Wednesday, October 28, 2026
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Maintenance Not Illusory: पत्नी को भरण-पोषण देने केवल दिखावा न हो…यह पति का कर्तव्य है, ऐसा क्यों कहा तलाक के केस में

Maintenance Not Illusory: सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में भरण-पोषण (Maintenance) के अधिकार को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला सुनाया है।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुसुप्रीम कोर्ट का निर्देश
पति की जिम्मेदारीयह एक ‘प्राथमिक और निरंतर’ (Primary and Continuing) ड्यूटी है।
निर्धारण का आधारपति की आय और दोनों पक्षों का सामाजिक-आर्थिक स्तर।
नया कानूनइस मामले में BNSS, 2023 की धारा 144 के तहत सुनवाई हुई।
उद्देश्यपत्नी को सम्मान के साथ जीने में सक्षम बनाना (Dignified Life)।

जिम्मेदारी केवल पैसे देना नहीं: कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस अगस्त्य जॉर्ज मसीह की बेंच ने एक महिला के भरण-पोषण को ₹15,000 से बढ़ाकर ₹25,000 प्रति माह करते हुए कहा कि पति की जिम्मेदारी केवल पैसे देना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि उसकी पत्नी उसी जीवन स्तर को बनाए रख सके जो उसने शादी के दौरान अनुभव किया था। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पत्नी का भरण-पोषण करना पति का ‘प्राथमिक और निरंतर कर्तव्य’ है, और यह राशि ऐसी होनी चाहिए जिससे पत्नी सम्मानजनक जीवन जी सके।

मामले की पृष्ठभूमि (The Short-lived Marriage)

  • विवाह: दंपत्ति की शादी 7 मई, 2023 को हिंदू रीति-रिवाजों से हुई थी।
  • विवाद: शादी के एक साल के भीतर ही पत्नी ने आरोप लगाया कि उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया और उपेक्षित छोड़ा गया। उसे ससुराल छोड़कर अपने मायके लौटने पर मजबूर होना पड़ा।
  • कानूनी लड़ाई: पत्नी ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 144 (जो पुराने CrPC की धारा 125 के समान है) के तहत ₹50,000 प्रति माह की मांग की थी।

उचित संतुलन और गरिमा का सिद्धांत

  • सुप्रीम कोर्ट ने भरण-पोषण के निर्धारण के लिए कुछ बुनियादी मानक तय किए हैं।
  • दिखावा नहीं (Not Illusory): कोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण की राशि ऐसी नहीं होनी चाहिए जो केवल नाममात्र की हो। यह निष्पक्ष, तर्कसंगत और दोनों पक्षों की सामाजिक स्थिति (Status) के अनुरूप होनी चाहिए।
  • जीवन स्तर की निरंतरता: पत्नी को उसी स्तर पर रहने का हक है जो उसे शादी के दौरान प्राप्त था।
  • संतुलन: जहाँ पत्नी को सम्मानजनक जीवन मिलना चाहिए, वहीं कोर्ट ने यह भी कहा कि पति पर इतना अधिक बोझ नहीं डालना चाहिए जो उसकी वित्तीय क्षमता (Financial Capacity) से बाहर हो। यह “प्रतिस्पर्धी विचारों के बीच एक न्यायपूर्ण संतुलन” बनाने का अभ्यास है।

कानूनी सफर: चंपावत से सुप्रीम कोर्ट तक

  • भरण-पोषण की राशि इस मामले में लगातार बदलती रही।
  • फैमिली कोर्ट (चंपावत): केवल ₹8,000 प्रति माह तय किए।
  • उत्तराखंड हाई कोर्ट: राशि बढ़ाकर ₹15,000 प्रति माह की।
  • सुप्रीम कोर्ट: अंततः इसे बढ़ाकर ₹25,000 प्रति माह कर दिया गया, यह देखते हुए कि पत्नी के पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है।

महिलाओं के आर्थिक अधिकारों की जीत

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन महिलाओं के लिए एक बड़ी राहत है जिनके पास अलग होने के बाद जीवन यापन का कोई साधन नहीं होता। अदालत ने साफ कर दिया है कि पति अपनी जिम्मेदारी से केवल यह कहकर नहीं बच सकता कि वह कम कमाता है; उसे अपनी क्षमता के अनुसार पत्नी के सम्मान की रक्षा करनी होगी।

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