Testimony Truth: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, गवाह की संख्या नहीं, बल्कि उसकी विश्वसनीयता ज्यादा अहम होती है।
गवाही विरोधाभासी हाे ताे उसे खारिज कर सकते हैं
एक आपराधिक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अगर किसी मामले में केवल एक गवाह है और उसकी गवाही पूरी तरह भरोसेमंद है, तो कोर्ट उसी के आधार पर आरोपी को दोषी ठहरा सकता है या बरी कर सकता है। सीजेआई बीआर गवई व के विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा कि अगर गवाह की गवाही में कोई संदेह, स्वार्थ, या झूठ की आशंका नहीं है, तो उस पर भरोसा किया जा सकता है। लेकिन अगर गवाह की गवाही विरोधाभासी है या उसने जांच के दौरान दिए गए बयान से अलग कुछ कहा है, तो उसकी गवाही को खारिज किया जाना चाहिए।
पति से झगड़े के बाद मां ने दो मासूम बच्चों को तालाब में डुबोया, उम्रकैद की सजा
11 अक्टूबर 2003 को दुर्ग में एक महिला ने अपने दो मासूम बच्चों को तालाब में डुबोकर मार डाला। चश्मदीद संतोष कुमार पांडे, जो पास में ही बीटल की दुकान चलाते हैं, ने महिला को बच्चों के साथ तालाब की ओर जाते देखा। महिला की हालत देखकर उन्हें शक हुआ। उन्होंने पास के एक रिक्शा चालक से कहा कि वह जाकर देखे कि महिला कहां जा रही है। करीब 5-7 मिनट बाद रिक्शा चालक लौटा और बताया कि दो बच्चे पानी में तैरते दिखे हैं। इसके बाद संतोष ने देखा कि महिला रेलवे ट्रैक की ओर जा रही है। उन्होंने एक बाइक सवार से मदद ली और महिला के पीछे गए। जब वे पहुंचे, तो देखा कि एक ट्रेन महिला की ओर आ रही थी। संतोष ने समय रहते महिला को ट्रैक से खींचकर बचा लिया। जब संतोष ने महिला से पूछा कि उसने बच्चों को क्यों मारा, तो उसने बताया कि उसका अपने पति से झगड़ा चल रहा था। संतोष ने तुरंत पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने पंचनामा दर्ज किया और फिर एफआईआर दर्ज की गई।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में डूबने से मौत
बच्चों के शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। डॉक्टर पी. अख्तर (PW-6) ने पोस्टमार्टम किया और बताया कि दोनों बच्चों की मौत डूबने से हुई, जिससे दम घुट गया था। पुलिस ने जांच पूरी कर चार्जशीट न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, दुर्ग की अदालत में दाखिल की। इसके बाद मामला ट्रायल कोर्ट को सौंपा गया। ट्रायल के दौरान कुल 9 गवाहों के बयान दर्ज किए गए। आरोपी महिला से भी धारा 313 CrPC के तहत बयान लिया गया। उसने सभी आरोपों से इनकार किया और कहा कि वह मानसिक तनाव में थी क्योंकि उसके पति ने दूसरी शादी कर ली थी। उसने खुद को निर्दोष बताया। 18 जून 2004 को ट्रायल कोर्ट ने महिला को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोषी करार दिया। उसी दिन अलग से हुई सुनवाई में कोर्ट ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई।
वडिवेलु थेवर बनाम स्टेट ऑफ मद्रास केस का हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि हत्या जैसे गंभीर मामलों में भी अगर एकमात्र गवाह की गवाही पूरी तरह से भरोसेमंद है, तो आरोपी को सजा दी जा सकती है। कोर्ट ने साफ किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 134 के तहत किसी भी तथ्य को साबित करने के लिए गवाहों की संख्या तय नहीं की गई है। कोर्ट ने वडिवेलु थेवर बनाम स्टेट ऑफ मद्रास केस का हवाला देते हुए कहा कि यह धारणा गलत है कि हत्या जैसे मामलों में कई गवाह जरूरी होते हैं। कानून कहता है कि किसी भी तथ्य को साबित करने के लिए गवाहों की संख्या जरूरी नहीं है।
संतोष कुमार पांडे की गवाही को बताया अविश्वसनीय
इस मामले में कोर्ट ने संतोष कुमार पांडे की गवाही को पूरी तरह अविश्वसनीय बताया। कोर्ट ने कहा कि उसने मुख्य गवाही में कई बातें जोड़ीं, जो उसने पुलिस को दिए बयान में नहीं कही थीं। ऐसे में उसकी गवाही विरोधाभासी और अविश्वसनीय है।
रिक्शा चालक को पेश नहीं किया गया
कोर्ट ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष ने उस रिक्शा चालक को भी पेश नहीं किया, जिसने आरोपी को घटनास्थल की ओर जाते देखा था। ऐसे में आरोपी को अपराध से जोड़ने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं है।
सिर्फ अनुमान और कल्पना के आधार पर हुई थी सजा
कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने सिर्फ अनुमान और कल्पना के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया, जो कानूनन गलत है। यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में गवाहों की संख्या के बजाय उनकी विश्वसनीयता को प्राथमिकता देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया और तुरंत रिहा करने का आदेश दिया, अगर वह किसी और मामले में हिरासत में नहीं है।
गुणवत्ता जरूरी, संख्या नहीं
कोर्ट ने कहा कि साक्ष्य की गुणवत्ता महत्वपूर्ण है, न कि उसकी संख्या। अगर एक गवाह की गवाही पूरी तरह से विश्वसनीय है, तो उस पर भरोसा किया जा सकता है।
जज की भूमिका अहम
ऐसे मामलों में जज की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। उन्हें यह तय करना होता है कि एकमात्र गवाह की गवाही कितनी भरोसेमंद है। अगर वह गवाही पूरी तरह से सच्ची और स्पष्ट है, तो आरोपी को दोषी ठहराया जा सकता है।
तीन तरह की गवाही
कोर्ट ने मौखिक गवाही को तीन श्रेणियों में बांटा:
- पूरी तरह भरोसेमंद
- पूरी तरह अविश्वसनीय
- न पूरी तरह भरोसेमंद, न पूरी तरह अविश्वसनीय
पहली और दूसरी श्रेणी में कोर्ट को फैसला लेने में कोई दिक्कत नहीं होती। लेकिन तीसरी श्रेणी के मामलों में कोर्ट को सावधानी से तथ्यों की जांच करनी होती है। - कोर्ट ने कहा कि अगर गवाही पहली श्रेणी में आती है यानी पूरी तरह भरोसेमंद है, तो उस पर आधारित होकर फैसला लिया जा सकता है।
एक गवाह भी काफी हो सकता है
कोर्ट ने कहा कि अगर एक गवाह की गवाही पूरी तरह साफ, निष्पक्ष और भरोसेमंद है, तो उसी के आधार पर फैसला लिया जा सकता है। गवाहों की संख्या पर जोर देना गलत है, क्योंकि इससे झूठे गवाहों को बढ़ावा मिल सकता है।
CRIMINAL APPEAL NO. 2189 OF 2017
SHAIL KUMARI …APPELLANT
VERSUS
STATE OF CHHATTISGARH …RESPONDENT

