Sunday, June 28, 2026
HomeLaworder HindiNarsinhji Temple: न्याय के तंत्र को घिसटते मुकदमेबाजी के हथियार में बदल...

Narsinhji Temple: न्याय के तंत्र को घिसटते मुकदमेबाजी के हथियार में बदल दिया गया…नवसारी का नरसिंहजी मंदिर कैसे घोषित हुआ पब्लिक ट्रस्ट

Narsinhji Temple: गुजरात हाईकोर्ट ने न्यायिक प्रणाली में मुकदमों को जानबूझकर दशकों तक खींचने और रणनीतिक विलंब (Strategic Procrastination) को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करने पर बेहद तल्ख और ऐतिहासिक विधिक टिप्पणी की है।

47 वर्षों से हाई कोर्ट में लंबित तीन प्रथम अपीलों (First Appeals) को पूरी तरह से खारिज

हाईकोर्ट के जस्टिस जे.सी. दोशी की एकल पीठ ने साल 1979 से यानी 47 वर्षों से हाई कोर्ट में लंबित तीन प्रथम अपीलों (First Appeals) को पूरी तरह से खारिज (Dismissed) करते हुए स्पष्ट किया कि यह मंदिर ‘गुजरात पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट, 1950’ के तहत एक पब्लिक ट्रस्ट (सार्वजनिक ट्रस्ट) है। अदालत ने आदेश दिया कि बड़ौदा रियासत द्वारा मंदिर के रख-रखाव के लिए दी गई जमीनों सहित सभी संपत्तियां सार्वजनिक हैं, न कि दिवंगत महंत के वारिसों की निजी संपत्ति। अदालत ने नवसारी के धामन गांव में स्थित भगवान नरसिंहजी के मंदिर को लेकर साल 1952 से चले आ रहे 74 साल पुराने कानूनी विवाद का अंत कर दिया है।

Narsinhji Temple का विधिक पृष्ठभूमि: 1952 से 2026 तक का कानूनी सफर

यह मामला भारतीय कानूनी इतिहास में मुकदमों के लंबे समय तक खिंचने का एक ज्वलंत उदाहरण है।

विवाद की शुरुआत (1952): भगवान नरसिंहजी के भक्तों ने बड़ौदा के डिप्टी चैरिटी कमिश्नर के समक्ष अर्जी दी कि मंदिर एक सार्वजनिक संस्थान है। इसके विपरीत, तत्कालीन महंत ने दावा किया कि मूर्ति उनके पूर्वजों द्वारा स्थापित एक निजी देवता (Private Deity) है और संपत्तियां उनकी निजी जागीर हैं।

1971 और 1977 के मोड़: चैरिटी कमिश्नर ने इसे पब्लिक ट्रस्ट माना, लेकिन 1971 में जिला अदालत ने इस फैसले को पलटकर इसे निजी संपत्ति घोषित कर दिया। इसके बाद भक्तों ने हाई कोर्ट का रुख किया, जहां 1977 में एक डिवीजन बेंच ने जिला अदालत के फैसले को निरस्त करते हुए अंतिम रूप से तय कर दिया कि मंदिर एक पब्लिक ट्रस्ट ही है।

47 साल तक लटकाए रखी अपीलें: महंत ने 1979 में सुप्रीम कोर्ट से अपनी एसएलपी (SLP) वापस ले ली, लेकिन हाई कोर्ट में 1979 में दाखिल की गई तीन अन्य अपीलों को तकनीकी तिकड़मों से अगले 45 से अधिक वर्षों तक जीवित रखा, ताकि पब्लिक ट्रस्ट के फैसले को लागू न होने दिया जाए।

Also Read; Fake Drug Racket: नकली वजन घटाने वाली दवा ‘मूंजारो’ और मेड इन जापान का टोन अप बेचा जा रहा…आरोपी के खुलासे से कोर्ट हुआ हैरान, पढ़िए

हाई कोर्ट का कड़ा रुख: मुकदमेबाजी को थका देने वाला हथियार बनाना कानून के शासन के खिलाफ

जस्टिस जे.सी. दोशी ने अपीलों को योग्यता से पूरी तरह परे (Arid of merits) बताते हुए जानबूझकर की गई देरी पर तीखे विधिक बाण चलाए।

न्याय का मज़ाक उड़ाती रणनीतिक देरी

अदालत ने अपने विधिक आदेश में टिप्पणी की, ये तीनों अपीलें पूरी तरह से गुणहीन हैं, बल्कि यह चार दशकों से अधिक समय तक अपीलों को जानबूझकर खींचने का परिणाम हैं, जो न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को दर्शाता है। यह एक सोची-समझी रणनीति थी जो न्याय के तंत्र को एक ‘घिसटते हथियार’ (Weapon of Attrition) में बदल देती है, ताकि प्रणालीगत बैकलॉग का फायदा उठाकर भगवान नरसिंहजी के मंदिर को पब्लिक ट्रस्ट घोषित करने के मूल उद्देश्य को ही थकाकर मार दिया जाए।

विपक्षी की उम्र, पैसा और धैर्य खत्म करने का पैंतरा

हाई कोर्ट ने आगे कहा, चार दशकों तक कार्यवाही को खींचकर अपीलकर्ताओं ने एक अनुचित विधिक लाभ सुरक्षित रखा और लाभार्थियों को उस फैसले के फलों से वंचित रखा जो 1971 में ही आ चुका था। यह कानून के शासन (Rule of Law) के लिए क्रूर है। रणनीतिक रूप से मुकदमों को टालना न्यायिक कार्यवाही को एक हथियार में बदल देता है ताकि विरोधी पक्ष के जीवन, वित्त (Finance) और धैर्य को पूरी तरह से निचोड़ दिया जाए। चालीस साल तक मुकदमेबाजी चलाना कानूनी उपचार को न्याय के मज़ाक में बदल देता है।

गुरु-चेला परंपरा और बड़ौदा रियासत की ‘बरखाली’ भूमि

महंत के वारिसों ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देकर दलील दी थी कि भक्तों द्वारा दिए गए दान से संपत्ति सार्वजनिक नहीं हो जाती। हाई कोर्ट ने इन तर्कों को विधिक रूप से खारिज कर दिया।

गुरु-चेला उत्तराधिकार: कोर्ट ने पाया कि मंदिर की संपत्तियों का हस्तांतरण व्यक्तिगत पारिवारिक वारिसों के बजाय ‘गुरु-चेला परंपरा’ के अनुसार होता आया है। कानूनन, जब संपत्ति गुरु से चेला परंपरा में जाती है, तो यह माना जाता है कि वह देवता (Deity) को समर्पित है और उसका उद्देश्य धर्मार्थ (Charitable) है।

बड़ौदा राज्य का अनुदान: बड़ौदा की तत्कालीन रियासत ने मंदिर के संचालन के लिए ‘बरखाली’ (Barkhali) श्रेणी की कई भूमि पार्सल दी थीं। बाद में महंत ने प्रशासक के रूप में इन्हें निजी बताकर तीसरे पक्षों को बेच दिया, जो कि पूरी तरह अवैध था। ये संपत्तियां मूल रूप से मंदिर को समर्पित थीं, महंत को व्यक्तिगत रूप से नहीं।

Narsinhji Temple: केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Matrix Overview)

विधिक श्रेणियां / बिंदुगुजरात उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (2026)
संबंधित अदालतगुजरात उच्च न्यायालय, अहमदाबाद (एकल पीठ)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस जे.सी. दोशी
मुकदमे का मूल वर्षवर्ष 1952 (अपीलें वर्ष 1979 से उच्च न्यायालय में लंबित थीं)
लंबित रहने की अवधि74 वर्ष (अपील चरण में पिछले 47 वर्ष)
अधिनियम/कानूनगुजरात पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट, 1950 (Gujarat Public Trusts Act)
विवादित स्थलभगवान नरसिंहजी मंदिर, ग्राम धामन, नवसारी (गुजरात)
मुख्य कानूनी सिद्धांतयदि संपत्ति का हस्तांतरण गुरु-चेला परंपरा से हो और राजसी अनुदान मंदिर के लिए मिला हो, तो वह ‘पब्लिक ट्रस्ट’ है। जानबूझकर मुकदमे खींचना न्याय की अवमानना है।
अंतिम विधिक परिणामतीनों प्रथम अपीलें पूरी तरह खारिज; मंदिर सार्वजनिक ट्रस्ट घोषित; कोर्ट ने तत्काल डिक्री तैयार करने का आदेश दिया।
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Patna
broken clouds
40.1 ° C
40.1 °
40.1 °
30 %
3.8kmh
51 %
Sun
43 °
Mon
43 °
Tue
41 °
Wed
32 °
Thu
33 °

Recent Comments