Saturday, October 31, 2026
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Railway Compensation: चलती ट्रेन में ऊपरी बर्थ से नीचे गिरना भी अप्रिय घटनाके दायरे में; कानून यह अनिवार्य नहीं करता कि यात्री ट्रेन के बाहर ही गिरे

हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क

  • ट्रेन के अंदर गिरना भी “अप्रिय घटना”: कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसले को खारिज करते हुए कहा कि कानून में ऐसा कहीं नहीं लिखा है कि अप्रिय घटना केवल ट्रेन से बाहर गिरने पर ही मानी जाएगी:“चलती ट्रेन के अंदर ऊपरी बर्थ से मृतक की आकस्मिक गिरावट अधिनियम की धारा 123(c)(2) के तहत एक ‘अप्रिय घटना’ बनाती है। ट्रिब्यूनल केवल चिकित्सा कारण (Cause of Death) के आधार पर यह निर्णय देकर साक्ष्यों का सही मूल्यांकन करने में विफल रहा।” — दिल्ली हाईकोर्ट
  • पूर्व निर्णय का संदर्भ (Triveni Case): अदालत ने Union of India v. Triveni (2014) मामले में स्थापित मिसाल का हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि यात्री का गिरना एक अप्रिय घटना है और धारा 123(c)(2) की यह आवश्यकता नहीं है कि यात्री ट्रेन से बाहर ही गिरे।
  • पूर्व बीमारी के साक्ष्य का अभाव: हाईकोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई चिकित्सा या दस्तावेजी प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि मृतक को पहले से कोई दिल/कार्डिएक की बीमारी थी।

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने रेलवे दावा न्यायाधिकरण अधिनियम, 1987 (RCT Act) और रेलवे अधिनियम, 1989 के तहत रेल दुर्घटनाओं में मुआवजे और “अप्रिय घटना” (Untoward Incident) के दायरे को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी विधिक व्यवस्था दी है।

न्यायमूर्ति मनोज कुमार ओहरी की एकल पीठ ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल (RCT), दिल्ली के उस आदेश को निरस्त कर दिया जिसमें केवल “मायोकार्डियल इन्फार्कशन” (दिल का दौरा) को मौत का कारण मानकर मुआवजे का दावा खारिज कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने मामले को ट्रिब्यूनल को वापस भेजते हुए (Remand back) दो माह के भीतर कानूनन देय मुआवजे का निर्धारण और वितरण सुनिश्चित करने का आदेश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया है कि चलती ट्रेन के भीतर ऊपरी बर्थ (Upper Berth) से अचानक झटका लगने पर नीचे गिरना धारा 123(c)(2) के तहत एक ‘अप्रिय घटना’ मानी जाएगी। कोर्ट ने व्यवस्था दी कि कानून में ऐसा कोई प्रावधान या अनिवार्यता नहीं है कि यात्री का गिरना अनिवार्य रूप से ट्रेन के बाहर ही होना चाहिए।

उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां

1. चलती ट्रेन के अंदर ऊपरी बर्थ से गिरना ‘अप्रिय घटना’ रेलवे अधिनियम की धारा 123(c)(2) के प्रावधानों और साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए न्यायमूर्ति मनोज कुमार ओहरी ने कहा: “चलती ट्रेन के अंदर ऊपरी बर्थ से मृतक का दुर्घटनावश गिरना अधिनियम की धारा 123(c)(2) के अर्थ के भीतर एक ‘अप्रिय घटना’ (Untoward Incident) का निर्माण करता है। न्यायाधिकरण (Tribunal) ने केवल मृत्यु के चिकित्सीय कारण के आधार पर यह मानकर कि कोई अप्रिय घटना घटित नहीं हुई थी, रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों का उचित परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन करने में गंभीर विफलता दिखाई है।”

2. त्रिवेणी बनाम उत्तर रेलवे (2014) सिद्धांत की पुष्टि

  • दिल्ली हाईकोर्ट ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम त्रिवेणी (2014) के नजीर फैसले का हवाला देते हुए दोहराया:
    • ट्रेन से यात्री का गिरना एक अप्रिय घटना है।
    • धारा 123(c)(2) के तहत ऐसी कोई कानूनी शर्त नहीं है कि यात्री का गिरना ट्रेन के बाहर ही होना चाहिए; ट्रेन के डिब्बे के अंदर दुर्घटनावश गिरना भी कानून के समान संरक्षण का हकदार है।

3. पूर्व हृदय रोग का कोई साक्ष्य नहीं

  • अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई चिकित्सीय या दस्तावेजी साक्ष्य नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि मृतक पहले से किसी हृदय रोग (Pre-existing Cardiac Ailment) से पीड़ित था। ऊपरी बर्थ से अप्रत्याशित झटके के कारण गिरना और अचेत होना ही घटना का मूल कारण था।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (इटावा से आगरा कैंट यात्रा)

  • वैध यात्री (Bona Fide Passenger): मृतक संजीव कुमार अपने पिता के साथ वैध द्वितीय श्रेणी यात्रा टिकट पर इटावा से आगरा कैंट की यात्रा कर रहे थे। ट्रिब्यूनल और रेलवे दोनों ने उनके वैध यात्री होने पर कोई विवाद नहीं किया।
  • दुर्घटना का क्रम: यात्रा के दौरान संजीव कुमार ऊपरी बर्थ पर थे। चलती ट्रेन में अचानक लगे जोरदार झटके के कारण वे नीचे गिर पड़े और अचेत हो गए।
  • मृत्यु व मेडिकल रिपोर्ट: बाद में रेलवे डॉक्टर ने उनकी जांच की और उन्हें मृत घोषित कर दिया। पोस्टमार्टम/मेडिकल राय में मौत का कारण मायोकार्डियल इन्फार्कशन (हार्ट अटैक) दर्ज किया गया था।
  • ट्रिब्यूनल द्वारा दावा खारिज: रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल ने यह कहते हुए मुआवजा याचिका खारिज कर दी थी कि यह ट्रेन दुर्घटना या अप्रिय घटना नहीं बल्कि प्राकृतिक मृत्यु का मामला था। इसके खिलाफ पीड़ित परिवार ने हाईकोर्ट में अपील (धारा 23, RCT Act) दायर की।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

  1. अपील स्वीकार: उच्च न्यायालय ने ट्रिब्यूनल के खारिज करने के आदेश को अनुचित पाते हुए रद्द कर दिया।
  2. मुआवजा निर्धारण का निर्देश: मामले को पुनः रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल के पास भेजते हुए निर्देश दिया गया कि वह कानून के अनुसार देय मुआवजे की राशि का निर्धारण करे और संबंधित रेलवे प्राधिकारियों को आदेश की प्रति मिलने के 2 माह के भीतर मुआवजा राशि वितरित करने का निर्देश दे।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: रेलवे दावा अपील (रेलवे दावा न्यायाधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 23 के तहत)
  • प्रासंगिक कानून: रेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 123(c)(2) एवं धारा 124A (सख्त दायित्व / Strict Liability Principle); रेलवे दावा न्यायाधिकरण अधिनियम, 1987
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • अपीलकर्ता (मृतक के परिजन) की ओर से: अधिवक्ता राजन सूद
    • प्रतिवादी (रेलवे / केंद्र सरकार) की ओर से: केंद्र सरकार के स्थायी वकील (CGSC) भगवान स्वरूप शुक्ला
  • पीठ: न्यायमूर्ति मनोज कुमार ओहरी (दिल्ली उच्च न्यायालय)

Railway Compensation: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति मनोज कुमार ओहरी (Justice Manoj Kumar Ohri)
संबंधित कानूनरेलवे अधिनियम, 1989 की धारा 123(c)(2) व रेलवे दावा अधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 23
मुख्य मुद्दाक्या चलती ट्रेन के अंदर बर्थ से गिरना “अप्रिय घटना” है और क्या इसके लिए मुआवजा दिया जाना चाहिए?
अदालत का फैसलाअपील स्वीकार; ट्रेन के अंदर गिरना ‘अप्रिय घटना’ है। ट्रिब्यूनल को 2 महीने के भीतर मुआवजे का निर्धारण कर भुगतान का निर्देश दिया।
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