criminal Breach of Trust), 318(2): धोखाधड़ी (Cheating), 319: प्रतिरूपण द्वारा धोखाधड़ी (Cheating by Personation), 336(2) / 340: जालसाजी और जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल (Forgery), 61(2): आपराधिक साजिश (Criminal Conspiracy) धाराओं में केस दर्ज किया गया है।

कानून के छात्रों के लिए सबक

यह फैसला कानून की पढ़ाई कर रहे छात्रों के लिए एक बड़ी चेतावनी है। डिग्री मिलने और बार काउंसिल में पंजीकरण (Registration) होने से पहले खुद को वकील के रूप में पेश करना न केवल अनैतिक है, बल्कि एक गंभीर दंडनीय अपराध भी है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि न्याय की रक्षा करने वाले पेशे में आने से पहले ही कानून तोड़ने वालों के साथ कोई नरमी नहीं बरती जाएगी।

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