Friday, October 16, 2026
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Scam Case: सरकारी नौकरी का झांसा देकर ₹5.3 करोड़ ठगी करने वाले बाप-बेटी…गले-गले तक फर्जीवाड़ा है, आप हमसे राहत पाने की उम्मीद छोड़ दें

Scam Case: सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर करोड़ों रुपये का महा-घोटाला करने वाले बाप-बेटी को कर्नाटक हाईकोर्ट से करारा झटका लगा है।

आरोपी के खिलाफ दर्ज केस रद्द नहीं हो सकता

हाईकोर्ट के जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने मामले को पूरी तरह एक ‘फिल्मी मसाला’ (Classic Potboiler) करार देते हुए आरोपियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमे (FIR) को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया। “फर्जी जॉइनिंग लेटर, जाली सरकारी ईमेल आईडी, फर्जी सरकारी विभाग और नकली ट्रेनिंग सेंटर खोलकर मासूम और सीधे-साधे बेरोजगार युवाओं की जिंदगी से खेलने वालों को यह कोर्ट अपनी सुरक्षा का हाथ नहीं दे सकता। यह पूरा मामला सिर से पैर तक केवल और केवल झूठ (Fake in uno, fake in omnibus) पर टिका है।

फर्जीवाड़ा का ‘मॉडस ऑपरेंडी’: ऐसे बुना ठगी का जाल

अभियोजन पक्ष (Prosecution) के अनुसार, आरोपी शमशाद बेगम और उसके पिता एम.ए. मंसूर अहमद ने बेरोजगार युवाओं को शिकार बनाने के लिए एक बेहद सुनियोजित साजिश (Well-orchestrated scheme) रची थी।

कोर्ट रूम ड्रामा: वकीलों की दलीलें और कोर्ट का हंटर

सरकारी नौकरी का लालच और वीआईपी छवि:पहला चरण.

आरोपियों ने खुद को सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी का बड़ा नेता बताकर लोगों पर अपना रसूख जमाया और विभिन्न सरकारी विभागों में पक्की नौकरी लगवाने का भरोसा दिया।

करोड़ों रुपये का ऑनलाइन ट्रांसफर:दूसरा चरण.

झांसे में आए बेरोजगार युवाओं से आरोपियों ने अलग-अलग किस्तों में कुल ₹5.3 करोड़ की भारी-भरकम राशि ऑनलाइन बैंक खातों में ट्रांसफर करवा ली।

फर्जी ईमेल और जाली जॉइनिंग लेटर:तीसरा चरण.

विश्वास जीतने के लिए उन्होंने जाली सरकारी ईमेल आईडी बनाईं और पीड़ितों को फर्जी जॉइनिंग लेटर (Appointment Orders) भेज दिए, जो देखने में बिल्कुल असली लगते थे।

कोलकाता-महाराष्ट्र में नकली ट्रेनिंग:चौथा चरण.

हद तो तब हो गई जब आरोपियों ने बकायदा नकली सरकारी विभाग बनाकर इन युवाओं को ट्रेनिंग के नाम पर कोलकाता और महाराष्ट्र भेज दिया। वहां पहुंचने पर पीड़ितों को एहसास हुआ कि पूरी ट्रेनिंग और विभाग काल्पनिक (Fictitious) थे।

कोर्ट रूम ड्रामा: वकीलों की दलीलें और कोर्ट का हंटर

सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस हुई।

आरोपियों के वकील का तर्क: वरिष्ठ अधिवक्ता एम.टी. नानाया ने दलील दी कि जिस व्यक्ति ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है, वह खुद इस नौकरी घोटाले का पीड़ित नहीं है। उन्होंने दावा किया कि आरोपियों ने शिकायतकर्ता के खिलाफ पहले चेक बाउंस (Section 138 NI Act) का केस दर्ज कराया था, जिसके बदले की भावना से यह फर्जी एफआईआर दर्ज कराई गई है।

सरकारी वकील का पलटवार: विशेष लोक अभियोजक (SPP) बी.एन. जगदीश ने पुरजोर विरोध करते हुए कहा कि जांच में करीब ₹5.3 करोड़ के अवैध लेन-देन के पुख्ता सबूत मिले हैं। आरोपियों ने फर्जी दस्तावेजों और राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल कर दर्जनों युवाओं का भविष्य बर्बाद किया है।

हाई कोर्ट का फैसला: जस्टिस नागप्रसन्ना ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि यदि यह केवल नौकरी लगवाने के वादे का मामूली मामला होता, तो बात अलग थी। लेकिन यहां सरकारी विभागों के नाम पर जाली ईमेल, फर्जी दस्तावेज तैयार करना और देश के अलग-अलग कोनों में नकली ट्रेनिंग आयोजित करना एक बड़ी और गहरी आपराधिक साजिश (Larger Conspiracy) को दर्शाता है। इसलिए इस मामले में पूरी जांच होना अनिवार्य है।

विधिक केस शीट: कर्नाटक हाई कोर्ट जॉब रैकेट केस (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान रिकॉर्ड
संबंधित अदालतकर्नाटक उच्च न्यायालय (High Court of Karnataka)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस एम. नागप्रसन्ना (Justice M Nagaprasanna)
मुख्य आरोपीशमशाद बेगम और उनके पिता एम.ए. मंसूर अहमद
कुल ठगी की राशिलगभग ₹5.3 करोड़ (ऑनलाइन बैंक ट्रांसफर)
दर्ज आपराधिक धाराएंआईपीसी की धारा 120B (साजिश), 420 (धोखाधड़ी), 468, 471 (जालसाजी) व अन्य
अदालत का अंतिम आदेशएफआईआर रद्द करने की याचिका खारिज; पुलिस जांच जारी रहेगी।

अदालत ने साफ कर दिया कि जब देश के युवाओं के भविष्य और सरकारी साख के साथ ऐसा खिलवाड़ हो, तो तकनीकी कानूनी कमियों (जैसे कि शिकायतकर्ता पीड़ित है या नहीं) का हवाला देकर अपराधियों को कोई सुरक्षा कवच नहीं दिया जा सकता।

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