Saturday, August 22, 2026
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False Affidavit: झूठे हलफनामे को प्रमाणित करने पर वकील को लगाई फटकार; कहा-न्यायिक प्रणाली को दूषित होने से बचाना वकीलों का कर्तव्य

केस अवलोकन (Case Snapshot)

पहलूविवरण
अदालतकेरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court)
जजन्यायमूर्ति एम.ए. अब्दुल हकीम (Justice MA Abdul Hakhim)
मामलासफवान मोहम्मद शरीफ बनाम फेडरल बैंक व अन्य (Safwan Muhamed Sherif v. Federal Bank & Ors)
मुख्य बिंदुझूठा हलफनामा प्रमाणित करने पर वकील की खिंचाई; ‘मनी म्यूल’ (Money Mule) खाता अनफ्रीज करने की याचिका खारिज; BNS Sec 111 के तहत FIR का निर्देश।

False Affidavit: केरल उच्च न्यायालय ने अपने मुवक्किल द्वारा दिए गए झूठे हलफनामे (False Affidavit) को सत्यापित और प्रमाणित (Attest) करने वाले एक वकील के आचरण पर कड़ी नाराजगी जताई है [सफवान मुहम्मद शरीफ बनाम फेडरल बैंक एवं अन्य]। न्यायालय ने कहा कि अधिवक्ता अदालत के अधिकारी (Officers of the Court) होते हैं और उनका वैधानिक व नैतिक कर्तव्य है कि वे वादकारियों को अपनी याचिकाओं में गलत तथ्य पेश करके न्यायिक प्रणाली को दूषित करने से रोकें।

मुख्य कानूनी टिप्पणियां

न्यायमूर्ति एम. ए. अब्दुल हकीम की एकल पीठ ने 17 अगस्त के अपने फैसले में रेखांकित किया-

“यह सर्वमान्य सिद्धांत है कि अधिवक्ता अदालत के अधिकारी हैं। उन्हें वादकारियों को न्यायिक प्रणाली को दूषित करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। वकीलों को अपने मुवक्किलों को तब झूठे बयान देने की अनुमति बिल्कुल नहीं देनी चाहिए, जब वे उपलब्ध दस्तावेजों से भली-भांति जानते हों कि उनका मुवक्किल झूठे तथ्य रख रहा है। यह अदालत याचिकाकर्ता के वकील के इस आचरण की कड़ी निंदा करती है और वकीलों द्वारा यह जानते हुए भी झूठे हलफनामे प्रमाणित करने की प्रथा को कड़े शब्दों में अस्वीकार करती है।”

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मामले की पृष्ठभूमि और बैंक लेनदेन

यह टिप्पणी 22 वर्षीय सफवान मुहम्मद शरीफ की उस याचिका को खारिज करते हुए की गई, जिसमें उसने फेडरल बैंक (Federal Bank) में अपने फ्रीज किए गए बैंक खाते को अनफ्रीज करने की मांग की थी।

  • असामान्य वित्तीय लेनदेन: फेडरल बैंक ने अदालत को बताया कि जनवरी 2023 में खाता खुलने के बाद यह काफी समय तक निष्क्रिय रहा। हालांकि, 15 मई 2023 के बाद केवल 15 दिनों के भीतर इस खाते से ₹50 लाख से अधिक के भारी-भरकम लेन-देन किए गए।
  • जांच एजेंसियों की कार्रवाई: कुल ₹21 लाख के संदिग्ध वित्तीय लेन-देन के संबंध में विभिन्न जांच एजेंसियों से प्राप्त 5 अनुरोधों के आधार पर बैंक ने खाते को फ्रीज कर दिया था।
  • 5 जून 2023 तक बैलेंस मात्र ₹1: बैंक स्टेटमेंट से पता चला कि खाते में जितनी भी रकम आई थी, उसे तुरंत निकाल लिया गया था और 5 जून 2023 तक खाते में केवल ₹1 शेष बचा था।

हलफनामे में झूठे दावों का पर्दाफाश

याचिकाकर्ता ने मूल याचिका में अपने काम या आय का कोई विवरण नहीं दिया था, लेकिन बाद में अदालत में एक हलफनामा दाखिल कर दावा किया कि वह दो व्यवसायों में वर्किंग पार्टनर है और उसे लाभ के अलावा ₹35,000 और ₹40,000 प्रति माह वेतन मिलता है।

अदालत ने पाया कि:

  • याचिकाकर्ता ने यह साबित करने के लिए कोई दस्तावेज पेश नहीं किया कि वे दोनों व्यवसाय वास्तव में अस्तित्व में भी हैं या नहीं।
  • ₹21 लाख के संदिग्ध लेन-देन का कोई वैध स्रोत या स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
  • याचिकाकर्ता के वकील ने दस्तावेजों में कोई आधार न होने के बावजूद मुवक्किल के इन असत्य दावों वाले हलफनामे को सत्यापित किया।

अदालत का अंतिम आदेश: ‘मनी म्यूल’ के रूप में इस्तेमाल, BNS के तहत केस दर्ज करने का निर्देश

  • वकील और मुवक्किल पर नरमी: अदालत ने याचिकाकर्ता और वकील की कम उम्र को ध्यान में रखते हुए इस बार उनके खिलाफ अवमानना या सीधी दंडात्मक कार्रवाई नहीं की।
  • संगठित अपराध का मामला: अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता अपने बैंक खाते का उपयोग साइबर धोखाधड़ी की अवैध कमाई को इधर-उधर करने के लिए ‘मनी म्यूल’ (Money Mule) के रूप में कर रहा था।
  • एफआईआर के आदेश: अदालत ने बैंक खाते को अनफ्रीज करने की याचिका खारिज कर दी और पुलिस को याचिकाकर्ता के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 111 (संगठित अपराध – Organised Crime) के तहत आपराधिक मामला दर्ज कर जांच करने का निर्देश दिया।

हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियां और मामला विवरण

  1. अदालत की कड़ी टिप्पणी
    • जस्टिस एम.ए. अब्दुल हकीम ने अपने फैसले में कहा: “यह सर्वमान्य है कि अधिवक्ता अदालत के अधिकारी हैं। उन्हें मुवक्किलों को न्यायिक प्रणाली को दूषित करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। यह अदालत याचिकाकर्ता के वकील के आचरण की सख्त निंदा करती है और झूठे बयानों को जानते हुए भी हलफनामा सत्यापित करने की प्रथा को खारिज करती है।”
  2. मामले की पृष्ठभूमि (मनी म्यूल और बैंक खाता फ्रीज)
    • 22 वर्षीय याचिकाकर्ता सफवान मोहम्मद शरीफ ने फेडरल बैंक में अपना खाता अनफ्रीज (Unfreeze) कराने के लिए याचिका दायर की थी।
    • बैंक ने कोर्ट को बताया कि साइबर अपराध जांच एजेंसियों से ₹21 लाख के संदिग्ध सौदों के संबंध में 5 अनुरोध मिलने के बाद खाता फ्रीज किया गया था।
    • जनवरी 2023 में खुले इस खाते में मई 2023 के केवल 15 दिनों के भीतर ₹50 लाख से अधिक के उच्च-मूल्य क्रेडिट और डेबिट लेनदेन हुए, जिसके बाद 5 जून 2023 तक खाते में केवल ₹1 का शेष (Balance) बचा था।
  3. याचिकाकर्ता का झूठा हलफनामा
    • याचिकाकर्ता ने हलफनामे में दावा किया कि वह दो व्यवसायों में वर्किंग पार्टनर है और ₹35,000 और ₹40,000 का मासिक वेतन कमाता है।
    • हालांकि, अदालत ने पाया कि उसने अपने दावों या उन दो व्यवसायों के अस्तित्व को साबित करने के लिए कोई दस्तावेज पेश नहीं किया। रिकॉर्ड से साफ था कि वह अपने बैंक खाते का उपयोग साइबर धोखाधड़ी के पैसों के लेन-देन (Money Mule) के रूप में कर रहा था।
  4. कोर्ट का आदेश और BNS के तहत FIR के निर्देश
    • याचिकाकर्ता और उसके वकील की कम उम्र को देखते हुए अदालत ने उनके खिलाफ कोई सीधी दंडात्मक कार्रवाई नहीं की, लेकिन बैंक खाता अनफ्रीज करने की याचिका को सीधे खारिज कर दिया।
    • अदालत ने पुलिस को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 111 (संगठित अपराध – Organised Crime) के तहत आपराधिक मामला दर्ज कर जांच की जाए।

कानूनी प्रतिनिधित्व

  • याचिकाकर्ता की ओर से: अधिवक्ता सादिकाली एम., शमनाद ई., अजीश के. बोस, मोहम्मद शफी एम. और मुहम्मद साबिक पेश हुए।
  • राज्य सरकार की ओर से: वरिष्ठ सरकारी वकील वी. के. रफीक ने पक्ष रखा।

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