Bail Orders: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक वकील को उस समय कड़ी फटकार लगाई जब उन्होंने अदालत में यह दावा किया कि केवल ‘सीनियर एडवोकेट्स’ के मुवक्किलों को ही जमानत (Bail) मिलती है।
वकील ने बिना शर्त माफी मांग
जस्टिस रामकुमार चौबे की पीठ ने हालांकि वकील द्वारा बिना शर्त माफी मांग लेने के बाद उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने से परहेज किया, लेकिन उन्हें भविष्य के लिए सख्त चेतावनी दी। कोर्ट ने इस टिप्पणी को न्यायपालिका की गरिमा के खिलाफ और ‘अवमानना’ (Contempt) की श्रेणी में माना। यह वाकया 6 मई को एक जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान हुआ। वकील ने अदालत के सामने यह गंभीर आरोप लगाया कि ‘आवश्यक वस्तु अधिनियम’ (Essential Commodities Act) से जुड़े इसी तरह के मामलों में कोर्ट ने उन लोगों को जमानत दी है जिनके वकील ‘सीनियर एडवोकेट’ थे।
वकील का विवादित दावा
- वकील (श्री सैनी) ने तर्क दिया था कि उनके मुवक्किल को केवल इसलिए राहत नहीं दी जा रही है क्योंकि वह खुद एक “जूनियर वकील” हैं। उन्होंने कहा कि सीनियर वकीलों के मामलों में कोर्ट का रुख अलग होता है।
- कोर्ट की आपत्ति: जस्टिस चौबे ने इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई और इसे कोर्ट की कार्यप्रणाली पर बाहरी प्रभाव (Extraneous considerations) का आरोप लगाने जैसा माना। कोर्ट ने इसे हाई कोर्ट की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाला बताया।
“सबूत पेश करें या माफी मांगें”
- अदालत ने वकील को चुनौती दी कि वे ऐसे बेल ऑर्डर पेश करें जहाँ केवल ‘सीनियर एडवोकेट’ होने के आधार पर जमानत दी गई हो।
- सच्चाई आई सामने: 8 मई को जब दोबारा सुनवाई हुई, तो वकील ने स्वीकार किया कि उनके पास ऐसा कोई आदेश नहीं है और न ही उन्हें ऐसी किसी जानकारी की पुष्टि है। उन्होंने बताया कि उनका पिछला बयान केवल एक अन्य बेंच के आदेश के संदर्भ में था।
- बिना शर्त माफी: वकील ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए अदालत से माफी मांगी।
कोर्ट की नसीहत: “संयम बरतें”
- अदालत ने माफी स्वीकार करते हुए वकील को भविष्य के लिए सतर्क किया।
- न्यायिक पवित्रता: कोर्ट ने कहा कि वकीलों को अदालती कार्यवाही की पवित्रता के प्रति सचेत रहना चाहिए और दलीलें देते समय बहुत ही सटीक और मर्यादित (Circumspect) होना चाहिए।
- समानता का सिद्धांत: यह मामला स्पष्ट करता है कि कानून की नजर में सभी वकील समान हैं और फैसला केस की मेरिट पर होता है, न कि वकील के पद या वरिष्ठता पर।
मामले का सारांश (Quick Highlights)
| विवरण | तथ्य |
| विवाद का विषय | सीनियर बनाम जूनियर वकील के आधार पर जमानत का भेदभावपूर्ण आरोप। |
| कोर्ट की टिप्पणी | यह बयान अदालती गरिमा के खिलाफ और अवमाननापूर्ण है। |
| नतीजा | वकील की माफी के बाद अवमानना की कार्यवाही नहीं की गई। |
| अगली सुनवाई | मूल जमानत याचिका पर अब 15 मई, 2026 को विचार किया जाएगा। |
निष्पक्षता पर भरोसा
हाई कोर्ट का यह रुख उन धारणाओं को तोड़ने के लिए महत्वपूर्ण है जिनमें यह माना जाता है कि बड़े वकीलों के होने से ही न्याय मिलता है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि न्यायिक पीठ तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर चलती है, और इस प्रक्रिया पर सवाल उठाना गंभीर परिणाम ला सकता है।

