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Military Justice: आपने ‘इस्तेमाल करो और फेंको की नीति’ के तहत सेना के जवान काे सेवामुक्त कर दिया…यह नहीं चलने देंगे, आदेश ध्यान से पढ़ें

Military Justice: दिल्ली हाई कोर्ट ने भारतीय सेना के एक सिपाही के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए उसकी बहाली (Reinstatement) के आदेश दिए हैं।

हाईकोर्ट के जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की बेंच ने सिपाही की सेवामुक्ति (Discharge) के आदेश को रद्द करते हुए उसे 31 मई, 2022 से सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने माना कि ‘प्राइमरी हाइपरटेंशन’ (Primary Hypertension) और 30 प्रतिशत विकलांगता के आधार पर 11 साल की सेवा के बाद सिपाही को बिना पेंशन लाभ के सेवामुक्त करना न केवल नियमों के खिलाफ है, बल्कि अन्यायपूर्ण भी है।

मामला क्या था? (Background of the Dispute)

  • नियुक्ति: याचिकाकर्ता 2011 में सेना में सिपाही के रूप में भर्ती हुआ था।
  • बीमारी: जून 2020 में उसे ‘प्राइमरी हाइपरटेंशन’ का पता चला और 2021 में उसकी विकलांगता 30% आंकी गई।
  • डिस्चार्ज: जनवरी 2022 में उसे सेवामुक्त कर दिया गया, जबकि उसने अपनी 15 साल की न्यूनतम पेंशनभोगी सेवा (Pensionable Service) पूरी नहीं की थी। वह अपनी पेंशन अवधि से लगभग साढ़े तीन साल दूर था।
  • ट्रिब्यूनल का रुख: सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) ने पहले उसकी याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुँचा।

कोर्ट का मुख्य कानूनी तर्क (Key Legal Grounds)

A. नियमों का उल्लंघन (Violation of Army Rules)

  • मेडिकल बोर्ड की अनिवार्यता: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी सिपाही को मेडिकल आधार पर निकालने से पहले ‘रिलीज़ मेडिकल बोर्ड’ (Release Medical Board) की सिफारिश अनिवार्य (Sine qua non) है। इस मामले में बोर्ड के गठन से पहले ही डिस्चार्ज ऑर्डर जारी कर दिया गया था।
  • शेल्टर्ड अपॉइंटमेंट (Sheltered Appointment): नियम कहते हैं कि यदि कोई जवान बीमार है, तो पहले यूनिट में उसके लिए ‘शेल्टर्ड पोस्ट’ (हल्का काम) तलाशा जाना चाहिए। सिपाही ने कुक (Cook) के रूप में काम जारी रखने की इच्छा जताई थी, जिसे कमांडिंग ऑफिसर ने अनसुना कर दिया।

B. ‘उदासीन रवैया’ कोई आधार नहीं

सेना ने तर्क दिया था कि सिपाही का काम के प्रति ‘उदासीन रवैया’ (Indifferent attitude) था। कोर्ट ने इसे फटकारते हुए कहा, उदासीन रवैया एक अनुशासनात्मक मामला (Disciplinary case) है, जिसके लिए अलग प्रक्रिया अपनानी होती है। इसे मेडिकल डिस्चार्ज का आधार नहीं बनाया जा सकता।

पेंशन अधिकारों की रक्षा

  • कोर्ट ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि 11 साल तक देश की सेवा करने वाले जवान को बिना किसी पेंशन लाभ के घर भेज दिया गया।
  • सुधारात्मक आदेश: कोर्ट ने आदेश दिया कि सिपाही को सभी आनुषंगिक लाभों (Consequential benefits) जैसे कि सेवा की निरंतरता, पिछला वेतन, भत्ते और वरिष्ठता (Seniority) के साथ बहाल किया जाए।
  • समय सीमा: जवान को 30 दिनों के भीतर अपनी यूनिट में रिपोर्ट करना होगा और सेना को 3 महीने के भीतर उसके बकाया वेतन का भुगतान करना होगा।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
बीमारीप्राइमरी हाइपरटेंशन (30% विकलांगता)।
सेवा अवधि11+ वर्ष (पेंशन के लिए 15 वर्ष आवश्यक थे)।
कोर्ट का आदेशपूर्ण बहाली और पिछला वेतन/भत्तों का भुगतान।
मुख्य खामीरिलीज़ मेडिकल बोर्ड की सिफारिश के बिना डिस्चार्ज।

जवानों के मनोबल और अधिकारों की जीत

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला उन हजारों जवानों के लिए उम्मीद की किरण है जो मामूली स्वास्थ्य समस्याओं के कारण अपनी पेंशन और नौकरी खोने के डर में रहते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि सेना एक अनुशासित संस्था जरूर है, लेकिन वह अपने जवानों को कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना इस्तेमाल करो और फेंको (Use and Throw) की नीति के तहत सेवामुक्त नहीं कर सकती।

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