Tuesday, September 8, 2026
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SC Committee: अदालतों में AI के इस्तेमाल पर बड़ा ड्राफ्ट.. बेल देने या फैसला तय करने में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर पूर्ण प्रतिबंध का प्रस्ताव

SC Committee: न्यायपालिका में तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते दखल के बीच सुप्रीम कोर्ट की एक उच्चस्तरीय समिति ने बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा रुख अपनाया है।

3 जून 2026 को प्रारंभिक मसौदे का किया प्रकाशन

सुप्रीम कोर्ट की एआई समिति द्वारा 3 जून 2026 को जारी ‘अदालतों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग के लिए नियम, 2026’ के प्रारंभिक मसौदे (Draft Regulations) में साफ किया गया है कि न्याय प्रणाली में तकनीक हमेशा इंसान के अधीन ही रहेगी। समिति ने इस ड्राफ्ट पर आम जनता और सभी हितधारकों (Stakeholders) से 20 जून 2026 तक सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं। कमेटी ने अदालती फैसलों, सजा तय करने या किसी आरोपी की जमानत (Bail) की पात्रता तय करने के लिए AI के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध (Complete Ban) लगाने का प्रस्ताव दिया है।

इंसानी दिमाग का विकल्प नहीं हो सकता AI

जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली इस समिति में जस्टिस संजीव सचदेवा, जस्टिस राजा विजयराघवन वी., जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस सूरज गोविंदराज शामिल हैं। कमेटी ने ड्राफ्ट में स्पष्ट रूप से लिखा है। कहा, अदालती प्रक्रियाओं में AI का उपयोग हमेशा मानवीय निर्णय और न्यायिक अधिकार के अधीन (Strictly Subservient) रहेगा। कोई भी एआई सिस्टम केवल एक ‘सहायक’ (Assistive Capacity) के रूप में काम करेगा। यह किसी भी नियुक्त न्यायिक अधिकारी के स्वतंत्र विवेक और निर्णय लेने की क्षमता का स्थान (Supplant) नहीं ले सकता। कानून, तथ्य और न्याय तय करने का अंतिम अधिकार विशेष रूप से केवल न्यायाधीशों के पास ही सुरक्षित रहेगा।

AI पर कहां रहेगा पूर्ण प्रतिबंध? (Where AI is Prohibited)

सुप्रीम कोर्ट के इस ड्राफ्ट में उन क्षेत्रों को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया है जहां एआई टूल्स के इस्तेमाल की सख्त मनाही होगी।

फैसला और सजा सुनाना: किसी भी मामले में दोषसिद्धि (Adjudication) या सजा (Sentencing) तय करने के लिए एआई का इस्तेमाल नहीं होगा। अगर किसी प्रक्रिया में इसका कोई आउटपुट आता भी है, तो वह केवल ‘सलाह’ (Advisory) माना जाएगा और जज स्वतंत्र रूप से उसका मूल्यांकन करेंगे।

जमानत और रिस्क स्कोरिंग: कोर्ट की प्रक्रियाओं में किसी आरोपी के भागने के जोखिम (Flight Risk), दोबारा अपराध करने की प्रवृत्ति (Recidivism), या जमानत की पात्रता (Bail Eligibility) का आकलन करने के लिए एआई आधारित ‘रिस्क स्कोरिंग’ पर पूरी तरह रोक होगी।

गवाहों की क्रेडिबिलिटी: गवाहों या पक्षों की विश्वसनीयता का अनुमान लगाने या उनकी प्रोफाइलिंग करने वाले एआई टूल्स प्रतिबंधित रहेंगे।

पारदर्शिता की कमी (Opaque Systems): ऐसे किसी भी ‘अघोषित’ या ‘रहस्यमयी’ (Opaque/Unexplainable) एआई सिस्टम का उपयोग नहीं किया जा सकेगा, जो किसी भी पक्ष के कानूनी अधिकारों या व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करता हो।

निगरानी (Surveillance) पर रोक: कोर्ट परिसर या अदालती कार्यवाही के दौरान न्यायाधीशों, वकीलों या मुकदमों से जुड़े नागरिकों की निरंतर निगरानी या सर्विलांस के लिए एआई का उपयोग नहीं किया जाएगा।

इन कामों के लिए मिल सकती है हरी झंडी (Where AI is Permissible)

कमेटी ने माना है कि प्रशासनिक और लिपिकीय कार्यों को आसान बनाने के लिए एआई एक बेहतरीन टूल है। इसके तहत निम्नलिखित कार्यों में इसके उपयोग की अनुमति होगी, इनमें केस मैनेजमेंट, कॉज लिस्ट (वाद सूची) तैयार करना और सुनवाइयों का शेड्यूल तय करना, अदालती कार्यवाही का लाइव ट्रांसक्रिप्शन (लिखित विवरण तैयार करना) और फैसलों का अन्य भाषाओं में अनुवाद करना, कानूनी रिसर्च (Legal Research) और केस फाइलिंग में सहायता करना,
अदालती रिकॉर्ड का प्रबंधन और फाइलों में कमियों (Defects) की जांच करना, दिव्यांगों या भाषाई बाधाओं का सामना कर रहे लोगों के लिए पहुंच (Accessibility) आसान बनाना और मुकदमों से जुड़े लोगों की मदद के लिए एआई चैटबॉट्स या असिस्टेंस टूल बनाना शामिल है।

डेटा सुरक्षा और भेदभाव पर कड़े नियम

मशहूर डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 (DPDP Act) का हवाला देते हुए ड्राफ्ट में कहा गया है कि किसी भी व्यक्ति के पर्सनल डेटा का इस्तेमाल सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना एआई को ट्रेन या टेस्ट करने के लिए नहीं किया जाएगा। इसके अलावा, एआई सिस्टम को इस तरह डिजाइन किया जाएगा कि वह जाति, धर्म, नस्ल, लिंग, भाषा या आर्थिक स्थिति के आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव या पूर्वाग्रह (Bias) को बढ़ावा न दे। विशेष रूप से महिलाओं, बच्चों, अल्पसंख्यकों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष ध्यान रखा जाएगा।

रेगुलेशन के लिए बनेगी ‘सुप्रीम एआई बॉडी’

एआई के जिम्मेदार उपयोग और नीतियों को तय करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक स्थायी और पूर्णकालिक शीर्ष निकाय (Apex Regulatory Body) बनाने का प्रस्ताव है। इसकी संरचना इस प्रकार होगी:

पद / प्रतिनिधित्वसंख्या और विवरण
चेयरपर्सनभारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) द्वारा नामित सुप्रीम कोर्ट के एक जज (पदेन अध्यक्ष)।
न्यायिक सदस्यसुप्रीम कोर्ट के एक अन्य जज, दो हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और दो हाई कोर्ट के जज (CJI द्वारा नामित)।
तकनीकी व कानूनी विशेषज्ञइलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय (MeitY) के संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी, एक साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ, एक वित्त विशेषज्ञ और तकनीकी कानून/डेटा प्राइवेसी के विशेषज्ञ वकील।
एकेडमिक सदस्यनेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी, भोपाल के एआई विभाग के प्रमुख प्रोफेसर।

इसके अलावा, प्रत्येक हाई कोर्ट और खुद सुप्रीम कोर्ट में एक आंतरिक एआई कमेटी भी बनाई जाएगी जो अपने अधिकार क्षेत्र में इसके सही क्रियान्वयन की निगरानी करेगी।

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

सुप्रीम कोर्ट पैनल का यह ड्राफ्ट वैश्विक कानूनी इतिहास में एक ऐतिहासिक कदम है। अमेरिका और कई यूरोपीय देशों में जहां जमानत और रिस्क असेसमेंट के लिए एल्गोरिदम (Algorithm) का सहारा लिया जा रहा है, वहीं भारत ने साफ कर दिया है कि न्याय की कुर्सी पर कोई रोबोट या कंप्यूटर कोड नहीं बैठ सकता। न्याय में मानवीय संवेदना, अंतरात्मा और परिस्थितियों का आकलन जरूरी है, जिसे कोई भी कोडिंग रिप्लेस नहीं कर सकती।

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