Saturday, August 15, 2026
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State vs Media: सरकार को माता-पिता की तरह धैर्य दिखाना चाहिए…इस मानहानि केस में आंध्र प्रदेश HC की टिप्पणी

State vs Media:आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट का यह फैसला प्रेस की स्वतंत्रता और राज्य की आलोचना के अधिकार पर एक मील का पत्थर माना जा रहा है।

हाई कोर्ट ने राज्य की भूमिका को परिभाषित किया

हाईकोर्ट के जस्टिस वाई. लक्ष्मण राव ने राज्य की एक स्थानीय मीडिया संस्था और उसके निदेशकों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मानहानि (Criminal Defamation) के मामलों को खारिज करते हुए निचली अदालत के आदेश को न्याय का मज़ाक बताया। कोर्ट ने राज्य सरकार की तुलना एक ‘अभिभावक’ (Parent) से करते हुए उसे अपने नागरिकों और मीडिया के प्रति अधिक धैर्यवान और परिपक्व होने की सलाह दी है। हाई कोर्ट ने राज्य की भूमिका को परिभाषित किया।

कोर्ट की प्रेरक टिप्पणी: “राज्य एक अभिभावक है”

  • अदालत ने मानहानि और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच की रेखा स्पष्ट की।
  • धैर्य और सहनशीलता: “राज्य अपने नागरिकों के लिए माता-पिता की तरह है। जैसे माता-पिता अपने बच्चों की कड़वी बातों पर उन्हें घर से नहीं निकालते, वैसे ही राज्य को तीखी आलोचना पर ‘आवेगी’ (Impulsive) होकर मुकदमे दर्ज नहीं करने चाहिए।”
  • बदले की भावना: कोर्ट ने चेतावनी दी कि सोशल मीडिया के इस दौर में आलोचना बहुत आम है। मानहानि कानून का अंधाधुंध उपयोग अदालतों में राजनीतिक प्रतिशोध (Vindictive cases) की बाढ़ ला देगा, जो कानून की मंशा के खिलाफ है।

मामला क्या था? (The Dispute)

  • याचिका: मीडिया हाउस ने 2023 के सेशन कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें 2020 से 2023 के बीच प्रकाशित खबरों पर मानहानि का संज्ञान लिया गया था।
  • खबरें: इन रिपोर्ट्स में आंध्र प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (APSRTC) की कथित गिरावट, न्यायपालिका पर निगरानी के दावे और प्रधानमंत्री व पूर्व मुख्यमंत्री की मुलाकात से जुड़ी खबरें शामिल थीं।

हाई कोर्ट की मुख्य कानूनी फाइंडिंग्स (Key Findings)

विषयकोर्ट का रुख
सरकार की मानहानिसरकार की मानहानि नहीं हो सकती, जब तक कि किसी विशिष्ट अधिकारी को झूठे और दुर्भावनापूर्ण तरीके से निशाना न बनाया जाए।
मीडिया का अधिकारमीडिया शासन की आलोचना करने और सत्ता से सवाल पूछने का संवैधानिक हकदार है। यह अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत सुरक्षित है।
प्रक्रियात्मक उल्लंघननिचली अदालत ने बिना शिकायतकर्ता का परीक्षण किए और बिना दिमाग लगाए (Mechanical approach) संज्ञान लिया, जो अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है।
तकनीकी खामीशिकायतकर्ता ने अखबार के पूरे संस्करण पेश नहीं किए (केवल कटिंग दी), जिससे ‘प्रेस एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ बुक्स एक्ट, 2023’ के तहत संपादक की पहचान और जवाबदेही तय नहीं की जा सकती।

चिलिंग इफेक्ट पर चिंता

कोर्ट ने कहा कि जनहित के मामलों में तथ्यपरक रिपोर्टिंग करने वाले मीडिया हाउसों के खिलाफ “प्रतिष्ठा बचाने” के बहाने आपराधिक कार्यवाही शुरू करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक ‘चिलिंग इफेक्ट’ (Chilling Effect) पैदा करता है, जिससे लोग सच बोलने से डरने लगते हैं।

निष्कर्ष: लोकतांत्रिक विमर्श की जीत

यह फैसला साफ करता है कि सरकारी नीतियों और सार्वजनिक निगमों (जैसे APSRTC) के कामकाज पर टिप्पणी करना लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा है। राज्य को आलोचना को ‘अपराध’ के बजाय ‘सुधार के अवसर’ के रूप में देखना चाहिए।

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