Religious Personal Laws: सुप्रीम कोर्ट गैर-पारसी व्यक्ति से शादी करने वाली एक पारसी महिला की याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया है।
मामले में अंतरिम आदेश पारित संभव
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने संकेत दिया है कि वह इस मामले में अंतरिम आदेश (Interim Order) पारित कर सकती है। इस याचिका में मांग की गई है कि नागपुर पारसी पंचायत को निर्देश दिया जाए कि वह दूसरे धर्म में शादी करने के बाद भी पारसी महिलाओं के साथ पुरुषों के समान ही बराबरी का व्यवहार करे।
मामला क्या है? (Factual Background)
याचिकाकर्ता: यह याचिका दीना बुधराजा नाम की एक पारसी महिला ने दायर की है, जिन्होंने अपना धर्म बदले बिना एक हिंदू पुरुष से शादी की है।
घटना: साल 2024 में दीना बुधराजा को उनकी दादी के अंतिम संस्कार (Funeral) के समय नागपुर की अगियारी (पारसी अग्नि मंदिर – Zoroastrian Fire Temple) में प्रवेश करने से रोक दिया गया था।
अदालत से गुहार: महिला के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने कोर्ट से अंतरिम राहत की मांग की है ताकि याचिकाकर्ता को अपने किसी करीबी के निधन पर नागपुर अगियारी में प्रार्थना करने और समय-समय पर होने वाली ‘मुक्ताद प्रार्थनाओं’ (Muktad Prayers) में शामिल होने की अनुमति दी जाए।
विवाद का मुख्य कानूनी बिंदु (The Constitutional Challenge)
संवैधानिक वैधता को चुनौती: दीना बुधराजा ने अपने वकील रोहित अनिल राठी के माध्यम से दायर इस याचिका में नागपुर पारसी पंचायत के संविधान के नियम 5(2) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है।
भेदभावपूर्ण नियम 5(2): महिलाओं पर प्रतिबंध: इस नियम के तहत यदि कोई पारसी महिला किसी गैर-पारसी पुरुष से शादी करती है, तो उससे उसकी धार्मिक पहचान छीन ली जाती है और अगियारी जैसे धार्मिक स्थलों में उसका प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया जाता है।
पुरुषों को छूट: यह नियम उन पारसी पुरुषों पर लागू नहीं होता जो किसी दूसरे धर्म की महिला से शादी करते हैं। उन्हें समाज और धार्मिक स्थलों में सभी अधिकार मिलते रहते हैं।
संवैधानिक उल्लंघन की दलील
याचिका में कहा गया है कि यह नियम पूरी तरह से लैंगिक भेदभाव (Gender Discrimination) पर आधारित है और भारत के संविधान के इन अनुच्छेदों का उल्लंघन करता है, जिसमें अनुच्छेद 14 के तहत कानून के समक्ष समानता का अधिकार, अनुच्छेद 21 के जीवन और व्यक्तिगत गरिमा का अधिकार, अनुच्छेद 25 के धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और रुख
सुनवाई की शुरुआत में चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने ध्यान दिलाया कि एक 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ (Nine-judge bench) ने हाल ही में सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धर्मों में महिलाओं के साथ होने वाले कथित भेदभाव से जुड़े बड़े संवैधानिक सवालों पर अपना फैसला सुरक्षित (Verdict Reserved) रखा है। सीजेआई ने सुझाव दिया कि इस मामले के नतीजे का इंतजार किया जाना चाहिए। हालांकि, जब वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने इस विशिष्ट मामले में तात्कालिक परिस्थितियों को देखते हुए अंतरिम राहत के लिए जोर दिया, तो सीजेआई ने कहा, पारसी महिला बनाम पारसी पुरुष के अधिकारों से जुड़े इस मामले पर हमारे सामने पहले भी बहस हो चुकी है। इसके बाद, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने नागपुर पारसी पंचायत के वकील को निर्देश दिया कि वे इस मामले में अंतरिम व्यवस्था (Interim Arrangement) करने के लिए अपनी संस्था से निर्देश (Instructions) प्राप्त करें, ताकि महिला को प्रार्थना का अधिकार मिल सके।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी पैरामीटर | विवरण |
| सुप्रीम कोर्ट बेंच | चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची, जस्टिस विपुल एम. पंचोली |
| याचिकाकर्ता | दीना बुधराजा (Dina Budhraja) |
| मुख्य विपक्षी दल | नागपुर पारसी पंचायत और केंद्र सरकार (अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय) |
| चुनौतीपूर्ण नियम | नागपुर पारसी पंचायत के संविधान का नियम 5(2) |
| अगली सुनवाई की तिथि | शुक्रवार, 29 मई 2026 |
निष्कर्ष (Takeaway)
यह मामला धार्मिक पर्सनल लॉ (Religious Personal Laws) और लैंगिक समानता (Gender Equality) के बीच के टकराव का एक और बड़ा उदाहरण है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 23 मार्च को इस मामले में केंद्र सरकार, महाराष्ट्र सरकार और चैरिटी कमिश्नर को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। कोर्ट का यह रुख साफ करता है कि आस्था और परंपराओं के नाम पर पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग कानूनी मापदंड नहीं हो सकते, विशेषकर तब जब बात मौलिक अधिकारों की हो।

