PIL vs Credentials: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागू और जस्टिस संजीव बेरी की बेंच ने पंजाब के नए ‘बेअदबी विरोधी कानून’ (Anti-sacrilege Law) को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता को ही कटघरे में खड़ा कर दिया।
कोर्ट ने कानून की वैधता पर विचार करने से पहले याचिकाकर्ता के ‘क्रेडेंशियल्स’ (Antecedents) और उसके संदिग्ध अतीत पर कड़े सवाल उठाए। यह मामला ‘जगत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम, 2026’ की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने के लिए दायर किया गया था। लेकिन सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता सिमरनजीत सिंह खुद कानूनी शिकंजे में फंस गए।
याचिकाकर्ता पर कोर्ट और AG के गंभीर आरोप
- पंजाब के एडवोकेट जनरल (AG) मनिंदरजीत सिंह बेदी ने याचिकाकर्ता की साख पर सवाल उठाते हुए कोर्ट को बताया।
- संदिग्ध डिग्री: याचिकाकर्ता का बार लाइसेंस निलंबित कर दिया गया है क्योंकि उसकी लॉ डिग्री (Law Degree) की सत्यता की जांच चल रही है। स्टेट बार काउंसिल ने उसका नामांकन वापस ले लिया है।
- तथ्यों को छुपाना: याचिकाकर्ता ने अपने खिलाफ दर्ज 3 FIR की जानकारी याचिका में नहीं दी थी। कोर्ट ने इसे “महत्वपूर्ण तथ्यों को दबाने का प्रयास” माना।
- आदतन शिकायतकर्ता: विजिलेंस ब्यूरो ने उसे ‘आदतन शिकायतकर्ता’ (Habitual Complainant) घोषित कर रखा है।
- कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा: “हमें पहले यह देखना होगा कि क्या इस याचिका पर सुनवाई की जा सकती है या इसे भारी जुर्माने के साथ खारिज कर दिया जाए।”
पंजाब का नया बेअदबी कानून (The Anti-sacrilege Law 2026)
- पंजाब विधानसभा द्वारा पारित इस संशोधित कानून में बेहद सख्त सजाओं का प्रावधान है।
- सजा: श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी के लिए न्यूनतम 7 साल और अधिकतम 20 साल की कैद।
- जुर्माना: ₹2 लाख से ₹10 लाख तक का जुर्माना।
- उम्रकैद का प्रावधान: यदि बेअदबी सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने या किसी आपराधिक साजिश के तहत की जाती है, तो सजा 10 साल से लेकर उम्रकैद तक हो सकती है। इसमें जुर्माना ₹25 लाख तक जा सकता है।
याचिकाकर्ता की कानूनी दलीलें (Constitutional Grounds)
- भले ही कोर्ट ने याचिकाकर्ता के आचरण पर सवाल उठाए, लेकिन याचिका में उठाए गए कानूनी बिंदु महत्वपूर्ण हैं।
- राष्ट्रपति की सहमति का अभाव (Article 254(2)): याचिकाकर्ता का तर्क है कि चूंकि यह कानून ‘समवर्ती सूची’ (Concurrent List) के विषयों से संबंधित है और ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) जैसे केंद्रीय कानूनों के विपरीत है, इसलिए इसे केवल राष्ट्रपति की सहमति से ही लागू किया जा सकता था। केवल राज्यपाल की सहमति पर्याप्त नहीं है।
- अनुच्छेद 14 का उल्लंघन: दलील दी गई कि यह कानून केवल एक धर्म के ग्रंथ पर केंद्रित है और अन्य धर्मों के पवित्र ग्रंथों को बाहर रखता है, जो समानता के अधिकार के खिलाफ है।
- अस्पष्ट परिभाषा: याचिका में कहा गया कि ‘बेअदबी’ (Sacrilege) की परिभाषा इस कानून में बहुत अस्पष्ट (Vague) है।
केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| बिंदु | विवरण |
| याचिकाकर्ता | सिमरनजीत सिंह (जालंधर)। |
| मुख्य विवाद | राज्यपाल की सहमति बनाम राष्ट्रपति की सहमति। |
| कानूनी प्रावधान | धारा 5(3) – सांप्रदायिक शांति भंग करने पर उम्रकैद। |
| कोर्ट का रुख | अगले हफ्ते तक टली सुनवाई; पहले याचिकाकर्ता के रिकॉर्ड की जांच होगी। |
जनहित याचिका का दुरुपयोग?
हाई कोर्ट का यह रुख स्पष्ट करता है कि जनहित याचिका (PIL) दायर करने वाले व्यक्ति का खुद का रिकॉर्ड साफ होना चाहिए। कोर्ट यह सुनिश्चित करना चाहता है कि कोई व्यक्ति अपने ‘निजी हितों’ या ‘संदिग्ध अतीत’ को छिपाकर न्यायपालिका के कंधों पर बंदूक रखकर राजनीतिक या सामाजिक एजेंडा न चलाए। अब अगली सुनवाई में यह तय होगा कि क्या कोर्ट कानून की मेरिट पर विचार करेगा या याचिकाकर्ता के आचरण के कारण केस खारिज कर देगा।

