Tuesday, October 6, 2026
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3-Year Practice Rule:न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन बोले; 3 साल की वकालत का नियम शिथिल करने से ‘न्यायविद’ नहीं, केवल ‘कैरियरिस्ट’ पैदा होंगे…

केस अवलोकन (Case Snapshot)

पहलूविवरण
अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
मामलाभूमिका ट्रस्ट बनाम भारत संघ व अन्य (Review Petition)
बहुमत निर्णय (2:1)CJI सूर्य कांत एवं जस्टिस ए.जी. मसीह (1 साल वकालत + 2 साल ट्रेनिंग/क्लर्कशिप)
अल्पमत/असहमति (Dissent)जस्टिस के. विनोद चंद्रन (3 साल की वकालत अनिवार्य रखने के पक्ष में)

3-Year Practice Rule: सिविल जज (जूनियर डिवीजन) भर्ती के लिए वकालत के अनिवार्य अनुभव को 3 साल से घटाकर 1 साल करने और उसके स्थान पर 2 साल के प्रशिक्षण व क्लर्कशिप की व्यवस्था लागू करने के सुप्रीम कोर्ट के बहुमत के फैसले से न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन ने असहमति (Dissent) जताई है।

न्यायमूर्ति चंद्रन ने मई 2025 के 3 वर्षीय वकालत की अनिवार्यता वाले फैसले को पूरी तरह बरकरार रखने का पक्ष लिया और कहा कि अनुभव की इस शर्त में ढील देने से न्यायपालिका में सक्षम न्यायविदों (Jurists) के बजाय केवल पद लोलुप या कैरियर बनाने वाले (Careerists) लोगों का कैडर तैयार होने का जोखिम रहेगा।

असहमति के मुख्य कानूनी व व्यावहारिक बिंदु

  • मुवक्किलों के दुख-दर्द और वास्तविक दुनिया का अनुभव जरूरी: न्यायमूर्ति चंद्रन ने रेखांकित किया कि कॉलेज से सीधे निकले छात्रों को, जो केवल अकादमिक ज्ञान से भरे हैं, किसी वादकारी के भाग्य का फैसला करने से पहले मानवीय व्यवहार और वादियों की वास्तविक कठिनाइयों को समझना अनिवार्य है। अधिकांश उच्च न्यायालयों का भी यही मानना है कि न्यायिक सेवा में कदम रखने के लिए बार (Bar) का व्यावहारिक अनुभव अनिवार्य है।
  • फैसले लेने की जिम्मेदारी सौंपने पर सवाल: न्यायाधीश ने सवाल उठाया:“जब कोई वरिष्ठ वकील या वादकारी किसी ऐसे नए वकील को अपना केस सौंपने को तैयार नहीं होता जो सीधे कॉलेज से निकला हो, तो क्या ऐसे व्यक्ति को किसी मामले में सीधे न्याय निर्णय की प्रक्रिया सौंपना सुरक्षित होगा? जब कानूनी सहायता के लिए भी गुणवत्तापूर्ण अनुभव की आवश्यकता होती है, तो निर्णय देने के लिए अनुभव अनिवार्य क्यों नहीं होना चाहिए?”
  • वरिष्ठों के संपर्क और कोर्ट कॉरिडोर से सीख: न्यायमूर्ति चंद्रन ने कहा कि केवल अदालत में जिरह करना ही किसी नए वकील को नहीं गढ़ता, बल्कि वरिष्ठों के दफ्तर में फाइलों से वाकफियत, कोर्ट के गलियारों में अन्य वकीलों के साथ संवाद, ड्राफ्टिंग, रिसर्च और जिरह की बारीकियां वर्षों की प्रैक्टिस से ही सीखी जा सकती हैं।
  • जज की गलती बनाम वकील की गलती: उन्होंने उल्लेख किया कि वकील की गलती को एक अनुभवी जज, साथी वकील या कोर्ट स्टाफ द्वारा सुधारा जा सकता है, लेकिन एक जज की गलती से वादकारी संकट में पड़ जाता है और उसका एकमात्र उपाय केवल अपील होता है। कोई भी ट्रेनिंग शेड्यूल वकालत के उस जमीनी अनुभव की जगह नहीं ले सकता।

नई प्रशिक्षण योजना और प्रशासनिक जटिलताओं पर चिंता

न्यायमूर्ति चंद्रन ने बहुमत द्वारा तय किए गए 2 साल के प्रशिक्षण और क्लर्कशिप मॉडल पर भी गंभीर आपत्तियां दर्ज कीं:

  • आधे वेतन पर 2 साल की सेवा अनुचित: उन्होंने कहा कि केवल तीन राज्यों को छोड़कर अधिकांश राज्यों में ट्रेनी जजों को नियमित पद, विशिष्ट कोर्ट और पूरा वेतन मिलता है। नए रंगरूटों को आधे वेतन (Half Pay) पर 2 साल तक रखना उनके प्रति अन्याय होगा और बिना कोई ठोस काम लिए सरकारी खजाने पर बोझ बनेगा।
  • अदालतों में रिक्तियां बढ़ेंगी: 2 साल के इस लंबे प्रशिक्षण अंतराल (Training Hiatus) के कारण निचली अदालतें बिना न्यायाधीशों के रह जाएंगी और लंबित मामलों का बोझ बढ़ेगा।
  • उच्च न्यायालय के जज द्वारा मूल्यांकन की बाधा: ट्रेनी न्यायिक अधिकारी के काम का आसीन हाईकोर्ट जज द्वारा मूल्यांकन कराने की शर्त उनके नियमित सेवा में सुचारू संक्रमण में एक नई अड़चन पैदा करेगी।
  • असमानता और भेदभाव का जोखिम: इस व्यवस्था से एक ही भर्ती में दो वर्ग बन जाएंगे—एक वर्ष की प्रैक्टिस वाले और दो-तीन वर्ष की प्रैक्टिस वाले। यदि दोनों को एक ही ट्रेनिंग व्यवस्था में रखा जाए तो यह ‘असमानों को समान मानने’ (Treating unequals as equals) का मुद्दा बनेगा, और यदि अलग-अलग रखा गया तो शत्रुतापूर्ण भेदभाव (Hostile Discrimination) का आरोप लगेगा।

इन सभी आधारों पर न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन ने पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज करते हुए मई 2025 के 3 साल के वकालत अनुभव वाले नियम को यथावत बनाए रखने का निर्देश दिया।

आइए जस्टिस के. विनोद चंद्रन की असहमति को बिंदुवार जानिए

  1. ‘कैरियरवादी तैयार होंगे, योग्य विधिवेत्ता नहीं’
    • जस्टिस चंद्रन ने चेतावनी देते हुए कहा: “अनुभव की आवश्यकता समय की मांग है। ऐसा न करने पर हम पर योग्य विधिवेत्ता (Jurists) तैयार करने के बजाय केवल ‘कैरियरवादियों’ (Careerists) का कैडर बनाने का आरोप लगेगा, जो एक मजबूत न्यायिक प्रणाली को समृद्ध करने में असमर्थ होंगे।”
  2. कॉलेज से निकलते ही न्याय की कुर्सी पर बैठना खतरनाक
    • जज ने सवाल उठाया: “जब कोई वरिष्ठ वकील या मुवक्किल किसी ऐसे नए वकील को अपना केस नहीं सौंपता जो सीधा कॉलेज से निकला हो, तो क्या ऐसे लोगों को फैसलों और न्याय की प्रक्रिया सौंपना सुरक्षित होगा? एक वकील की गलती को कोई अनुभवी जज या सीनियर ठीक कर सकता है, लेकिन एक जज की गलती मुवक्किल की जिंदगी जोखिम में डाल देती है।”
  3. अदालती गलियारों और वकालत के अनुभव का कोई विकल्प नहीं
    • उन्होंने कहा कि ड्राफ्टिंग, जिरह (Cross-Examination), कानूनी शोध और बहस में महारत केवल सालों की वकालत से ही सीखी जा सकती है।
    • “कोई भी ट्रेनिंग शेड्यूल (चाहे भर्ती से पहले हो या बाद में) किसी युवा वकील या जज को जीवन की वास्तविक परिस्थितियों और मुवक्किलों की पीड़ा का वह अहसास नहीं दे सकता जो वकालत के दौरान मिलता है।”
  4. आधी सैलरी (Half Pay) और क्लर्कशिप मॉडल पर सवाल
    • नए भर्ती नियम के तहत सफल उम्मीदवारों को 2 साल तक ‘Trainee Officers’ के रूप में आधे वेतन (50% Remuneration) पर रखने के फैसले की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि इससे मेधावी छात्र हतोत्साहित होंगे और न्यायिक पदों की रिक्तियों को भरने में अनावश्यक देरी होगी।
    • उन्होंने हाईकोर्ट जजों द्वारा Trainee Officers के मूल्यांकन (Evaluation Report) की अनिवार्य शर्त पर भी चिंता जताई और कहा कि इससे नियमित सेवा में प्रवेश के दौरान प्रशासनिक बाधाएं पैदा होंगी।
  5. समानता के अधिकार (Article 14) का मुद्दा:
    • जस्टिस चंद्रन ने तर्क दिया कि एक ही भर्ती प्रक्रिया के तहत अलग-अलग अनुभव वाले (1 साल, 2 साल या 3 साल प्रैक्टिस वाले) उम्मीदवारों को एक ही ट्रेनिंग Regime में रखना “असमानों को समान मानने” (Treating unequals as equals) और भेदभाव का कारण बन सकता है।
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