Public Prosecutors: केरल में सरकारी वकीलों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता, योग्यता और न्यायिक स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए केरल हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा तैयार किए गए नए दिशा-निर्देशों को मंजूरी दे दी है।
लोक अभियोजकों की चयन प्रक्रिया का मामला
हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और जस्टिस श्याम कुमार वी.एम. की खंडपीठ ने इन नियमों को हरी झंडी दिखाते हुए इसमें एक बेहद महत्वपूर्ण संशोधन (Modification) किया है। अदालत ने साफ किया कि लोक अभियोजकों की चयन प्रक्रिया में जिला न्यायाधीश (District Judge) की राय ही सबसे ऊपर रहेगी। अदालत ने कहा, सरकारी वकीलों, जिला सरकारी वकीलों (Government Pleaders) और अतिरिक्त लोक अभियोजकों (Additional Public Prosecutors) की नियुक्ति में राजनीतिक या प्रशासनिक हस्तक्षेप को रोकने के लिए न्यायपालिका की राय को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। नए दिशा-निर्देशों में केवल जिला जज की राय का ‘ध्यान रखना’ (Due Regard) काफी नहीं है, बल्कि उनकी राय को ‘प्रमुखता और सर्वोच्चता’ (Due Primacy) मिलनी अनिवार्य है।
मामला क्या है?: जनहित याचिकाओं (PILs) से बदले नियम
यह ऐतिहासिक निर्णय एडवोकेट सुधीर पी.एस. और विष्णुप्रसाद नायर द्वारा दायर दो अलग-अलग जनहित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आया।
शुरुआती आदेश (2025): इससे पहले 9 अप्रैल, 2025 को हाई कोर्ट ने सुधीर की याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह नए आपराधिक कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 18 के वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप सरकारी वकीलों की नियुक्ति के लिए आंतरिक गाइडलाइंस तैयार करे।
सरकार का सर्कुलर (दिसंबर 2025): कोर्ट के आदेश के बाद, केरल सरकार ने दिसंबर 2025 में लोक अभियोजकों के चयन पैनल को तैयार करने के लिए एक सर्कुलर (संशोधित दिशा-निर्देश) जारी किया।
नए नियमों को चुनौती: सरकार के इस नए ड्रॉफ्ट को विष्णुप्रसाद नायर ने यह कहते हुए दोबारा चुनौती दी कि सरकार ने इसमें जिला जज की राय को उचित महत्व नहीं दिया है और चयन प्रक्रिया में जिला पुलिस प्रमुख (District Police Chief) को शामिल करके नया और अनुचित मोड़ दे दिया है। कोर्ट द्वारा नियुक्त न्यायमित्र (Amicus Curiae) ने भी क्लॉज 3 में जिला जज की राय को प्राथमिकता न मिलने पर चिंता जताई थी।
हाई कोर्ट का सुधार: ‘Due Regard’ की जगह ‘Due Primacy’ का आदेश
हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने न्यायमित्र और याचिकाकर्ताओं की चिंताओं को सही माना और सरकार के ड्रॉफ्ट सर्कुलर के क्लॉज 3 में एक शब्द का महत्वपूर्ण बदलाव करने का निर्देश दिया। कहा, इस मामले में गंभीर विचार-विमर्श के बाद, हमें लगता है कि उक्त ड्रॉफ्ट सर्कुलर के क्लॉज (3) में केवल एक संशोधन की आवश्यकता है। जहां ‘Due Regard’ (उचित ध्यान देना) शब्द का प्रयोग किया गया है, उसके स्थान पर ‘Due Primacy’ (उचित प्रधानता/सर्वोच्चता) शब्द का उपयोग किया जाएगा। इस एक शब्द के बदलाव से अब यह कानूनी रूप से अनिवार्य हो गया है कि यदि जिला न्यायाधीश किसी वकील के नाम पर आपत्ति जताते हैं या किसी को योग्य मानते हैं, तो सरकार उनकी राय को नजरअंदाज नहीं कर सकती।
चयन में पुलिस कप्तान (SP) की भूमिका पर कोर्ट का रुख
याचिकाकर्ताओं ने इस बात का कड़ा विरोध किया था कि सरकारी वकीलों (जो कि अदालतों में पुलिस के मामलों की पैरवी करते हैं) के चयन में जिला पुलिस प्रमुख (District Police Chief) को क्यों शामिल किया जा रहा है। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस आपत्ति को खारिज कर दिया और सरकार के इस नियम को सही ठहराया।
पुलिस अधिकारी की राय अंतिम नहीं, केवल ‘बैकग्राउंड चेक’ के लिए
जस्टिस सौमेन सेन की पीठ ने स्पष्ट किया कि इसके पीछे एक तार्किक कारण (Logic) है। जिला पुलिस प्रमुख द्वारा दी गई इनपुट (जानकारी) से चयन समिति को एक सुविचारित निर्णय लेने में मदद मिलेगी। जिला पुलिस प्रमुख की राय अंतिम या निर्णायक (Conclusive) नहीं है। इसका उद्देश्य केवल उम्मीदवार के पूर्ववृत्त (Antecedent/आपराधिक या नैतिक बैकग्राउंड) का पता लगाने में समिति की सहायता करना है, ताकि इस महत्वपूर्ण पद पर बैठने वाले व्यक्ति का चरित्र पूरी तरह से संदेह से परे (Free from doubt) हो।
कोर्ट का अंतिम आदेश
केरल हाई कोर्ट ने इस एक महत्वपूर्ण संशोधन (Modificaton) के साथ राज्य सरकार के नए नियुक्ति दिशा-निर्देशों को अपनी आधिकारिक मंजूरी दे दी और दोनों जनहित याचिकाओं (PILs) को पूरी तरह से निस्तारित (Close) कर दिया। अदालत में याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता एस.के. अदित्यन शाहिना, निहारिका हेमा राज, नौशाद, कृष्णा एस. करुणाकरण और अनु चंद्रकुमार ने किया। हाई कोर्ट प्रशासन की ओर से एडवोकेट जनरल के. जाजू बाबू पेश हुए, जबकि वरिष्ठ अधिवक्ता पी. दीपक ने मामले में न्यायमित्र (Amicus Curiae) के रूप में अदालत की सहायता की।
केस शीट: केरल उच्च न्यायालय निर्देश (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्देश |
| संबंधित अदालत | केरल उच्च न्यायालय, एर्नाकुलम |
| माननीय न्यायाधीश | मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और जस्टिस श्याम कुमार वी.एम. |
| मामले का शीर्षक | एडवोकेट सुधीर पी.एस. बनाम केरल राज्य व अन्य (Adv Sudheer PS v State of Kerala & ors) |
| मूल वैधानिक कानून | भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 18 |
| क्या बदलाव हुआ? | सरकारी वकीलों की चयन सूची में जिला जज की राय को ‘उचित ध्यान’ के बजाय ‘सर्वोच्च प्राथमिकता’ (Due Primacy) दी जाएगी। |
| अदालत का अंतिम आदेश | संशोधित सर्कुलर मंजूर; पुलिस कप्तान की भूमिका केवल बैकग्राउंड वेरिफिकेशन तक सीमित रहेगी, जिला जज का फैसला अंतिम होगा। |

