Real Estate Row: गुड़गांव के आरडी सिटी (ARDEE City) प्रोजेक्ट में फ्लैट की बुकिंग के 22 साल बाद राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) ने खरीदारों के पक्ष में एक बड़ा और कड़ा फैसला सुनाया है।
कोर्ट के जस्टिस ए. पी. साही (अध्यक्ष) और भरतकुमार पंड्या की बेंच ने दिल्ली राज्य आयोग के 2015 के आदेश में सुधार करते हुए ब्याज दर को 10% से बढ़ाकर 18% कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि खरीदार 2006 से ही जायज कब्जे का इंतजार कर रहे हैं। आयोग ने बिल्डर की भारी लापरवाही को देखते हुए रिफंड की राशि पर 18% सालाना ब्याज देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने माना कि बिना कानूनी मालिकाना हक (Legal Title) और ‘ऑक्युपेंसी सर्टिफिकेट’ के फ्लैट का कब्जा देना ‘अर्थहीन’ है।
मामला क्या था? (A Booking from 2004)
- बुकिंग: प्रियाजीत संधू और करण संधू ने 5 अप्रैल 2004 को गुड़गांव के आरडी सिटी में एक फ्लैट बुक किया था।
- भुगतान: खरीदारों ने उसी समय लगभग पूरी रकम 26.96 लाख रुपये चुका दी थी।
- वादा: बिल्डर ने 30 महीने (2006 तक) में कब्जा देने का वादा किया था, जो कभी पूरा नहीं हुआ।
बिल्डर की दलीलें और हकीकत (Builder’s Defense vs Reality)
- बिल्डर (ARDEE Infrastructure) ने कोर्ट में खुद को बचाने के लिए कई तर्क दिए, लेकिन खुद ही अपनी कमियां भी स्वीकार कीं।
- दावा: बिल्डर ने कहा कि उन्होंने 2006 में ही कब्जे की पेशकश की थी, लेकिन खरीदारों ने बकाया भुगतान नहीं किया।
- हकीकत: बिल्डर ने माना कि उनके प्रोजेक्ट का लाइसेंस रद्द हो चुका था और उनके पास ‘ऑक्युपेंसी सर्टिफिकेट’ (OC) भी नहीं था।
- विवादित ऑफर: बिल्डर ने “जैसा है, जहाँ है” (As is where is) के आधार पर कब्जा देने की बात कही थी, जिसका मतलब था कि वे स्पष्ट मालिकाना हक (Clear Title) की गारंटी नहीं दे सकते थे।
कोर्ट का फैसला: रिफंड ही एकमात्र रास्ता
- NCDRC ने माना कि अब फ्लैट का कब्जा पाना कानूनी रूप से संभव नहीं है।
- कानूनी वैधता: कोर्ट ने कहा, “बिना लीगल टाइटल या रेगुलेटरी मंजूरी के कब्जा देना कोई राहत नहीं है। ऐसे फ्लैट में रहने का कोई मतलब नहीं जहाँ आपके पास मालिकाना हक न हो।”
- ब्याज में बढ़ोतरी: खरीदारों द्वारा निवेश की गई बड़ी रकम और 20 साल के लंबे इंतजार को देखते हुए ब्याज दर को 18% कर दिया गया।
- अंतिम चेतावनी: यदि बिल्डर 3 महीने के भीतर भुगतान नहीं करता है, तो ब्याज दर बढ़कर 21% हो जाएगी।
Timeline of the 22-Year Struggle
| वर्ष | घटना | स्थिति |
|---|---|---|
| 2004 | फ्लैट बुकिंग | 27 लाख रुपये का भुगतान किया गया। |
| 2006 | पजेशन की डेडलाइन | बिल्डर फ्लैट देने में विफल रहा। |
| 2012 | कंज्यूमर कोर्ट | खरीदारों ने दिल्ली राज्य आयोग में केस किया। |
| 2015 | राज्य आयोग का आदेश | 10% ब्याज के साथ रिफंड का आदेश। |
| 2026 | NCDRC का फैसला | ब्याज बढ़ाकर 18% किया गया। |
कानूनी महत्व: कब रिफंड कब्जे से बेहतर है?
यह फैसला रियल एस्टेट कानून के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत को पुख्ता करता है। जब प्रोजेक्ट कानूनी विवादों में फंसा हो या बिल्डर के पास जरूरी सर्टिफिकेट न हों, तो रिफंड ही सबसे अच्छा समाधान है। उपभोक्ता फोरम महंगाई और अवसर की हानि (Loss of Opportunity) की भरपाई के लिए ब्याज दर बढ़ा सकते हैं।
निष्कर्ष: बिल्डरों के लिए सख्त संदेश
NCDRC का यह फैसला उन बिल्डरों के लिए चेतावनी है जो पैसे लेकर सालों तक प्रोजेक्ट लटकाए रखते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया कि केवल ढांचा खड़ा कर देना ‘कब्जा’ नहीं कहलाता; जब तक कागजात पूरे न हों, बिल्डर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता।

