Wednesday, October 14, 2026
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Public Obscenity: यौन संकेत या कामुक टिप्पणियों के बिना किसी महिला को दी गई सामान्य गाली; IPC के इस धारा के तहत अपराध नहीं, जानिए केस

उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष

  1. धारा 354A(1)(iv) IPC के लिए यौन तत्व का होना अनिवार्य:जस्टिस सेबेस्टियन ने कहा:“केवल अश्लील शब्दों का उच्चारण अपने आप में स्वचालित रूप से धारा 354A(1)(iv) IPC के तहत अपराध नहीं बनाता। इसके लिए एक विशिष्ट आरोप होना चाहिए कि अभियुक्त ने महिला के खिलाफ यौन रूप से अशिष्ट टिप्पणियाँ की थीं। किसी महिला के खिलाफ सामान्य गाली-गलौज (General Abuse) धारा 354A(1)(iv) का अपराध गठित नहीं करती।”
  2. धारा 509 IPC (महिला की लज्जा का अनादर):अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी महिला की लज्जा का अपमान करने के इरादे (Intention to insult the modesty of a woman) के बिना केवल अभद्र भाषा का प्रयोग करना धारा 509 के तहत अपराध नहीं है। हालाँकि, अभियुक्त का इरादा क्या था—यह साक्ष्य का विषय है जिसे केवल ट्रायल (सुनवाई) के दौरान ही तय किया जा सकता है।
  3. धारा 506 (आपराधिक धमकी) व 294(b) के तहत प्रथम दृष्टया मामला:
    • धारा 506 (Criminal Intimidation): शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि अभियुक्त फरसा/हथियार लेकर आया और जान से मारने की धमकी दी। कोर्ट ने माना कि यह आरोप धारा 506 के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनाता है।
    • धारा 294(b) (Public Obscenity): सार्वजनिक स्थान पर गंदे शब्दों का इस्तेमाल करने और उससे अश्लीलता फैलने का प्रश्न भी ट्रायल कोर्ट के साक्ष्य पर निर्भर करेगा।
  4. BNSS की धारा 528 (पुराने CrPC की धारा 482) के अधिकार क्षेत्र की सीमा:हाईकोर्ट ने याद दिलाया कि FIR/चार्जशीट रद्द करने की अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए अदालत मिनी-ट्रायल (Mini-Trial) नहीं चला सकती और न ही सबूतों का सूक्ष्म मूल्यांकन कर सकती है।

कोच्चि: भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 354A(1)(iv)—जो किसी महिला के प्रति कामुक या यौन संकेत वाली टिप्पणियां करने (Making Sexually Coloured Remarks) को यौन उत्पीड़न का अपराध मानती है—के अनिवार्य वैधानिक तत्वों, सामान्य अभद्र भाषा या गाली-गलौज (General Abuse) और यौन टिप्पणियों के बीच विधिक भेद, तथा CrPC की धारा 482 / BNSS की धारा 528 के तहत उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों के दायरे पर केरल हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय दिया है।

न्यायमूर्ति जोबिन सेबेस्टियन की एकल पीठ ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) अदालत के समक्ष लंबित अंतिम रिपोर्ट और कार्यवाहियों को रद्द करने की मांग वाली याचिका पर आंशिक राहत प्रदान करते हुए यह फैसला सुनाया। उच्च न्यायालय ने आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 354A(1)(iv) की कार्यवाही को रद्द कर दिया, जबकि सार्वजनिक स्थान पर गाली-गलौज, फरसे से धमकाने और महिला की लज्जा का अनादर करने से संबंधित धारा 294(b), 506(ii) और 509 IPC के तहत आपराधिक विचारण (Trial) को जारी रखने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल अश्लील शब्दों का उच्चारण अपने आप में IPC की धारा 354A(1)(iv) का अपराध नहीं बनाता, जब तक कि विशिष्ट रूप से महिला के विरुद्ध यौन संकेत वाली टिप्पणियां करने का ठोस आरोप न हो।

उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. धारा 354A(1)(iv) IPC के लिए ‘यौन संकेत’ (Sexually Coloured Remarks) अनिवार्य

न्यायमूर्ति जोबिन सेबेस्टियन ने धारा 354A(1)(iv) के दायरे का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट सिद्धांत प्रतिपादित किया: “केवल अश्लील शब्दों का उच्चारण (Mere utterance of obscene words) अपने आप में, स्वतः IPC की धारा 354A(1)(iv) के तहत अपराध को आकर्षित नहीं करता। शिकायतकर्ता के विरुद्ध यह विशिष्ट आरोप होना अनिवार्य है कि अभियुक्त ने उसके प्रति कामुक या यौन संकेत वाली टिप्पणियां (Sexually coloured remarks) की थीं। किसी महिला के प्रति की गई सामान्य गाली-गलौज (General abuse directed at a woman) अपने आप में IPC की धारा 354A(1)(iv) के तहत अपराध का गठन नहीं करती।”

2. धारा 509 IPC: महिला की लज्जा का अनादर करने का आशय आवश्यक

अदालत ने धारा 509 (महिला की लज्जा का अनादर करने के आशय से शब्द या अंगविक्षेप) के तत्वों पर विचार करते हुए रेखांकित किया:

  • “किसी महिला के विरुद्ध केवल गंदी भाषा का प्रयोग करना, बिना उसकी लज्जा का अनादर करने के आशय के, IPC की धारा 509 के तहत अपराध बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है।”
  • धारा 509 को आकर्षित करने के लिए यह स्थापित होना आवश्यक है कि आरोपी ने महिला की लज्जा (Modesty) का अनादर करने के विशिष्ट इरादे से कोई शब्द कहा, ध्वनि निकाली या हाव-भाव प्रदर्शित किया।
  • अदालत ने माना कि आरोपी का ऐसा कोई आशय था या नहीं, यह साक्ष्य का विषय है जिसका निर्धारण केवल विचारण (Trial) के बाद ही किया जा सकता है।

3. फरसे से धमकाने पर धारा 506 IPC (आपराधिक अभित्रास) प्रथम दृष्टया सिद्ध:

  • प्रथम सूचना विवरण (FIS) में यह स्पष्ट आरोप दर्ज था कि आरोपी अपने हाथ में फरसा (Machete) लेकर आया और उसने शिकायतकर्ता तथा अन्य व्यक्ति को जान से मारने की धमकी दी।
  • अदालत ने माना कि यह तथ्य प्रथम दृष्टया IPC की धारा 506 (आपराधिक धमकी) के आवश्यक तत्वों को पूरी तरह संतुष्ट करता है, अतः इसे रद्द नहीं किया जा सकता।

4. धारा 294(b) IPC (सार्वजनिक स्थान पर अश्लील कृत्य/शब्द) का परीक्षण ट्रायल में होगा:

  • पीठ ने कहा कि यह आरोप रिकॉर्ड पर है कि आरोपी ने सार्वजनिक सड़क पर खड़े होकर गंदी भाषा का प्रयोग किया था।
  • यह तथ्य कि क्या उन शब्दों में सुनने वालों के मन में कामुक विचार पैदा करने की क्षमता थी अथवा वे वास्तव में अश्लील थे, इसका अंतिम निर्धारण केवल गवाहों के परीक्षण और विचारण के उपरांत ही संभव है।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि

  • विवाद की शुरुआत: अभियोजन पक्ष के अनुसार, पूर्व रंजिश के चलते आरोपी ने एक मंदिर परिसर में एक व्यक्ति के साथ अभद्र भाषा में गाली-गलौज की।
  • घटना: जब वास्तविक शिकायतकर्ता (महिला) और एक अन्य व्यक्ति ने बाद में आरोपी के घर के सामने सार्वजनिक सड़क पर उससे इस बारे में पूछताछ की, तो आरोपी ने कथित तौर पर उनके साथ गाली-गलौज की, आपत्तिजनक शब्द कहे और फरसा दिखाते हुए उन्हें जान से मारने की धमकी दी।
  • याचिकाकर्ता की दलील: आरोपी ने CrPC की धारा 482 / BNSS की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट का रुख किया और तर्क दिया कि यदि प्राथमिक सूचना रिपोर्ट के सभी आरोपों को पूर्णतः सच भी मान लिया जाए, तब भी उनमें कथित धाराओं के अनिवार्य तत्व पूरे नहीं होते।
  • राज्य का विरोध: लोक अभियोजक ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि महिला और उसकी बेटी के प्रति अभद्र शब्दों का प्रयोग और फरसे से जान से मारने की धमकी प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध दर्शाती है।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?

  • BNSS धारा 528 / CrPC धारा 482 का दायरा (अदालत मिनी-ट्रायल नहीं चला सकती):
    • उच्च न्यायालय ने दोहराया कि प्राथमिकी या चार्जशीट को रद्द करने के स्तर पर अदालत साक्ष्यों का सूक्ष्म मूल्यांकन (Meticulous examination of evidence) नहीं करती और न ही ‘मिनी-ट्रायल’ चला सकती है। अदालत को केवल यह देखना होता है कि क्या आरोपों के साधारण पठन से अपराध के बुनियादी तत्व बनते हैं या नहीं।
  • धारा 354A(1)(iv) IPC बनाम धारा 294(b) व 509 IPC का तुलनात्मक विश्लेषण:
विधिक धाराअपराध की मूल प्रकृतिप्रमुख आवश्यक तत्वअदालत का निष्कर्ष
धारा 354A(1)(iv) IPCयौन उत्पीड़न (कामुक टिप्पणी)स्पष्ट रूप से यौन/कामुक संदर्भ (Sexually Coloured) वाली टिप्पणी होना अनिवार्य। सामान्य गाली काफी नहीं।रद्द (Quashed): सामान्य गाली-गलौज से यह धारा नहीं बनती।
धारा 294(b) IPCसार्वजनिक अश्लीलतासार्वजनिक स्थान पर अश्लील शब्दों का उच्चारण जिससे दूसरों को क्षोभ (Annoyance) हो।ट्रायल जारी रहेगा: शब्दों की अश्लीलता का परीक्षण ट्रायल कोर्ट करेगा।
धारा 509 IPCमहिला की लज्जा का अनादरमहिला की लज्जा का अनादर करने का विशिष्ट आपराधिक आशय (Intention to insult modesty)।ट्रायल जारी रहेगा: आशय का निर्धारण साक्ष्य के आधार पर होगा।
धारा 506(ii) IPCआपराधिक अभित्रास (धमकी)जान से मारने या गंभीर चोट पहुंचाने की धमकी (यहां फरसा दिखाकर दी गई धमकी)।ट्रायल जारी रहेगा: प्रथम दृष्टया सामग्री मौजूद।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: आपराधिक विविध याचिका (Crl.M.C.) [केरल उच्च न्यायालय]
  • पीठ: न्यायमूर्ति जोबिन सेबेस्टियन (एकल पीठ)
  • निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ता (आरोपी) की ओर से: अधिवक्ता एस. शबरीनाथ
    • राज्य (अभियोजन) की ओर से: लोक अभियोजक (PP) वी.आर. रामलाल
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
    • भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धाराएं 354A(1)(iv), 294(b), 506(ii) एवं 509
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 / दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 482
  • अंतिम परिणाम: याचिका आंशिक रूप से स्वीकार; धारा 354A(1)(iv) IPC के तहत कार्यवाही रद्द; धारा 294(b), 506(ii) और 509 IPC के तहत मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत के समक्ष मुकदमा जारी रहेगा।

Public Obscenity:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकेरल उच्च न्यायालय (न्यायमूर्ति जोबिन सेबेस्टियन)
याचिकाकर्तामामले का एकमात्र अभियुक्त (जिसने CrPC 482 / BNSS 528 के तहत अर्जी दी)
विवादित धाराएंIPC धारा 354A(1)(iv), 294(b), 506(ii) और 509
कोर्ट का आदेश354A(1)(iv) के तहत कार्यवाही रद्द; धारा 294(b), 506(ii) और 509 के तहत मुकदमा चलेगा।
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